धर्म संस्कृति : आत्मा के उत्थान का पर्व होते पर्युषण महापर्व
⚫ डॉ. संयमलता म सा ने कहा
⚫ आगम के पढ़ने से पहले दया ओर करुणा जरूरी : डॉ अमितप्रज्ञा म सा
नीलेश बाफना
रतलाम, 20 अगस्त। पर्वाधिराज महापर्व पर्युषण के प्रथम दिवस सैलाना वालों की हवेली आयोजित धर्मसभा मे जैन दिवाकरीय महासाध्वी डॉ. संयमलता मसा ने फरमाया की पर्वाधिराजका करे वेलकम हिंसा को करे कम। पर्व दो प्रकार के होते है लौकिक पर्व और लोकोत्तर पर्व । होली, दिवाली ,रक्षाबंधन ये लौकिक पर्व है। लोकोत्तर पर्व आत्मा के उत्थान के पर्व होते है। लोकोत्तर पर्व में होली, दिवाली, रक्षाबन्धन सबका समावेश होता है । जैसे होली में होलीका को जलाते है वैसे ही यँहा हमें अपनी भीतर की बुराइयों को जलाना है,दिवाली की सफाई की तरह आत्मा के कचरे की सफाई करना है। रक्षाबन्धन की तरह छः काया जीवों की रक्षा करना है।

कर्म निर्जरा का सर्वश्रेष्ठ पड़ाव महापर्व पर्युषण पर एक के साथ एक फ्री स्किम जो हमारा जीवन बदल देगी जिसमें उपवास में कमीं रह भी जाए तो उपहास से अवश्य बचना, दर्शन में कमीं रह भी जाए तो प्रदर्शन से अवश्य बचना, वन्दन में कमीं रह भी जाए तो बंधन से अवश्य बचना, प्रवचन श्रवण में कमीं रह भी जाए तो, दुर्वचन से अवश्य बचना, केश लोचन नहीं भी कर सकें तो क्लेश लोचन अवश्य करना, प्रतिक्रमण में कमीं रह भी जाए तो अतिक्रमण से अवश्य बचना, क्षमा मांगने में कमीं रह भी जाए तोप्राणी मात्र को क्षमा अवश्य करना ।
अहिंसा विषय पर प्रवचन फरमाते हुए महासाध्वी संयमलता मसा ने फरमाया की नेमिनाथ प्रभु ने उनके विवाह के निमित्त मूक पशुओं को मारकर माँसाहार भोजन बनेगा ये बात सुनकर विवाह से इनकार कर दिया और संयम ग्रहण कर गिरनार की और चले गए राजुल ने भी संयम ग्रहण कर लिया। और आज हम हम पग पग पर हिंसा कर रहे है, प्योर रेशम के कपड़े असंख्य रेशम की कीड़ो को गरम पानी में उबाल कर उनकी लार से बनते है,चमड़े के बेल्ट, मुलायम चमड़े के पर्स, लिपिस्टिक, सौंदर्य प्रसाधन, खरे मोती इन सब में असंख्य जीवों गायों, मछलियों, खरगोश की हत्या होती है। जिसमें आप सहभागी बन रहे है ।
धर्मसभा को डॉ अमितप्रज्ञा म सा ने सम्बोधित करते फरमाया की पर्वाधिराज पर्व पर्युषण की पहली किरण ने आपकी आत्मा को दस्तक दी इसलिये आप प्रवचन में पधारे है। एक सन्त ने एक नगर में परमात्मा की वाणी आगम के प्रकाशन के लिये चंदा एकत्रित करवाया, लेकिन उस वर्ष शहर में बाढ़ आ गई, तो सन्त ने वो धन बाढ़ पीड़ितो को दिलवा दिया। अगर वर्ष फिर इसके लिए चंदा एकत्रित किया लेकिन इस बार भूकम्प आ गया संत ने पुनः धन भूकम्प पीड़ितों को दिलवा दिया, तीसरे वर्ष फिर चंदा एकत्रित करवाया और इस बार आगम प्रकाशित हो गए, लेकिन आगम पर लिखा था तृतीय संस्करण। लोगों ने कहा यह तो पहला ही संस्करण है तो सन्त ने कहा पहला संस्करण बाढ़ में दया का और दूसरा भूकम्प में करुणा का छप चुका है । आगम के पढ़ने से पहले दिल में दया और करुणा होना ज्यादा जरूरी है। अपने दिल को दर्पण बनाओ दुरबीन मत बनाओ ।

धर्मसभा के बाद दिन मे प्रवचन हाल मे खुलजा सिम सिम प्रतियोगिता का आयोजन हुआ । सिद्धि तप तपस्वी कविता कटारिया का तप पूर्ण होने पर तपस्या की बोली लगाकर बहुमान किया गया जिसमें 1500 सामायिक की बोली भवँर लाल बाफना द्वारा ली गई ।प्रवचन के प्रारम्भ में अंतगड सूत्र का वांचन और दोपहर में कल्पसूत्र का वांचन किया गया।
Hemant Bhatt