धीमी जांच, बेपरवाह तंत्र: तीन साल बाद आई मिलावटी घी की रिपोर्ट, तब तक सेहत से खिलवाड़ करते रहे कारोबारी

सालों तक आम जनता की जान से खेलने वाली कंपनियों पर महज जुर्माना और चेतावनी देकर छोड़ देना क्या प्रशासनिक लाचारी को नहीं दर्शाता? जब तक खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं की रफ्तार में सुधार नहीं होगा और मिलावटखोरों पर समय रहते त्वरित और कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आम जनता की सेहत यूं ही सिस्टम की लापरवाही की बलि चढ़ती रहेगी।

धीमी जांच, बेपरवाह तंत्र: तीन साल बाद आई मिलावटी घी की रिपोर्ट, तब तक सेहत से खिलवाड़ करते रहे कारोबारी

हरमुद्दा डॉट कॉम के विशेष कॉलम 'खरी-खरी' में प्रमुखता से उठाया मुद्दा

​​मध्यप्रदेश की प्रयोगशालाओं का लचर रवैया

​ ₹5 लाख का जुर्माना, 5 प्रतिवादियों पर कार्रवाई

⚫​ मुद्दे की बात : क्या चेतावनी और जुर्माने से सुधरेगी सेहत?

​हरमुद्दा
रतलाम, 22 सितंबर। (मध्य प्रदेश)। ​जब भोजन में मिलावट सीधे थाली तक पहुंच रही हो, तब प्रशासन का सुस्त रवैया किस कदर आमजन की सेहत पर भारी पड़ता है, इसका जीता-जागता उदाहरण रतलाम में सामने आया है। खाद्य विभाग की प्रयोगशाला से जांच रिपोर्ट आने में पूरे तीन साल लग गए। इस लंबी अवधि में अमानक खाद्य सामग्री बेचने वाली कंपनियों ने कितना माल बाजार में खपाया और कितने लोगों की सेहत से खिलवाड़ हुआ, इसका कोई हिसाब तंत्र के पास नहीं है।

हरमुद्दा डॉट कॉम के विशेष कॉलम 'खरी-खरी' में प्रमुखता से उठाया मुद्दा

इस गंभीर लापरवाही और जनस्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे को 20 सितंबर 26 को हरमुद्दा डॉट कॉम के विशेष कॉलम 'खरी-खरी' में प्रमुखता से उठाए जाने के बाद अब जाकर विभाग की नींद टूटी है।

​मामला: 2023 में लिए सैंपल, 2026 में सामने आई हकीकत

​खाद्य सुरक्षा अधिकारी ज्योति बघेल द्वारा 28 अक्टूबर 2023 को जावरा स्थित फर्म मनीष सेल्स (62 कोठी बाजार) का निरीक्षण किया गया था। इस दौरान विक्रेता मनीष (पिता वासुदेव चंचलानी) के पास से 'शक्ति भोग घी' एवं 'अमृत प्योर घी' के नमूने लेकर राज्य स्तरीय प्रयोगशाला भेजे गए थे।
​प्रयोगशाला की सुस्त कार्यप्रणाली का आलम यह रहा कि जांच रिपोर्ट आने में तीन साल लग गए। रिपोर्ट में दोनों घी के नमूने अमानक (Substandard) स्तर के पाए गए।

​₹5 लाख का जुर्माना, 5 प्रतिवादियों पर कार्रवाई

मामले में प्रस्तुत दस्तावेजों और लैब रिपोर्ट के आधार पर न्याय निर्णायक अधिकारी एवं अतिरिक्त जिला दण्डाधिकारी (एडीएम) रतलाम, बृजेन्द्र रावत द्वारा सख्त रुख अपनाते हुए पांचों प्रतिवादियों पर कुल ₹5 लाख (1-1 लाख रुपये) का जुर्माना अधिरोपित किया गया है। इतना ही नहीं जनसंपर्क विभाग ने तो हद कर दी जो नाम अंग्रेजी में लिखे थे उसकी हिंदी करने की भी जहमत नहीं उठाई।

⚫ ​मनीष सेल्स (विक्रेता, जावरा, रतलाम)

⚫ ​कॉम्फी एग्रो प्रा. लि. (पंजाब)

⚫ ​एंजेल ट्रेडिंग कंपनी (इंदौर)

⚫ ​बाल गोपाल डेयरी उत्पाद (कोटा, राजस्थान)

⚫ ​एस.टी. ट्रेडर्स (इंदौर)

​कड़ा आदेश: यदि एक सप्ताह के भीतर जुर्माने की राशि जमा नहीं की जाती है, तो इसे भू-राजस्व बकाया के रूप में वसूला जाएगा। जुर्माना राशि जमा होने तक संबंधित खाद्य प्रतिष्ठान का लाइसेंस (अनुज्ञप्ति) निलंबित रहेगा। वहीं, जब्त माल को नियमानुसार विनिष्ट (Destroy) करने के आदेश दिए गए हैं।

मुद्दे की बात : क्या चेतावनी और जुर्माने से सुधरेगी सेहत?

​ प्रयोगशाला की रिपोर्ट के बाद विभाग ने खानापूर्ति करते हुए भविष्य में नियमों का पालन करने की 'चेतावनी' देकर इतिश्री कर ली। लेकिन यह कार्रवाई कई बड़े और तीखे सवाल छोड़ती है।

3 साल तक अमानक माल बिकता रहा

जब तक लैब रिपोर्ट आई, तब तक यह अमानक घी प्रदेश और देश के हजारों घरों में इस्तेमाल हो चुका था। आमजन की सेहत को पहुंचे नुकसान का जिम्मेदार कौन है?

​मध्यप्रदेश की प्रयोगशालाओं का लचर रवैया

 क्या राज्य की खाद्य प्रयोगशालाएं इतनी सुस्त हैं कि एक सैंपल की जांच में सालों लग जाएं? अगर रिपोर्ट ही सालों बाद आएगी, तो मिलावटखोरी पर लगाम कैसे लगेगी?

​सिर्फ चेतावनी ही क्यों?

सालों तक आम जनता की जान से खेलने वाली कंपनियों पर महज जुर्माना और चेतावनी देकर छोड़ देना क्या प्रशासनिक लाचारी को नहीं दर्शाता? जब तक खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं की रफ्तार में सुधार नहीं होगा और मिलावटखोरों पर समय रहते त्वरित और कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आम जनता की सेहत यूं ही सिस्टम की लापरवाही की बलि चढ़ती रहेगी।