शख्सियत : कविताओं के जरिए डाॅक्टरों को बनाया जा रहा मानवीय और संवेदनशील

प्राचीनकाल में वैद्य मरीजों की नब्ज देखते थे, जिसके व्दारा मरीज से उनका आंतरिक रिश्ता कायम हो जाता था। बाजारवाद ने चिकित्साकर्म को सेवाभाव के बजाये व्यवसाय में बदल दिया है। अन्य कारोबार की तरह उपचार के क्षेत्र में भी गलाकाट प्रतियोगिता का दौर शुरू हो चुका है।

शख्सियत : कविताओं के जरिए डाॅक्टरों को बनाया जा रहा मानवीय और संवेदनशील

डाॅ. एल. एन. व्यास का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’’चिकित्सक को ईश्वर का दूसरा रूप माना जाता रहा है, महान आयुर्वेद चिकित्सक धनवंतरी को भगवान का अवतार कहा गया है जिनकी जयंती पूजा अर्चना के साथ मनाई जाती है, लेकिन अब कथित जागरूकता के नाम पर  मरीजों के परिजन डाॅक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों के खिलाफ इलाज में लापरवाही के आरोप लगाते हुए हंगामा खड़ा करने लगे हैं। जिसके चलते चिकित्सीय व्यवसाय को और अधिक संवेदनशील और मानवीय बनाने के लिए कविताओं, कहानियों, गीत सहित साहित्य की अन्य विधाओं का सहारा लिया जाने लगा है। इसके लिए बाकायदा आनलाइन कोर्स होते हैं। कविताओं के जरिए चुनिंदा मानसिक रोगों का उपचार भी किया जाने लगा है।’’

डॉक्टर एलएन व्यास

यह जानकारी शाजापुर (मप्र) के भीमराव आम्बेडकर जिला शासकीय चिकित्सालय में दस वर्षों तक सहायक सिविल सर्जन रह चुके डाॅ. एल.एन. व्यास ने दी। इन्होंने बताया कि चिकित्सा व्यवसाय को कविता से जोड़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। ’पेशे के औजारः नए डाॅक्टरों के लिए कविताएं’ नामक परियोजना शुरू की गई है। इसके तहत ’टूल्स आफ द ट्रेड’ नाम से पाॅकेट साइज के तीन कविता संकलन प्रकाशित किए जा चुके हैं। इसमें 50-50 कविताएं हैं, जो सभी जूनियर डाॅक्टरों व्दारा सामना की जाने वाली चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में करूणा और व्यक्तिगत लचीलेपन के बारे में सोचने में मदद करती हैं। इनका संपादन भी डाॅक्टरों ने किया है और इनके प्रकाशन के लिए डाॅक्टरों के परिजनों ने दान दिया है। इसके तीन संस्करण छप चुके हैं और इन्हें स्काॅटलैंड के राॅयल काॅलेज आफ जनरल प्रेक्टिशनर्स तथा स्काॅटलैंड के मेडिकल एंड डेंटल डिफेंस यूनियन व्दारा भी समर्थन मिल चुका है।

बाजारवाद की चपेट में चिकित्साकर्म

एक सवाल के जवाब में डाॅक्टर व्यास ने कहा कि प्राचीनकाल में वैद्य मरीजों की नब्ज देखते थे, जिसके व्दारा मरीज से उनका आंतरिक रिश्ता कायम हो जाता था। नब्ज देखना भी मरीज को एक प्रकार की तसल्ली देना है। बाजारवाद ने चिकित्साकर्म को सेवाभाव के बजाये व्यवसाय में बदल दिया है। अन्य कारोबार की तरह उपचार के क्षेत्र में भी गलाकाट प्रतियोगिता का दौर शुरू हो चुका है। डाॅक्टर बनना भी आसान नहीं रहा है। लाखों रूपए खर्च करने के बाद जब व्यक्ति डाॅक्टर बनता है तो वह सोचता है कि ब्याज सहित पढ़ाई में खर्च की भरपाई होना चाहिए। ऐसे में डाॅक्टर बनते समय ली जाने वाली शपथ ताक पर धरी रह जाती है।

चिकित्सीय कर्म को लेकर कविताएँ

 डाॅक्टर व्यास ने बताया कि प्रसिध्द कवि टी. एस. एलियट की एक कविता की पंक्तियां इस प्रकार हैं 
 ’’तो चलो चलते हैं 
 तुम और मैं जब शाम 
 आसमान में ऐसे फैली हो 
 जैसे कोई मरीज मेज पर 
 बेहोश पड़ा हो’’

