शख्सियत : साहित्य में सत्ता और पुरस्कारों के बीच दूरी होना बहुत ज़रूरी

ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, बुकर या नोबेल जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार लेखकों को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच प्रदान करते हैं, लेकिन क्या ये पुरस्कार हमेशा शुध्द रूप से साहित्यिक योगदान पर आधारित होते हैं? अक्सर राजनीति की छाया इनकी चयन प्रक्रिया पर पड़ती है, जिससे सवाल उठता है कि क्या वास्तव में प्रतिभा को उचित और निष्पक्ष सम्मान मिल पा रहा है?

शख्सियत : साहित्य में सत्ता और पुरस्कारों के बीच दूरी होना बहुत ज़रूरी

⚫ कवयित्री संगीता बहुगुणा का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’साहित्य समाज का दर्पण होता है और साहित्यिक पुरस्कार उस दर्पण को चमकाने का माध्यम हैं। यह पुरस्कार न केवल लेखक की रचनात्मकता और गहन चिंतन को सम्मानित करते हैं, बल्कि साहित्य की सामाजिक भूमिका को भी मजबूत करते हैं। ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, बुकर या नोबेल जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार लेखकों को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच प्रदान करते हैं, लेकिन क्या ये पुरस्कार हमेशा शुध्द रूप से साहित्यिक योगदान पर आधारित होते हैं? अक्सर राजनीति की छाया इनकी चयन प्रक्रिया पर पड़ती है, जिससे सवाल उठता है कि क्या वास्तव में प्रतिभा को उचित और निष्पक्ष सम्मान मिल पा रहा है? राजनीतिक विचारधारा, क्षेत्रीय संतुलन, सत्ता के दबाव या वैचारिक निकटता कभी- कभी निर्णयों को प्रभावित करती है, जिससे साहित्य की मूल शुध्दता और निष्पक्षता पर सवालिया निशान लग जाता है। साहित्य में सत्ता और पुरस्कारों के बीच दूरी होना बहुत जरूरी है।’


 यह बात हिंदी कवयित्री संगीता बहुगुणा ने कही। इन्होंने बताया कि साहित्यिक पुरस्कारों में राजनीति का हस्तक्षेप कोई नई बात नहीं है। प्राचीन काल से ही कवि और लेखक राजकीय संरक्षण पर निर्भर रहे हैं, लेकिन यह संरक्षण उनकी रचनाओं की गुणवत्ता से अधिक राजभक्ति या विचारधारा पर आधारित होता था। आधुनिक भारत में यह प्रवृत्ति और स्पष्ट दिखाई देती है। साहित्य अकादमी पुरस्कारों के संदर्भ में देखें तो 2015 का वर्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा, जब असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दे पर कई प्रमुख लेख्कों ने अपने पुरस्कार लौटा दिए थे।

पुरस्कार वापसी का दौर

हिंदी के प्रसिध्द लेखक उदय प्रकाश ने अपनी कृति ’मोहनदास’ के लिए मिले साहित्य अकादमी पुरस्कार को कन्नड लेखक एम. एम. कलबुर्गी की हत्या के विरोध में लौटाया था। इसी तरह पंजाबी लेखिका दलिप कौर टिवाना सहित कई अन्य रचनाकारों ने राजनीतिक दखलंदाजी और बढ़ती हुई असहिष्णुता के खिलाफ यह कदम उठाया। इन घटनाओं ने स्पष्ट किया कि पुरस्कार चयन में कभी-कभी वैचारिक पूर्वाग्रह या सत्ता के प्रति निष्ठा हावी हो जाती है।

पुरस्कारों में राजनीति का रंग

 एक सवाल के जवाब में संगीता जी ने कहा कि यदि कोई लेखक सत्ता विरोधी या संवेदनशील सामाजिक मुद्दों पर लिखता है तो उसकी प्रतिभा को अनदेखा किया जा सकता है, जबकि सत्ता के अनुकूल रचनाएं आसानी से सम्मान पा लेती हैं। साहित्य के पुरस्कारों में भी राजनीति का रंग भर गया है। साहित्यकार कामयाबी नहीं बल्कि राजनीतिक पहुंच के कारण पुरस्कार पा रहे हैं। सही मूल्यांकन किए बिना एक संस्था व्दारा इस साल गोरखपुर की कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ को ’लम्ही पुरस्कार’ नवाज दिया। वरिष्ठ लेखिकाओं ने इसकी चैतरफा आलोचना की तो उन्हें यह पुरस्कार वापस करना पड़ा।

