स्मृति चित्र : इस बार मां दिया नहीं जलाएगी

स्मृति चित्र : इस बार मां दिया नहीं जलाएगी

स्मृति चित्र : इस बार मां दिया नहीं जलाएगी

⚫ आशीष दशोत्तर

इस बार माॅं दिया नहीं जलाएगी । दुनिया के अंधेरों को दूर करने के लिए कितने ही दिए माॅं ने जलाए। सबके लिए दीप जलाते - जलाते माॅं अपने दिए को बुझने से नहीं रोक सकी। 

यह माॅं के बगै़र पहली दिवाली है । होश संभालने के बाद से अब तक माॅं को ही दिया जलाते देखा । कभी ऐसा नहीं हुआ की माॅं ने किसी दीपावली पर दीप न जलाए हों। दीपावली ही क्या, माॅं ने तो जीवन के हर अंधकार को दीप जलाकर दूर किया । परिवार के प्रेम को उसकी रोशनी से सराबोर किया । रिश्तों की रक्षा इसी रोशनी से की ।  माॅं ने कई - कई दीप जलाए। हमारे भीतर हौसलों के दीप जलाए । हमारी ज़िन्दगी में शिक्षा का दीप जलाया । विषमताओं के अंधकार को दूर कर आत्मनिर्भर बनाया। आत्मविश्वास से जीना सिखाया। 


बीते वर्षों में कई ऐसे लम्हे सामने आए , जब बहुत से अंधकार हमारे चारों और खड़े थे । अभाव का अंधकार , असमानता का अंधकार , अस्पष्टता का अंधकार, अन्याय का अंधकार , माॅं ने इन सभी अंधकारों को अपने भीतर जलते दीप की रोशनी से दूर किया । माॅं ने इतने इतने दीप जलाए कि हम ज़िन्दगी में अब तक जहां-जहां पहुंचे , वहां-वहां माॅं का जलाया एक दीप सामने आ गया । किसी राह पर चलने में मुश्किल आई तो उस रोशनी ने हिम्मत बंधाई । किसी निराशा ने घेरा तो वहां आशा का एक दीप जला नज़र आया।


रोशनी का संस्कार माॅं ही देती है । वही अंधकार से मुकाबला करने की ताक़त देती है। विपरीत परिस्थितियों में माॅं ही हमारे आगे ढाल बनकर खड़ी होती है । हम अपने भीतर जिस ऊर्जा को महसूस करते हैं , वह मां के जलाए गए दीप की ही ऊर्जा है । हम अपने भीतर जिस शक्ति को पाते हैं, वह मां के जलाए दीप की ही शक्ति है। मां कभी अपने लिए कोई दीप नहीं जला सकी लेकिन घर की देहरी पर हर रोज़ दीप जलाती । पीपल के क़रीब हर  शाम दिया रखती। तुलसी क्यारी पर दिया रखना नहीं भूलती । और भी कहां-कहां माॅं ने दिए रखे होंगे, इन बीते वर्षों में । हम तो जिस तरफ़ भी देखते हैं , मां का जलाया हुआ दीप ही नज़र आता है।


मां की दुनिया कितनी रोशन थी ,यह अब महसूस होता है । पूरे घर की सफाई मां अकेले लिए ही किया करती । कच्चे घर को गोबर से लीपती। दीवारों की पुताई करती । घर के किसी कोने में भरे पड़े अटाले को साफ़ करती। बखारी को बुहारती । जहां-जहां सफाई करती , वहां एक दीप रखना नहीं भूलती । कहती , ' इन सभी जगहों से मिलकर ही यह घर बना है । इस घर का हर कोना रोशन होना चाहिए।' 


पिंजारन कभी रुई देने आने में देर कर देती तो माॅं उससे नाराज़गी जताती और कहती कि तुम्हारी रुई जब तक नहीं आएगी, घर में दिया कैसे जलेगा ? कितना अपनत्व था मां के बनाए रिश्तों में । उन रिश्तों की तुलना किसी से नहीं की जा सकती । आज के दौर में तो ऐसे रिश्तों की बात करना भी बेमानी है। मां ने ऐसे कई रिश्ते अपनी आत्मीयता के आलोक से जगमग किए । ऐसी कई बातियाॅं तैयार की जिन्होंने कई ज़िंदगियों को रोशन किया।


माॅं किसी अंधकार से घबराती नहीं थी । कितनी भी बड़ी मुश्किल हो , वह उसका डटकर मुकाबला करती । हमें भी ऐसी ही राह पर चलना सिखाया । हम ही क्या , हर माॅं  अपने बच्चों को इसी तरह तैयार करती है कि उन्हें किसी भी रास्ते पर कभी कोई अंधकार न मिले । अगर मिले भी तो वह उनका डटकर मुकाबला कर सके । मां के भीतर का आत्मविश्वास उस दिए की रोशनी के कारण ही था , जो उसके भीतर सदैव जलता रहा । वह कभी किसी से नाराज़ नहीं हुई । किसी से कोई गिला - शिकवा नहीं किया । किसी के ऊपर कोई क्रोध नहीं किया । जब भी मिली, जिस किसी से मिली ,हंसकर मिली । किसी भी काम को कभी बोझ नहीं समझा। हर काम मुस्कुरा कर किया । घर का काम हो ,बच्चों को पढ़ाने का काम हो, हमें संस्कार देने का काम हो ,चूल्हा फूंकने का काम हो , मेहमानों की आवभगत करने का काम हो , हर काम माॅं के लिए सामान्य था । माॅं को कभी किसी काम से कोई एतराज़ नहीं हुआ। सुबह सूरज के निकलने से पहले जागना और रात में पूरे घर भर को सुला कर सोना । यह माॅं के जीवन का हिस्सा रहा। इस दौरान दिन भर में माॅं कितने ही दीप जलाती रही । कितने ही लोगों को संबल देती रही । कितनी ही मुसीबतों को पार करती रही । कितनी ही जिंदगियों को हंसाती रही।


माॅं के एक मौन ने हमारी ज़िन्दगी के आलोक को कम कर दिया । अब माॅं दिए नहीं जलाएगी । बस , उन दियों में नज़र आएगी , जो यहां-वहां जलकर अपने आसपास के अंधकार को दूर करने का प्रयास करेंगे । मां उस जगह भी नज़र आएगी, जहां तिमिर की हार और रोशनी की जीत हो रही हो । मां उस गुलिस्तां में भी नज़र आएगी, जहां सौहार्द्र के सुमन महक रहे होंगे। मां उस वक़्त भी नज़र आएगी, जब समानता के भाव को साकार किया जा रहा हो । माॅं हर उस रोशनी में नज़र आएगी ,जो ज़िन्दगी को बेहतर बनाती है ।जिंदगी को आगे बढ़ाती है । बेशक , इस बार माॅं के हाथों का जला दिया नहीं होगा ,मगर जितने दिए जलते हुए दिखेंगे उनमें मां का ही अक़्स नज़र आएगा। 

⚫ 12/2, कोमल नगर 
रतलाम (म.प्र.)
मो. 9827084966