शख्सियत : मनुष्य होने का सलीका सिखाता है साहित्य

प्रकृति में समन्वय, संतुलन और लय प्राकृतिक रूप से विद्यमान है। इसलिए वहां जीवन की जीवंतता निरंतर प्रवाहमान है। हर मुश्किल, हर बाधा को पार करके। सुख दुख तो उसके साथ भी हैं। संवेदनाएं भी कुदरत की रचना हैं, पर उसके लिए हमारी परवरिश, हमारे संस्कार और माहौल भी बहुत मायने रखते हैं।

शख्सियत : मनुष्य होने का सलीका सिखाता है साहित्य

कवयित्री मधु नौटियाल का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

’’साहित्य हमें मनुष्य होने का सलीका सिखाता है और वह मानवीय सबंधों को सही अर्थों में संवेदनशील भी बनाता है। जीवन संघर्षों से जूझने की प्रेरणा साहित्य के विभिन्न रूपों कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आलेख आदि से मिलती है।’’


यह बात कवयित्री मधु नौटियाल ने कही। इनका मानना है कि साहित्य, संगीत, कला में रची बसी संस्कृति हर समाज का वह मिट्टी गारा है जो उसकी उर्वरा के लिए अपरिहार्य है। वही मानवीय संबंधों को सही अर्थों में संवेदनशील बनाता है और संघर्षों से जूझने के लिए दृढ़शक्ति और मनोबल की रचना करता है।

साहित्य कला के प्रति रुचि ब्रह्मलीन

 एक सवाल के जवाब में मधु जी ने कहा कि यह तो जीवन की आत्मघाती विडम्बना ही है कि भौतिक आर्थिक आविर्भाव के साथ मनुष्य में साहित्य कला की रुचि कहीं ब्रम्हलीन होती नज़र आ रही है। इनके लिए लोग एक कुछ पल भी नहीं जुटा पाते। एक और सवाल के जवाब में इन्होंने कहा कि जीवन तो प्रकृति से ही मिला फिर एक धरती, एक आसमान के नीचे सांस उच्छवास फिर भी बंाटने की बातें! प्रकृति ने यह तो हमें नहीं सिखाया। ना ये अपसंस्कृति ब्रम्हांड से आई फिर इस आत्मघाती अपसंस्कृति को रोपने की कैसी आतुरता? ऐसे में कैफ़ी आज़मी की नज़्म बरबस याद आती है 
  बने हो एक ख़ाक से कि 
  दूर क्या करीब क्या 
  जो एक हो तो क्यों न फिर 
  दिलों का दर्द बांट लो

कस्बे और शहर कंक्रीट के जंगल

एक अन्य सवाल के जवाब में मधु जी का कहना था कि हम क़स्बे और शहरों को कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर रहे हैं। जंगलों में सदियों से उगे, बसे पेड़ पौधों को आग में झौंक रहे है और पहाड़ के पेट में सुरंगें खोदने के रिकाॅर्ड बनाने की होड़ में लगे हैं। फिर प्रकृति भी क्या करे! यहां वहां वह अपना रौद्र रूप दिखा कर चेताने की कोशिश तो कर ही रही है।

संवेदनाएं कुदरती रचना

मधु जी का मानना है कि प्रकृति में समन्वय, संतुलन और लय प्राकृतिक रूप से विद्यमान है। इसलिए वहां जीवन की जीवंतता निरंतर प्रवाहमान है। हर मुश्किल, हर बाधा को पार करके। सुख दुख तो उसके साथ भी हैं। संवेदनाएं भी कुदरत की रचना हैं पर उसके लिए हमारी परवरिश, हमारे संस्कार और माहौल भी बहुत मायने रखते हैं। यहीं वह दृष्टि या समझ मिलती है जो मौन को पढ़ सकती है। हां, इसके लिए हमें प्रकृति की सरलता को आत्मसात करना होता है, वहीं उससे जीवन की जटिलताओं के बीच से ही सम्यक हल भी ढूंढ़ने होते हैं। कला भी तो संवेदनाओं, भावनाओं को स्पंदित करने की साधना है।

