धर्म संस्कृति : दान पुण्य के महत्वपूर्ण पुरुषोत्तम मास की शुरुआत 17 में से
⚫ हर दिन के भगवान के अलग-अलग नाम और उनके नाम से दान का महत्व
⚫ भगवान श्री कृष्ण ने अधिक मास को नाम दिया है पुरुषोत्तम मास
⚫ इस माह में कोई भी शुभ कार्य वर्जित
⚫ पुण्य फल के साथ मिलती है सकारात्मक ऊर्जा
हरमुद्दा
रतलाम, 16 मई। हिंदू धर्म में अधिक मास का विशेष महत्व है। शास्त्रों में इसकी महिमा अत्यंत महान बताई गई है। इसे पुरुषोत्तम मास कहा गया है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं इसे अपना नाम प्रदान किया था। इसकी शुरुआत 17 मई से हो रही है। इस महीने में प्रतिदिन अलग-अलग देवता के नाम से दान करने का विधान है जिससे अनंत पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

ज्योतिषाचार्य पंडित शैलेंद्र दुर्गाशंकर ओझा ने बताया कि
पंचांग के अनुसार, साल 2026 में अधिक मास 17 मई, रविवार से शुरू हो रहा है, जो 15 जून 2026, सोमवार को समाप्त होगा। इस दौरान किसी भी तरह से मांगलिक और शुभ कार्यों को करने का मनाही होती है।
तब होता है अधिक मास
अधिक मास का कारण हिंदू पंचांग की गणना पद्धति में छिपा है, जो चंद्र कैलेंडर पर आधारित होती है। एक सौर वर्ष में लगभग 365 दिन होते हैं, जबकि चंद्र वर्ष करीब 354 दिनों का होता है। इस तरह हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर बन जाता है। यह अंतर धीरे-धीरे बढ़ते हुए करीब 32 महीने 16 दिन में लगभग एक पूरे महीने के बराबर हो जाता है। तब इस अंतर को संतुलित करने के लिए पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है। इसी अतिरिक्त महीने को अधिक मास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है।
ऐसा भी होता है
शास्त्रों के अनुसार कहे तो जिस महीने में सूर्य का राशि परिवर्तन नहीं होता, अर्थात कोई संक्रांति नहीं पड़ती, वह अधिक मास कहलाता है। इस मास में किया गया छोटा सा भी काम आपको काफी पुण्य दिला सकता है।
पूरा महीना पूजा, व्रत, दान-पुण्य का
यह पूरा महीना भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, दान और जप-तप के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दौरान किए गए शुभ कार्यों का कई गुना फल मिलता है।
अधिक मास में किस वस्तु का दान करें व किस दिन करें

ज्योर्तिविद दुर्गाशंकर द्वारा संशोधित "श्री हनुमान तिथि दर्पण" में पुरुषोत्तम मास के पहले दिन से लेकर समापन तक किस दिन किस देवता के नाम से दान करना चाहिए, इसका स्पष्ट उल्लेख किया गया है। तदनुसार पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
देवता का नाम दान करने वाली वस्तु
श्री विष्णु चांदी का दिया घी भरकर
श्री जिष्णु स्वर्ण दान
श्री महाविष्णु स्वर्ण दान
श्री हरि खारक
श्रीकृष्ण गुड़, चनादाल
श्री मधोक्षजम ताम्बे का अर्घ
श्री केशवं लाल चंदन
श्री माधवं इत्र, कपुर
श्री राम केशर
श्री अच्युतं कस्तुरी
श्री पुरुषोत्तम शंख
श्री गोविन्दम् गौलोचन
श्री वामनं गरुड़ घण्टी
श्री शं मोतीनग
श्री कान्तं माणक
श्री विक्षअमाक्षिणमं मक्खन
श्री नारायण खीर
श्री मधुरिपुम दही
श्री अनिरुद्धं दुप्पटा
श्री त्रिविक्रम ऊन, उनी वस्त्र
श्री वासुदेव घी
श्री जगघोनि तिल-गुड़
श्री अन्नत चावल
श्री शेषशायिनम् गेहूँ
श्री संकर्षण दूध
श्री प्रद्युम्न कसार
श्री द्वेत्यारी ताम्रपात्र, मुंगभ
श्री विश्वतोमुख शहद
श्री जर्नादनं चाँदी की पातड
श्री धरावासम कांसे के पात्र में 33 मालपुए
श्री दामोदरं स्वेच्छा से
श्री मर्दादनम स्वेच्छा से
अधिक मास में नहीं करना चाहिए यह कार्य
पंडित ओझा ने बताया कि सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, अधिक मास के दौरान शादी-विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और नई संपत्ति या वाहन की खरीद जैसे मांगलिक और शुभ कार्यों को वर्जित माना जाता है।
अधिक मास में करें ये काम
अधिक मास में कुल चार कार्य करने में अधिक जोर दिया गया है। वह है दान, व्रत, जप और दीपदान। शास्त्रों के अनुसार, इस मास में ये करने से करोड़ों गुना फल प्राप्त होता है। इसलिए अपनी योग्यता के अनुसार अन्न दान, वस्त्र दान, सेवा सहित अन्य शुभ कार्यों में धन को खर्च करें। इससे आपका यश बढ़ेगा और सुख-समृद्धि की प्राप्ति हो सकती है। जीवन में सकारात्मक ऊर्जा की बढ़ोतरी हो सकती है। घर पर ही तुलसी या बेलपत्र के समक्ष दीपक जलाएं। इससे शुभ माना जाता है।
Hemant Bhatt