खरी खरी : प्रशासनिक ‘इच्छाशक्ति’ का अभाव और दम घुटती ‘उत्सव नगरी’ रतलाम
रतलाम की जनता को खोखले आश्वासन नहीं, बल्कि सड़क पर उतरकर काम करने वाली इच्छाशक्ति चाहिए। यदि समय रहते इन अव्यवस्थाओं पर नकेल नहीं कसी गई, तो 'उत्सव नगरी' की पहचान पूरी तरह 'समस्या नगरी' में बदल जाएगी, और इसकी पूरी जवाबदेही स्थानीय प्रशासन और नगर निगम की होगी।
⚫ हेमंत भट्ट
जावरा में हाल ही में पुलिस और प्रशासन की मुस्तैदी ने जिस तरह एक तनावपूर्ण स्थिति को संभालकर गणेश विसर्जन का पर्व शांतिपूर्ण संपन्न कराया, उसने एक बात तो साफ कर दी है—प्रशासन यदि ठान ले, तो कानून व्यवस्था और शांति कायम करना उसके लिए चंद मिनटों और बाय हाथ का काम है। लेकिन बड़ा और कड़वा बात यह है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति का यह 'जावरा मॉडल' जिला मुख्यालय यानी रतलाम शहर में दाखिल होते-होते आखिर गायब क्यों हो जाता है?
रतलाम जिसे कभी सांस्कृतिक वैभव और भाईचारे के लिए 'उत्सव नगरी' कहा जाता था, आज अव्यवस्था, बहरे कर देने वाले शोर और बेकाबू अतिक्रमण की गिरफ्त में आकर सिसक रही है।
कानों को फाड़ती 'वाहवाही' और थमती सांसें
शहर में धार्मिक व सामाजिक आयोजनों का उत्साह स्वागत योग्य है, लेकिन शक्ति प्रदर्शन और सस्ती वाहवाही की होड़ में आयोजनों का दायरा इतना बढ़ा दिया गया है कि आम नागरिक का जीवन हराम हो चुका है। अनुमतियाँ बांटने वाले अधिकारियों को शायद इस बात का अहसास ही नहीं है कि बिना तय समय और सीमा के निकलने वाले विशाल चल समारोह पूरे शहर की रफ्तार थाम देते हैं।
हद तो तब हो जाती है जब सर्वोच्च न्यायालय के नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए आधी-आधी रात तक डीजे का जानलेवा शोर बजता रहता है। रुद्राक्ष कॉलोनी के 40 वर्षीय युवक की झांकी देखकर लौटने के बाद हार्ट अटैक से हुई दुखद मौत केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि इस कानफोड़ू शोर प्रणाली द्वारा ली गई 'बलि' है। सवाल यह है कि नियमों को ठेंगे पर रखने वाले डीजे चालकों और उन्हें मौन सहमति देने वाले अफसरों पर गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज क्यों न किया जाए?
कागजी दावे और धरातल पर 'सब्जी-फल' का कब्जा
महापौर एसी कमरों में बैठकर दावा करते हैं कि उनके अधिकारी और कर्मचारियों की उनकी 'पैनी नजर' पूरे शहर पर है और सड़कों पर कोई अतिक्रमण नहीं है। लेकिन यह 'नजर' केवल फाइलों तक सीमित है। हकीकत देखनी हो तो तोपखाना मार्ग, गौशाला रोड और खान बावड़ी रोड की तरफ रुख कीजिए—सड़कें सब्जी और फल विक्रेताओं की निजी जागीर में तब्दील हो चुकी हैं।
जिन्हें कुछ समय पहले ढोल-नगाड़ों के साथ नो-वेडिंग ज़ोन का पाठ पढ़ाकर बाहर किया गया था, वे फल-सब्जी वाले फिर से बिंदास ठेले लगा रहे हैं। कई जगह तो ठेले के आकार से चार गुना ज्यादा जगह सड़क पर घेरकर व्यवसाय किया जा रहा है। दिगंबर जैन मंदिर के पास की स्थिति यह है कि खरीदार सड़क के बीचों-बीच अपनी गाड़ियाँ खड़ी कर देते हैं, जिससे चंद मिनटों में घंटों लंबा जाम लग जाता है। नगर निगम का अतिक्रमण अमला क्या सिर्फ वेतन उठाने और औपचारिक दौरों के लिए बैठा है?
सुस्त यातायात व्यवस्था और लाचार सिस्टम
शहर की सड़कें बारिश से कम, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और अतिक्रमण की 'बाढ़' से ज्यादा प्रभावित हैं। यातायात पुलिस की भूमिका केवल कुछ प्रमुख चौराहों पर चालान काटने तक सीमित रह गई है। चल समारोहों के मार्ग, पार्किंग व्यवस्था और वैकल्पिक रास्तों का कोई पूर्व नियोजित रोडमैप नजर नहीं आता।
जावरा की घटना के बाद आला अधिकारियों को सबक लेना चाहिए। जब आप एक संवेदनशील स्थिति को मुस्तैदी से नियंत्रित कर सकते हैं, तो रतलाम की दैनिक समस्याओं, अतिक्रमण, जानलेवा डीजे शोर और ध्वस्त यातायात—पर लाचारी क्यों?
तो जिम्मेदारी होगी इनकी
रतलाम की जनता को खोखले आश्वासन नहीं, बल्कि सड़क पर उतरकर काम करने वाली इच्छाशक्ति चाहिए। यदि समय रहते इन अव्यवस्थाओं पर नकेल नहीं कसी गई, तो 'उत्सव नगरी' की पहचान पूरी तरह 'समस्या नगरी' में बदल जाएगी, और इसकी पूरी जवाबदेही स्थानीय प्रशासन और नगर निगम की होगी।
Hemant Bhatt