नैनीताल में जन्म

 नैनीताल में श्री बसंत बल्लभ डबराल और श्रीमती यशोदा के घर जन्मी मधु जी की प्राथमिक शिक्षा असम, बंगाल और देहरादून में हुई। आप दिल्ली विश्वविद्यालय से विज्ञान विषय स्नातक हैं तथा आगरा विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए, केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से अनुवाद में तथा जेएनयू दिल्ली से स्पेनिश भाषा में डिप्लोमा कोर्स कर चुकी हैं। मधु जी वर्ष 1984 से 1990 तक नाबार्ड और वर्ष 1990 से 2016 तक एनटीपीसी लिमिटेड दिल्ली में कार्यरत रहीं एवं वहीं से अपर महाप्रबंधक मानव संसाधन (राजभाषा) के पद से सेवानिवृत्त हैं।

आयोजनों की कुशल संचालक

 उल्लेखनीय है कि मधु जी को विभिन्न कवि सम्मेलनों एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों, संगीत समारोहों के कुशल संचालक के तौर पर भी जाना जाता है। इसके अलावा आप भारत सरकार के उपक्रमों की नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के सदस्य सचिव के रूप में तीन वर्षों तक संचालन कर चुकी हैं। मधु जी की कविताएं  स्त्री लेखा, गगनांचल, शांतिदूत, उत्तरा आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इसके अलावा ’विद्युत स्वर’ एवं ’लोर्का’ पत्रिकाओं की सहयोगी संपादक रह चुकी हैं।
मधु जी की रचनाएँ

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गुलदस्ता

न देखी उदासी
बिछड़ने का दर्द बेशक
घुल गया रंगों में 
सजाने
बेरंग दुनिया
सुनता ही नहीं कोई
कहानी उनकी
हर पल
याद आती है मां 
बूंद बूंद सहेजती
जीवन
नई दुनिया से मिलने
नम आंखों से 
भेजा था उसने
बहुत याद आती है 
उसकी हर बात
कि उदासी के रंगों से 
रहना दूर
महानगर की महामारी
तुम्हें छू न सके
दुआ है मेरी
हां मुस्कुराहटें
फैला देना हवाओं में
पढ़ लूंगी,सुन लूंगी
खिलखिलाहटें
संजोए रखूंगी ताउम्र
सीने में।

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इंतजार

भागती दौड़ती
जिंदगी
भीड़, भीड़ और भीड़ 
बक्सों में बंद ख्वाब 
रोज दौड़ पड़ते हैं यहां
दरबदर भटकती थकान
रोशनी ही रोशनी 
रात सोती है रोती हुई 
बंद दरवाजों, खिड़कियों से 
लौट जाती है हवा 
सहमी सी 
आईने में मुस्कुराते 
अक्स अपने ही 
खामोशी की बेचैन चहलक़दमी
तरसता है मन किसी आवाज़ को
अजनबी सी जिंदगी 
ढूंढ़ लेती है कैद 
काटती है सजा 
उदासी का बवंडर 
पटक देता है
घायल जिंदगी
रोप देती है यादों को 
करती है इंतजार।

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फैसला

आवाजें
उठती रहीं बार बार 
चट्टानों से टकरा टकराकर
लौट आती वहीं
थकी हारी निढाल
और
कद बढ़ता गया
दिन ब दिन उनका
पर बादल नहीं बैठे खामोश
न हवा ही 
झिंझोड़ा बार बार 
तो कभी सहलाया
उठो भी अब
मरे नहीं तुम
डरो मत ऊंचाई से।

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सच

बहुत कुछ हासिल किया हमने
जैसे रेत मुठ्ठी में 
बिखर तो गई पल भर में 
गहराई रेखाएं
समय की सलवटें
लिख रही थी कहानियां।

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ज़ख्म

समय की गर्द ओढ़े 
दरारें लिपटी रहीं
सूखे दरखत से 
शाखों में जकड़ी
कुछ बातें
रह गईं साथ
बस गए तुम
दूर उस पार
कहां झूलती होंगी 
खिलखिलाहटें 
अकेले सन्नाटे में
कांप जाता हूं मैं 
हां याद आते हो
याद भी है
आते थे तुम
भर आतीं थीं आँखें
और जख्म भी
खेलने लगता
एकांत
खुशनुमा रंगों से
सीख लिया तुमने भी
उड़ना साथियों सा
लौटोगे कभी
कभी तो
कुछ भी नहीं
बस खाली हाथ हूं मैं 
सहमे जर्द पत्ते सा
कब तक हूं कैसे कहूं
लिख डाला है एक ख़त 
हो सके तो ले जाना
गर मौसम बदला
कोंपलें आएंगी
देख जाना