शख्सियत : युध्द के कारण बच्चों के अधिकार होते हैं तबाह

युध्द बड़े देशों या गुटों के बीच होते हैं, लेकिन इसकी कीमत उन मासूम बच्चों को चुकाना पड़ती है जिनका युध्द से सीधे कोई लेना देना नहीं होता। यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक इस समय 47.3 करोड़ से अधिक बच्चे जंग से प्रभावित क्षेत्रों में जीवन मरण का संघर्ष कर रहे हैं, यहां तक कि जो संस्थाएं उन्हें खाना बांट रही होती हैं, वहां भी उन्हें उनका शरीर गोलियों से छलनी कर दिया जाता है।

शख्सियत : युध्द के कारण बच्चों के अधिकार होते हैं तबाह

कवयित्री स्मिता अश्विनी शर्मा का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’युध्द प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों के सामने हर दिन एक ही जंग होती है और वह है जिंदा रहने की जंग! यह उनसे उनका बचपन छीन लेती है। ईरान के मिनाब  में प्राथमिक स्कूल में पढ़ने वाली उन छह से बारह साल की बच्चियों को क्या मालूम था कि सुबह अपनी अम्मी और अब्बू को वे जो ’टाटा बाय बाय’ बोलकर जा रही हैं, यही उनकी अंतिम विदाई होगी। प्रथम और व्दितीय विश्व युध्द की विनाशलीला से सबक नहीं सीखा और हथियार बेचने के लालच में युध्द लड़ना- लड़ाना बड़े देशों की फितरत बन चुकी है।’

कवयित्री तथा चिंतक स्मिता अश्विनी शर्मा का यह कहना है। इन्होंने कहा कि पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित आवास की यूएन जैसी संस्थाएं पैरवी करती हैं, लेकिन जंग के मौजूदा हालात में यह अधिकार रोंदे जा रहे हैं। इसी साल 28 फरवरी को ईरान के मिनाब शहर में प्राथमिक स्कूल में पढ़ रही 168 छात्राओं की इजराइली मिसाल हमले में मौत हो गई थी। आखिर इन बच्चियों का कसूर क्या था? यह सवाल इजराइल से पूछा जाना चाहिए।

जीवन मरण का संघर्ष कर रहे बच्चे

 एक सवाल के जवाब में स्मिता जी ने कहा कि युध्द बड़े देशों या गुटों के बीच होते हैं, लेकिन इसकी कीमत उन मासूम बच्चों को चुकाना पड़ती है जिनका युध्द से सीधे कोई लेना देना नहीं होता। यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक इस समय 47.3 करोड़ से अधिक बच्चे जंग से प्रभावित क्षेत्रों में जीवन मरण का संघर्ष कर रहे हैं, यहां तक कि जो संस्थाएं उन्हें खाना बांट रही होती हैं, वहां भी उन्हें उनका शरीर गोलियों से छलनी कर दिया जाता है। युध्दग्रस्त क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों का आंकड़ा 1990 के दशक में लगभग 10 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर करीब 19 प्रतिशत हो गया है। युध्द के मामले में 2024 का साल व्दितीय विश्वयुध्द के बाद सबसे भयावह साबित हुआ है।

बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन

स्मिता जी का कहना था कि 20 नवम्बर 1989 को संयुक्त राष्ट्रसभा व्दारा बाल अधिकारों की घोषणा के बाद 197 देशों ने इन पर सहमति जताई थी। बच्चों के लिए सभी अधिकारों को 54 अनुच्छेदों के तहत रखा गया है, लेकिन आज दुनिया में तीन बड़े संघर्षों ईरान अमेरिका, रूस यूक्रेन, और फिलीस्तीन इजराइल में बच्चों के इन अधिकारों का जमकर उल्लंघन हो रहा है।

स्मिता जी कविताओं का परिवेश

 अपनी कविताओं में स्मिता जी आसान भाव तथा बिम्बों का उपयोग करती हैं। साथ ही परिवेश का सच विभिन्न रूपाकारों में अभिव्यक्त होता है। शाहजहांपुर (उत्तरप्रदेश) के गांव हरदुआ में श्री सुधाकर मिश्र तथा श्रीमती मंजु लता के घर जन्मी स्मिता जी अर्थशास्त्र, हिंदी साहित्य और समाजशास्त्र में एमए के साथ बीएड, डीएलएड भी कर चुकी हैं। इन दिनों आप लखनऊ के एक काॅलेज में हिंदी पढ़ा रही हैं।

पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित 

 आपकी कविताएं छोटी बड़ी पत्र पत्रिकाओं में छपती रही हैं। इनका एकल कविता संग्रह ’यादों के घन सघन हृदय पर’ और साझा संकलन ’एक मुट़ठी आसमान’ छपा है। इन दोनों किताबों में इनकी कविताओं की शैलीगत विशेषता देखी जा सकती है। इनका कहना है कि व्यक्ति को अपना जीवन स्वाभिमान के साथ जीना चाहिए। एक लेखक में वैचारिक दृढ़ता तथा सामाजिक प्रतिबध्दता होना आवश्यक हैं। स्मिता जी कविता लिखने के साथ ही ’अश्विनी स्मृति साहित्य मंच’ के माध्यम से नए लेखकों को मंच प्रदान करने का अभियान भी चला रही हैं।


स्मिता जी की कविताएं

वापस जरूर आओगे 

हर रोज डूबता मन 
तुम्हारी यादों में
इतना गहरे डूब जाता है
जैसे डूब जाता हो सूरज 
किसी समंदर की बाहों में
किसी अज्ञात वास में भटकता हृदय
हर रोज जलता है लाक्षागृह में
कितने सपनों, कितने अरमानों, 
कितनी सिसकियों के साथ
हर पल अंतर मन के
महासमर में घायल होती धड़कनें
पाहन बन बिछ जाती हैं राह में
किसी युगांतर की प्रतीक्षा में
यह सोच कर
तुम आओगे, आओगे ,आओगे,
वापस जरूर आओगे।

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हमें जिद है 

उन्हें जिद है
हमें जला कर राख करने की
हमें जिद है 
शरर पर पांव धरने की
जुगनू के  कई  लश्कर
चमकते राह में लेकिन
जिद है हमारी भी
धरा  पर सूर्य धरने की
जलाती चांदनी, हमसे बहुत
परिहास करती है
आजकल रातरानी क्यों
भला बिन बात झरती है?
कहीं दिल के अंधेरे में
लगे हैं दर्द के मेले
बिन भाव के कितने
हृदय के भाव बिकते हैं।

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अनबोली तकलीफ 

समंदर के पानी में 
बहते सपनों की
अनबोली तकलीफ 
अचानक बढ़ जाती है
जब कोई तम चांदनी को 
छलकर मुस्कराता हुआ
किसी संकरी गली में 
पसर जाता है
जहां सूरज अपने पांव 
धरने से कतराता है
कतराती हैं हवाएं 
खुशबू जहां बिखरती नहीं
केवल सिसकती हैं बेबस!

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मुश्किल है, पत्थर हो जाना 

मुश्किल है पत्थर का 
पत्थर हो जाना!
कतरा- कतरा कट जाना
हर चोट हृदय पर सह लेना
चुप हो मूरत में गढ़ जाना
मुश्किल है पत्थर का 
पत्थर हो जाना!
किसने देखा पत्थर का 
मोम सदृश धीरे गलना
या फिर धूप घनेरी में
धीरे - धीरे -धीरे जलना
किसने देखा आँहें भरते 
पानी में पानी हो जाना?
मूक हृदय का संवेदन
फिर किसी कब्र में दब जाना
मुश्किल है पत्थर का 
पत्थर हो जाना।

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तुम जीवित हो 

मन सागर का मंथन करके
विष को बूंद- बूंद पी करके
पियूष हृदय का बांट सको
तो तुम जीवित हो! 
षडयंत्रों को  रचने  वालों
अगणित नकली चेहरे वालों
अपने अंतर में झांक सको
तो तुम जीवित हो!
ओ महलों में जीने वालों
अपनी खुशी लूटने वालों
पर पीड़ा को खुद के भीतर
आँक सको तो तुम जीवित हो!
तम को गले लगाने वालों 
पल पल सूद बढ़ाने वालों 
एक  मतवाला बादल बन 
तपती भू को ढाँप सको तो
तुम जीवित हो!