नवरात्रि विशेष : जहां मां श्री कालिका स्वयं रात्रि में अपना श्रृंगार करती, ऐसी जनश्रुति 

नवरात्रि की नवमी तिथि को मंदिर की पावन 'बाड़ी' उठाई जाती है, जो विशाल चल समारोह के रूप में श्मशान तक जाती है। वहाँ विशेष हवन के पश्चात इसका विसर्जन किया जाता है। इस अलौकिक दृश्य के दर्शन एवं माँ के आशीर्वाद के लिए हजारों की संख्या में नगरवासी एवं ग्रामीण उपस्थित रहते हैं।

नवरात्रि विशेष : जहां मां श्री कालिका स्वयं रात्रि में अपना श्रृंगार करती, ऐसी जनश्रुति 

⚫ आस्था, इतिहास और परम्परा का संगम

⚫ आगर मालवा का प्रसिद्ध श्री कालका माता (माँ महाकाली) मंदिर जहां नवरात्रि में उमड़ता है जन आस्था का सैलाब

⚫ जगदीश चंद्र मालवीय

जिला मुख्यालय आगर नगर में काशीबाई स्मारक के समीप स्थित माँ महाकाली का श्री कालका माता मंदिर आगर-मालवा जिले का प्रमुख शक्तिपीठ एवं श्रद्धा का केन्द्र है। वर्ष भर यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है, वहीं शारदीय नवरात्र में यहाँ आस्था का जन-सैलाब उमड़ पड़ता है।

इतिहास एवं प्राकट्य 

मंदिर पुजारी सागरमल राजोरिया के अनुसार मंदिर का प्राकट्य अत्यंत चमत्कारिक माना जाता है। वर्तमान मंदिर स्थल पर प्रारंभ में केवल एक त्रिशूल स्थापित था। माँ कालिका के प्राकट्य से पूर्व पंडित-पुजारी को 'जत्रा' के दौरान अलौकिक संकेत प्राप्त हुए थे। इसके कुछ समय पश्चात समीप ही  धोबी गली मे राम लाल सोलंकी (राठौर) के मकान की नींव की खुदाई के दौरान माँ कालिका की प्राचीन पाषाण प्रतिमा भूगर्भ से प्राप्त हुई, जिसे विधि-विधान से वर्तमान गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया गया। यह घटना मंदिर के प्राचीन होने की पुष्टि करती है।

पुरातात्विक महत्व 

मंदिर के मुख्य गर्भगृह में माँ महाकाली की तेजस्वी पाषाण प्रतिमा के साथ माँ हिंगलाज एवं भैरव महाराज की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। गर्भगृह से प्राप्त प्रतिमा की बनावट एवं शिल्प शैली प्राचीन मालवा की मूर्तिकला से साम्यता रखती है। मंदिर में विगत 38 वर्षों से अनवरत प्रज्वलित अखंड ज्योत का विशेष महत्व है, जो हिमाचल प्रदेश स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ माँ ज्वालामुखी मंदिर से लाई गई थी। यह ज्योत मंदिर की अखण्ड परम्परा एवं देश के शक्तिपीठों से इसके जुड़ाव का प्रतीक है।

मान्यताएं, जनश्रुति एवं जन आस्था 

मां श्री कालिका स्वयं रात्रि में अपना श्रृंगार करती है जनश्रुति

स्थानीय किंवदंती के अनुसार माँ श्री कालिका रात्रि में स्वयं अपना श्रृंगार करती हैं। पुजारी जी के अनुसार गर्भगृह में रखी गई श्रृंगार सामग्री अगली सुबह प्रायः अस्त-व्यस्त मिलती है, जिसे भक्त माँ की प्रत्यक्ष उपस्थिति एवं लीला मानते हैं।

 'चटक से पट्टा' की अनूठी परम्परा 

 मंदिर में कार्यसिद्धि के लिए 'चटक से पट्टा' मिलने की अनूठी परम्परा प्रचलित है। मान्यता है कि जब किसी भक्त को माता की ओर से यह संकेत प्राप्त होता है, तो उसके बिगड़े एवं रुके हुए कार्य निश्चित रूप से सफल हो जाते हैं।

संतान प्राप्ति की आस्था 

निःसंतान दम्पतियों के लिए यह धाम विशेष आस्था का केन्द्र है। संतान प्राप्ति की कामना लेकर आने वाले श्रद्धालु मंदिर परिसर में पालने या झूले बांधते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु पुनः आकर कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

परम्परा एवं पूजा पद्धति 

मंदिर में वैदिक एवं तांत्रिक दोनों परम्पराओं के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है। प्रतिदिन प्रातः एवं सायं नियमित आरती एवं पूजन होता है। प्रत्येक माह की अमावस्या की रात्रि को मंदिर में विशेष एवं गुप्त तांत्रिक पूजा का आयोजन किया जाता है। तांत्रिक परम्परा के तहत मन्नत पूर्ण होने पर श्रद्धालुओं द्वारा पारम्परिक परम्पराओं का निर्वहन किया जाता है।

मंदिर का प्रबंधन 

मंदिर का प्रबंधन एवं पूजा-पाठ की सम्पूर्ण व्यवस्था मंदिर पुजारी परिवार द्वारा परम्परागत रूप से की जा रही है। पुजारी श्री सागरमल राजोरिया एवं उनके परिवार द्वारा मंदिर की साफ-सफाई, नित्य पूजन, अखंड ज्योत की व्यवस्था एवं आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है। नवरात्र जैसे विशेष पर्वों पर स्थानीय प्रशासन एवं नगर के स्वयंसेवी युवाओं द्वारा व्यवस्था में सहयोग प्रदान किया जाता है।

विशेष आयोजन 

शारदीय नवरात्र  शारदीय नवरात्रि में मंदिर का माहौल अत्यंत ऊर्जावान रहता है। पूरे नौ दिन माँ का विशेष अनुष्ठान, श्रृंगार एवं अखण्ड पाठ चलता है। पहले अष्टमी की मध्यरात्रि में श्मशान में विशेष हवन आयोजित होता था, जहाँ मान्यता के अनुसार माँ 'अग्नि स्नान' करती थीं। वर्तमान में यह विशेष हवन महाअष्टमी की रात्रि को मंदिर परिसर में ही वैदिक विधि से सम्पन्न होता है।

बाड़ी विसर्जन एवं चल समारोह 

नवरात्रि की नवमी तिथि को मंदिर की पावन 'बाड़ी' उठाई जाती है, जो विशाल चल समारोह के रूप में श्मशान तक जाती है। वहाँ विशेष हवन के पश्चात इसका विसर्जन किया जाता है। इस अलौकिक दृश्य के दर्शन एवं माँ के आशीर्वाद के लिए हजारों की संख्या में नगरवासी एवं ग्रामीण उपस्थित रहते हैं।

श्रद्धालुओं की संख्या 

सामान्य दिनों में प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु माँ के दर्शन हेतु पहुँचते हैं। नवरात्र के दौरान यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। नवमी के चल समारोह एवं बाड़ी विसर्जन के अवसर पर 10 हजार से अधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति रहती है। माँ कालका का यह धाम आगर-मालवा जिले की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख प्रतीक है।

⚫ जगदीश चंद्र मालवीय, आगर मालवा
(जैसा श्री कालिका माता मंदिर आगर के पुजारी श्री सागरमल राजोरिया एवं स्थानीय माता भक्तों ने जैसा बताया।)