अध्यात्म पथ पर 'गीता भारती ' के प्रथम सोपान को छुआ पंडित मुस्तफ़ा आरिफ़ ने
रचनाशीलता के विभिन्न दौर से गुज़रते हुए हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं पर गहरी पकड़ और आध्यात्मिक अनुभव रखने वाले आध्यात्मिक रचनाकार पंडित मुस्तफ़ा आरिफ़ ने श्री मद्भागवत गीता पर आधारित अपनी रचना "गीता भारत" का पहला अध्याय पूरा कर लिया है।
⚫ धर्म की दूरियों के बीच एक पुल बनने का पुनीत प्रयास करते पंडित मुस्तफ़ा
⚫ आशीष दशोत्तर
आध्यात्मिक विचार असीम होते हैं। इनकी कोई सीमा नहीं । इनके भीतर जो जितना डूबता जाता है उसे उतना ही आनंद आता है । आध्यात्मिक जीवन और दर्शन वस्तुत: हमारे परिवेश को निर्मित करते हैं। जब हम सब दूर से निराश हो जाते हैं तो आध्यात्मिकता में ही एक नई राह दिखाई देती है।
रचनाशीलता के विभिन्न दौर से गुज़रते हुए हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं पर गहरी पकड़ और आध्यात्मिक अनुभव रखने वाले आध्यात्मिक रचनाकार पंडित मुस्तफ़ा आरिफ़ ने श्री मद्भागवत गीता पर आधारित अपनी रचना "गीता भारत" का पहला अध्याय पूरा कर लिया है। गीता के 18 अध्याय और 786 छंदों को काव्यात्मक रूप में लाने की शुरुआत 54 छंदों के साथ गतिमान है।

इससे पहले उन्होंने कुरान शरीफ़ से प्रेरित 18 अध्यायों की 10,000 छंदों में रचना पूरी की है , जिसे ले कर संगीतकार ए.आर. रहमान 'सूरह रहमान' पर आधारित 40 छंदों की रचना पर काम कर रहे हैं। सुप्रसिद्ध भजन गायक श्री अनूप जलोटा भी पंडित मुस्तफ़ा आरिफ़ के पदों को अपने स्वरों से सजा रहे हैं।
पंडित मुस्तफ़ा आरिफ़ ने अभी गीता के प्रथम अध्याय, "अर्जुन-विषाद-योग" के 46 श्लोकों को 54 काव्यात्मक पदों में रूपांतरित किया है। इसे एक वीडियो एल्बम के लिए तैयार किया जा रहा है, जिसमें प्रत्येक एपिसोड में छह पद शामिल होंगे। भागवद गीता से प्रेरित "गीता भारती" में 786 पद 131 एपिसोड होंगे।