इसी तरह डाॅक्टरों को लेकर और भी  बीसियों कविताएं हैं, ऐसे साहित्य को देखकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बीमारी एक सार्वभौमिक मानवीय अनुभव है, लगभग उतनी ही निश्चित जितनी मृत्यु और प्रेम में निराशा! इसके प्रति हमारी प्रतिक्रिया अक्सर सामान्य चिंता, उलझन, भय और झूठे साहस का मिश्रण होती है जिसमें कभी- कभी दार्शनिक चिंतन भी शामिल होता है। इतिहास की कुछ सबसे गहन कविताएं दूसरों के दर्द और पीड़ा, चिकित्सकों और देखभाल करने वालों की कमजोरियों और वीरता, बीमारी की प्रकृति तथा बुध्दिमत्ता पर आधारित हैं। 

साहित्य की नब्ज टटोलने में माहिर

 मरीजों के साथ साहित्य जगत की भी नब्ज टटोलने में माहिर डाॅ. व्यास को शाजापुर में भला कौन नहीं जानता? मिलनसार स्वभाव और परोपकार की भावना से ओतप्रोत व्यक्तित्व के धनी डाॅक्टर व्यास चिकित्सक होने के साथ गजब के साहित्य प्रेमी  हैं। इनकी बदौलत इस कस्बेनुमा शहर में बरसों साहित्य की ऐसी मशाल जलती रही कि उसकी रोशनी में अनेक प्रतिभाओं ने अपनी रचनाओं के जरिए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।

अनेक साहित्यिक नतमस्तक

शाजापुर में जन्में विष्णु नागर को काव्य संस्कार यदि डाॅक्टर साहब व्दारा आयोजित ऐसे काव्य अनुष्ठानों की वजह से अगर नहीं मिले होते तो आज वे देश के ख्याति प्राप्त कवि, उपन्यासकार, व्यंग्यकार तथा पत्रकार नहीं होते। नागर जी की तीन दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं एवं चर्चित हैं। निश्चय ही डाॅक्टर साहब के साहित्यिक प्रेम की वजह से अनेक साहित्यिक नतमस्तक हैं। डाॅक्टर साहब के लिए चिकित्सा कर्म आय का जरिया कभी नहीं होकर  परोपकार का रहा है।

अनेक चिकित्सीय परीक्षाएं उत्तीर्ण

 डाॅ. व्यास का जन्म शाजापुर जिले के परगने सुंदरसी में स्व. पंडित हीरालाल  व्यास तथा श्रीमती केशरबाई के घर हुआ। मिडिल तक शिक्षा गांव के स्कूल में प्राप्त करने के बाद शाजापुर से हायरसेंडरी की परीक्षा उत्तीर्ण की, उज्जैन से बीएससी पार्ट वन के बाद पीएमटी की परीक्षा पास की और भोपाल से एमबीबीएस किया। इसके साथ ही डीपीसी एवं एफसीजीपी जैसी चिकित्सीय दक्षता की परीक्षाएं भी आप उत्तीर्ण कर चुके हैं। डाॅक्टर व्यास दस वर्षों तक शाजापुर के भीमराव आम्बेडकर जिला शासकीय चिकित्सालय में सहायक सिविल सर्जन रहने के बाद  स्वैच्छिक सेवानिवृत्त होकर स्वयं की प्रेक्टिस करने लगे। इनके बारे में लोग अक्सर बताया करते हैं कि शासकीय सेवा के दौरान और अपने नीजि अस्पताल में भी अनगिनत गरीबों का इलाज इन्होंने बिना अधेला लिए किया है।

कायम की रचना धर्मिता की मिसाल

 डाॅक्टर साहब बताया करते हैं कि काॅलेज के दिनों इन्हें कविताई का चस्का लगा जरूर था, लेकिन रचनाओं ने  डायरी से बाहर निकलकर ताका- झांकी करने की पता नहीं क्यों हिम्मत नहीं की, लेकिन साहित्य के प्रति अनुराग ने इस क़दर जोर मारा कि इस छोटे से शहर में बीसियों ख्याति प्राप्त कवियों, शायरों को आमंत्रित कर यहां के ऊंघते अनमने से लोगों के बीच बरसों रचना धर्मिता की मिसाल कायम करते रहे।

