विचार सरोकार : प्रेम के रंग बसंत के संग

अपने रिश्तों की सूखी टहनियों पर प्रेम की नई कोंपलें उगाएं और नफरत के पतझड़ को विदा कर सौहार्द के रंगों से अपना संसार भर लें।

विचार सरोकार : प्रेम के रंग बसंत के संग

उमा त्रिवेदी, कर्नाटक बैंगलोर

​प्रकृति जब अपनी मौन साधना तोड़कर चटख रंगों में मुस्कुराने लगती है, तो समझ लीजिए कि *बसंत का आगमन हो गया है*। बसंत केवल एक ऋतु नहीं, बल्कि एक अहसास है एक ऐसा उत्सव जिसमें सृष्टि का कण-कण प्रेम की भाषा बोलने लगता है। 'बसंत के रंग, प्रेम के संग' का यह संगम मानवीय भावनाओं को एक नई ऊर्जा और गहराई प्रदान करता है।


​प्रकृति का श्रृंगार और प्रेम का संचार

कहा जाता है कि बसंत 'ऋतुराज' है। इस दौरान प्रकृति किसी नवविवाहिता की तरह सजती है। पेड़ों पर आते नए कोमल पत्ते, आम के बौर की मादक खुशबू और सरसों के खेतों की वह सुनहरी चादर आँखों को एक असीम शांति देती है। जब सरसों के पीले फूल हवा के झोंकों के साथ झूमते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे धरती प्रेम का कोई गीत गुनगुना रही हो। हालांकि प्रेम और बसंत का गहरा नाता है। जिस तरह बसंत पुरानी, सूखी पत्तियों को गिराकर जीवन में नवीनता लाता है, उसी तरह प्रेम भी हमारे भीतर की जड़ता को खत्म कर हृदय को कोमल और जीवंत बना देता है। कामदेव और रति के इस पर्व में फिज़ाओं में घुली खुशबू प्रेमियों के मन में एक अनूठी सिहरन पैदा करती है।


​बसंत का सबसे प्रमुख रंग पीला है। पीला रंग ज्ञान, ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक है। जब हम 'प्रेम के संग' बसंत मनाते हैं, तो यह पीला रंग हमारे रिश्तों में विश्वास और प्रगाढ़ता की चमक भर देता है। होली का त्योहार भी इसी ऋतु की पराकाष्ठा है, जहाँ गुलाल के रंग सामाजिक दूरियों को मिटाकर दिलों को जोड़ देते हैं।


​वास्तव में, बसंत केवल बाहर के वातावरण में नहीं, बल्कि हमारे भीतर भी होना चाहिए। हमारे ह्रदय में बसंत का समावेश बहुत जरूरी है क्योंकि प्रेम वह खाद है जो जीवन रूपी उपवन में बसंत के फूलों को हमेशा खिलाए रखती है। यदि जीवन में प्रेम है, तो पतझड़ में भी बसंत का अनुभव किया जा सकता है।


"बसंत का संदेश स्पष्ट है। जीवन जड़ता का नहीं, बल्कि खिलने और बिखरने का नाम है। प्रेम के रंगों में सराबोर होकर ही हम इस सृष्टि की सुंदरता को पूर्णतः महसूस कर सकते हैं।" इस बसंत, चलिए हम भी प्रकृति से सीखें। अपने रिश्तों की सूखी टहनियों पर प्रेम की नई कोंपलें उगाएं और नफरत के पतझड़ को विदा कर सौहार्द के रंगों से अपना संसार भर लें।

उमा त्रिवेदी, कर्नाटक बैंगलोर