यह एक अनूठा और महत्वाकांक्षी प्रयास है, जो उनके काव्य-प्रेम, आध्यात्मिक गहराई, और रचनात्मक दृष्टिकोण को दर्शाता है। गीता के प्रथम अध्याय के 46 श्लोकों को 54 काव्यात्मक पदों को रचनात्मक विस्तार दे कर उन्होंने प्रत्येक श्लोक के भाव को गहराई से आत्मसात किया और उसे काव्य की लय में ढाला।
उदाहरण के लिए कुछ पदों का काव्य रूपांतरण देखिए ।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
धर्मस्यास्तु ध्रुवं ज्योतिः संभवामि युगे युगे॥
आओ सत्यमेव जयते कहे और करे सद्कर्म।
सार्थक हो जाए सृष्टि पर आना जनम जनम।।
यूं तो विश्व के सब धर्मग्रंथ ही है कर्म प्रधान,
परन्तु गीता का आगमन और उदगम सर्वप्रथम।।
परिश्रम करो कठोर, करो निष्काम कर्म।
फल की चिंता न करो, कर्म है मानव धर्म।
कर्म करो बस कर्म करो।
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भीष्म पितामह ने कर दिया युद्ध का सूत्रपात।
नाना प्रकार के वाद्य यंत्र बज उठे तत्पश्चात।
शंख नगाड़े तुरही ढोल भेरी का मच गया शौर,
उनका यह शौर भयंकर मचा रहा था उत्पात।
परिश्रम करो कठोर, करो निष्काम कर्म।
फल की चिंता न करो, कर्म है मानव धर्म।
कर्म करो बस कर्म करो।
आए माधव युद्ध भूमि में अर्जुन के संग प्रकट।
दिव्य शंख के साथ दिव्य अश्वो पर गये वो डट।
गूंज उठा शंखनाद उनका, हलचल हो गई भारी,
कौरव पांडव में युद्ध ठन गया, सम्मुख था संकट।
परिश्रम करो कठोर, करो निष्काम कर्म।
फल की चिंता न करो, कर्म है मानव धर्म।
कर्म करो बस कर्म करो।
स्वजन से स्वजन का सामना, माधव प्रत्यक्ष तौर प्रकट।
बना रहा है रण भूमि का वातावरण, माधव और विकट।
गुरू, पितामह, पुत्र सभी रणभूमि में हो रहें है दृष्टिगोचर,
है माधव क्युं द्रवित न हो, मन भले ही हो कितना जीवट।
परिश्रम करो कठोर, करो निष्काम कर्म।
फल की चिंता न करो, कर्म है मानव धर्म।
कर्म करो बस कर्म करो।
पार्थ बोले है मधुसूदन, मन है अजीब कशमकश में।
बंधु बांधव देख सामने, मस्तिष्क भी ही असमंजस में।
मामा, ससुर, पौत्र, साले सब है अपने नाते रिश्तेदार,
इन पर प्रहार करने का माधव, साहस नही है बस में।
परिश्रम करो कठोर, करो निष्काम कर्म।
फल की चिंता न करो, कर्म है मानव धर्म।
कर्म करो बस कर्म करो।
अधर्म घातक है, ध्यान रखना है नारी का हमें विशेष।
वर्ना वर्णसंकर की उत्पत्ति का भी, झेलना होगा क्लेश।
संस्कृति, संस्कार, सभ्यता नष्ट होने का न रहे संशय,
मार्ग ऐसा चले हम माधव, जिससे धर्म रहे हमारा शेष।
परिश्रम करो कठोर, करो निष्काम कर्म।
फल की चिंता न करो, कर्म है मानव धर्म।
कर्म करो बस कर्म करो।
विनाशकारी है कुल परंपरा विनष्ट होना बोले पार्थ।
दुष्कर्मो से अवांछित संतान उत्पत्ति ही है यथार्थ।
जाति-धर्म और रीति-रिवाज सब धूल धूसरित होते,
पारिवारिक कार्य विनष्ट होते विचलित होता परमार्थ।
परिश्रम करो कठोर, करो निष्काम कर्म।
फल की चिंता न करो, कर्म है मानव धर्म।
कर्म करो बस कर्म करो।
पार्थ बोले, हे माधव हाय! पाप कर रहें स्वार्थवश।
राज्य लोभ सुख की चाह में, सत्य न किया विमर्श।
स्वजन पर ही शस्त्र संभाले, कुल मर्यादा की प्रदुषित,
कैसे बचे सनातन सत्य, कैसे त्यागे हम व्यर्थ संघर्ष।
परिश्रम करो कठोर, करो निष्काम कर्म।
फल की चिंता न करो, कर्म है मानव धर्म।
कर्म करो बस कर्म करो।
पार्थ बोले है जनार्दन, सुनो मेरे मन की पुकार।
मैं निहत्था बिना प्रतिकार, सहुं धृतराष्ट्र का वार।
स्वजन से रहू अछूता, सनातन धर्म भी न हो नष्ट,
ऐसी मृत्यु है आदर्श, जो हो कुल सम्मत स्वीकार।
परिश्रम करो कठोर, करो निष्काम कर्म।
फल की चिंता न करो, कर्म है मानव धर्म।
कर्म करो बस कर्म करो।
और धनुर्धर अर्जुन, मन शोक से व्याकुल भारी।
बोले हे पार्थ, सुनो मेरे अंतस की व्यथा भी सारी।
रथ पर बैठ, धनुष त्यागा, छोड़कर युद्ध संनाद,
ज्यूं दयालू, निर्लिप्त, करें आत्मज्ञान की तैयारी।
परिश्रम करो कठोर, करो निष्काम कर्म।
फल की चिंता न करो, कर्म है मानव धर्म।
कर्म करो बस कर्म करो।
इस तरह गीता के श्लोकों का पंडित मुस्तफा आरिफ ने लयात्मकता के साथ और गीतात्मकता को ध्यान में रखते हुए अनुवाद किया है । यह कार्य बहुत कठिन भी है और महत्वपूर्ण भी । कठिन इसलिए कि आसान शब्दावली में किसी पूर्व रचना को ढालना वैसे ही बड़ा मुश्किल होता है और उस पर उसे पूरी तुकबंदी के साथ पूर्ण करना , किसी नई रचना को लिखने से अधिक परिश्रम वाला है । यह कार्य इसलिए भी सराहनीय है कि इसने आध्यात्मिक चेतना को जगाने के अपने महत्वपूर्ण मिशन को आगे बढ़ाया है।
पंडित मुस्तफ़ा आरिफ़ धार्मिक दूरियों को कम करने में लगे हैं । वे यह कहते हैं कि प्रत्येक धर्म का मूल विश्व शांति ही है। हर धर्म की प्रार्थनाएं शांति का संदेश ही देती हैं । यह संदेश जन-जन तक पहुंचना बहुत आवश्यक है । इसी संदेश को पहुंचाने के लिए ही वे जिस शिद्दत से क़ुरान शरीफ़ की आयतों का अनुवाद कर रहे हैं , उसी गहनता के साथ गीता के श्लोकों का भी अनुवाद कर रहे हैं ।
यह अनुवाद किताब के शक्ल में तो हमारे सामने आ ही रहा है , ऑडियो और वीडियो के रूप में भी इस देश के महत्वपूर्ण गायक - संगीतकार प्रस्तुत कर रहे हैं ।आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर पंडित मुस्तफ़ा आरिफ़ का यह प्रयास निस्संदेह प्रेरणादायक है ।आने वाले समय में जब यह कार्य पूर्ण होगा तब इस कार्य की आभा बहुत दूर तक फैलेगी, हमें यक़ीन है।

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Hemant Bhatt