भेदभाव के शिकार

 संगीता जी ने कहा कि हिंदी साहित्य संस्थानों व्दारा कृति, उसकी भाषा व विचारधारा का मूल्यांकन किए बिना पुरस्कार देने पर हो रही राजनीति की आलोचना साहित्यकारों ने की है। साहित्यकार की प्रशंसा उसके मूल्यांकन पर आधारित होना चाहिए न कि संबंधों के बलबूते। कुछ साहित्यिक संस्थानों में जो आयोजक हैं, उनमें न तो एक अच्छे साहित्यकार का और न एक अच्छे राजनेता का गुण है। पुरस्कार पा लेने से कोई योग्य नहीं बन सकता। साहित्यकारों को पुरस्कार देने में भेदभाव हो रहा है। राजनेताओं तक वही पहुंच बनाते हैं जो पुरस्कार पाने के लिए उनकी प्रशंसा भरी कृतियां प्रस्तुत कर रहे हैं।

संतीता जी की कविताओं में पहाड़ों का जीवन संघर्ष

 उत्तराखंड में जन्मी और वहीं रह रही संगीता बहुगुणा की कविताओं में उत्तराखंड के पहाड़ों का जीवन संघर्ष अनेक रूपों और ध्वनियों के साथ उजागर है। यह जीवन बाहर से जितना सुंदर और शांत दिखाई देता है, असल में वह बुनियादी सुविधाओं की कमी और प्राकृतिक चुनौतियों की कमी के बीच एक कड़ा संघर्ष है और यह सभी इनकी कविताओं में ध्वनित होता है। पहाड़ों पर पक्की सड़कें बनना बहुत कठिन है। लोगों को रोजाना कई-कई किलोमीटर पथरीले, ऊंचे नीचे रास्तों पर पैदल चलना होता है। वहां महिलाएं दुर्गम रास्तों पर चलकर अपनी पीठ पर घास जलावन की लकड़ियां ढोती असमय बूढी हो जाती हैं। वहां रोजगार के संसाधन नहीं हैं न उद्योग धंधे, ऐसे में पर्यटन एक मात्र आय का जरिया है और यह उत्तराखंड के चारधाम सहित विभिन्न तीर्थ स्थलों पर निर्भर है। इसी जीवन के विभिन्न रूप इनकी कविताओं में प्रकारांतर से आए हैं। इनकी एक कविता है ’प्रयाग गीत’ जिसमें इन्होंने उत्तराखंड के समस्त तीर्थों का वैभव उनकी विशेषताओं के साथ अभिव्यंजित किया है।

पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित

संगीता की कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इसके अलावा कई साझा संकलनों में कविताएं संग्रहित हैं। इन्हें विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। इनमें 2021 का नेशनल सुपर 7 पुरस्कार में टाप 25, उत्तराखंड साहित्य गौरव पुरस्कार वर्ष 2021, तेजस्विनी पुरस्कार 2022, हार्वल्ड वल्र्ड रिकार्ड पुरस्कार 2023 शामिल हैं। आपका जन्म चमोली (उत्तराखंड) में स्व. परमानंद जोशी तथा श्रीमती मनोरमा जी के घर हुआ। आप गोचर जिला चमोली में शिक्षिका हैं।

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संगीता जी की कविताएँ

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प्रयाग गीत

पावन उत्तराखंड मनोरम
भारत भू का हृदय 
पंच प्रयागों  संग पांच बदरी-
केदारों  का आलय है।
विष्णु प्रयाग में अलकनंदा
धौली गंगा से मिलती 
प्रेम पगा पीहर संदेशा
कल- कल, छल- छल कहती है।
चल दी विष्णु जी की महिमा
गाती गीत सुधामय 
नंदप्रयाग में अलकनंदा 
नंदाकिनी को बुलाती 
सुनकर पीड़ा नंदाकिनी की
बाहों में भर लेती है।
शीलासमुद्र और नंदाघुंघटी की 
स्मृति करती निर्भय  
कर्णप्रयाग में पिंडारी
हिमनद से पिंडर आती
अलकनंदा को कर्ण की गाथा
कृष्ण की सीख सुनाती है।
उमा महेश का संगम  पर
मिलता वरदान जयाजय
संगम अलकनंदा
मंदाकिनी का रूद्र प्रयाग में है 
त्याग और तप की ऊष्मित करती
ऊर्जा जन-तन-मन में है।
रुद्र की तपस्थली का यश
करता जीवन ज्योतिर्मय है
देवप्रयाग में भागीरथी
हिलोर उमंग से भरती
अलकनंदा भी नव वधू सी
नमन निवेदित करती हैं। 
मिलकर गंगा हो जाती फिर
देती मोक्ष-अनामय है।