अनेक साहित्यिक आयोजनों का श्रेय

 शाजापुर जैसे वीरान शहर के अवधूतमना लोग डाॅक्टर व्यास की वजह से सामाजिक यथार्थ से जुड़ी कविता, शेरो शायरी की दुनिया में करीब तीन दशक तक इस क़दर गिरफ्तार रहे कि बाहर निकलने का होंश ही खो बैठे थे, डाॅक्टर व्यास ने ’जागृति मंच’ के माध्यम से उस दौर में अनेक कवि सम्मेलनों और मुशायरों का आयोजन किया। डाॅक्टर साहब को छपास का रोग यदि होता तो  ऐसे आयोजनों का श्रेय लूटने के लिए अपनेे नाम से एक पुस्तक भी छपा सकते थे। उस दौरान इनकी बदौलत एक से बढ़कर एक रचनाकारों ने शाजापुर की जनता को अपनी रचनाओं से सम्मोहित कर दिया, लेकिन बाद में टीवी की दुनिया ने कवि सम्मेलनों का ऐसा फूहड़ नजारा परोसना शुरू किया कि लोग सार्थक रचनाकर्म की दुनिया से भटककर कविताई के नाम पर सस्ते और फूहड़ चुटकलों के प्रेमी बनते चले गए।

सुप्रसिध्द कवियों का रचनापाठ

 डाॅ. व्यास ने ’जागृति मंच’ के जरिए नरेश जी मेहता, डाॅ. शिवमंगलसिंह ’सुमन’, प्रो.नईम, बालकवि बैरागी, सुल्तान मामा, हरीश निगम, अज्ञेय, हरिनारायण व्यास, क़ैफी आजमी जैसे अनेकानेक कवियों, शायरों की रचनाओं से शाजापुर तथा आसपास की जनता को सराबोर कर दिया था। डाॅक्टर व्यास ने लाॅयन्स क्लब के माध्यम से हिंदी के यशस्वी कवि नरेश मेहता और हरिनारायण जी व्यास के 75 वें जन्मदिन पर भव्य अमृत महोत्सव भी आयोजित किया था।

लायन्स क्लब के गवर्नर रहे

 डाॅ. व्यास ने ’हरिनारायण व्यास कुछ दूर से, कुछ पास से’ नामक पुस्तक भी प्रकाशित की थी। आप बरसों लाॅयन्स क्लब के गवर्नर रहे हैं। जीवाजी राव क्लब में इनके प्रयासों से 35 हजार रूपए की लागत से लायब्रेरी स्थापित की गई है, जिसमें पंडित बालकृष्ण शर्मा ’नवीन’, नरेश मेहता, हरिनारायण व्यास का समग्र साहित्य तथा विष्णु नागर की बहुत पुस्तकें संग्रहित हैं। डाॅक्टर साहब के ही प्रयास से क्लब में एक आयोजन हुआ था जिसमें विधायक अरूण भीमावद ने पुस्तक खरीद के लिए एक लाख रूपए अनुदान दिए जाने की घोषणा की थी। इसी मौके पर विष्णु नागर भी आमंत्रित थे, जिन्होंने अपने अनेक संकलन इस लायब्रेरी को दिए।

अनेक कीर्तिमान किए स्थापित

साहित्यिक आयोजन तो शाजापुर में आज भी होते हैं, लेकिन जो कीर्तिमान डाॅक्टर व्यास ने स्थापित किए, वैसे कार्यक्रम होना अब असंभव हैं। इसी प्रकार एक बार इन्होंने अपने प्रयास से जाने माने व्यंग्यकार शरद जोशी को भी आमंत्रित किया था, हरायपुरा मोहल्ले की नागर धर्मशाला में आयोजित इस कार्यक्रम के बरसों पहले शरद जी का इरफाना जी से प्रेम विवाह हो चुका था और शाजापुर की जनता शरद जी को सुनना चाहती थी। सखेद कहना पड़ रहा है कि डाॅक्टर साहब ने शाजापुर में जिस प्रकार की साहित्यिक हलचल ला दी थी, वैसा जोशीला काव्यप्रेम यहां के लोगों में अब नहीं रहा है और लोग फिर मुर्दिसी की गर्त में समाकर ऊँघने लगे हैं। अब बेहतरीन साहित्य छप तो रहा है, लेकिन इस शहर के लोग उसे पढ़ने से चूक ही नहीं, पिछड़ भी गए हैं।