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वक्त बताएगा

किसका परचम लहराएगा 
वक्त बताएगा
जीवन कितना चल पाएगा 
वक्त बताएगा
कटते कानन, मरते निर्झर, 
दबते कलरव द्विज के
प्रश्रय ,जल, मारुत बिन जीवन
वक्त बताएगा
जल बिन सूखे धारे नौले, नैना रीते रीते
कब इनके भी दिन बहुरेंगे
वक्त बताएगा
अति गर्मी, अति सर्दी
अति बरसे ये बादल 
अब  कितना संकट बरपेगा 
वक्त  बताएगा
कितनी ही सरिताएं
बह-बह आ मिटती हैं
कब तक सागर भर पाएगा
वक्त बताएगा
घाटी में है सेंध  लगाते 
शिखरों को पिघलाते
हिमनद कब तक बह पाएगा
वक्त बताएगा
इस माटी में जन्मे
फिर मिट्टी ही बन जाना
इस मिट्टी पर हमने किया क्या
वक्त बताएगा।

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जीवन एक रंगमंच

एक रंग मंच है जीवन 
तू रंग जमाता चल
किरदार हैं अपने-अपने
बस इन्हें निभाता चल
कोई और नहीं है कारण
हम सबके जीवन का
अपना  ही  बही खाता है 
बस इसे चुकाता  चल
जीवन के इस छोटे से
नाटक के कितने  अंक  
कब पर्दा गिर-विर जाए 
इसे पूरा करता चल
कितने दुःखों पर अपनी
पलकों को भिगोओगे
अश्कों में भी तो नमक है
मत घाव लगता चल
सब कठपुतली हैं यहां 
जाने किसके हाथों डोर!
नहीं बस में किसी के कुछ
बस लचक-मटकता चल
क्षण भंगुर इस जीवन का 
पल-पल  बेदर्द  बड़ा
हैं आसमान भर शिकवे
मिट्टी में दबाता  चल
बेढंग बहुत दुनिया में
जीवन जीने के  ढंग
हैं व्यर्थ भाव सब ’संगी’ 
मौके तलाशता चल।

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बदलते रिश्ते

आलमी काकी
ठक-ठक लाठी चलाती
निर्जन से रास्ते पर 
चली जा रही है
खाँसने का उपक्रम करते हुए
आवाज से सन्नाटे को
चीर लेने की चाह में 
उसकी स्मृतियों  में 
तैरती रहती वे सँकरी पगडंडिया़़ं
कितनी रहती थी गुलजार
आवागमन और आवाजों से 
ठहाकों और किलकारियों  से
मुर्दे भी शमशान जाते 
मानो खुश होते थे राह में
हर किसी के घर में 
आते थे रिश्तेदार 
रहते थे मन - भर 
कई-कई दिनों तक 
अपरिचित वे सभी लोग
बन जाते थे इतने अपने
कि लोग बुला लाते  थे 
उन्हें मातम और ब्याह में
कितनी बेबसी है आज
कोई नहीं है पास 
संतति, जिन पर गर्व था कभी
आज अनाथ से छोड़ गए हैं
इक्का - दुक्का घरों में 
तारों सी दिखती रोशनी
इतनी ही बची है आस भी 
पर पीड़ा़ बहुत है आह में
सब कुछ बदल गया
रीति-रिवाज, लगाव
पहनाव रिश्ते-नाते
नहीं बदली तो सिर्फ
आस, उनसे, अपनेपन की
जिनके लिए दे दिया
यह जिस्म, यह मिट्टी 
ये हाथों की सभी लकीरें
जिन पर लिखा था शायद भाग्य
लाठी की आवाज
अब और तेज हो गई
ठक-ठक, ठक-ठक
इन बदलते रिश्तों को
समझने की थाह में।

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कौन खजाना लुटा गया है

कौन  खजाना  लुटा  गया है
तेरी  मुस्कानों  पर 
कौन मिट गया घुलकर तेरी
मीठी सी बातों पर
किसने दी रक्तिम कपोल पर
सर्द हवा की थपकी 
किससे  बातें  करती तेरी
लड़ी केश की खुलकर
किससे नैन  सजल होते है
कौन चुराता काजल 
कौन है भरता स्वप्न सुनहरे
नैन, धूप से धुल कर
कौन हास करता होठों पर
ऋतु बसंत सरसाता
कौन तुम्हारे मद में भरकर
हंसता है अब गुल पर
किसकी बोली दंत पंक्ति पर
बैठ दामिनी दमकी
किसकी बातें हुई निछावर
मिश्री जैसी घुलकर
कौन हथेली पर उसकी वह
नर्म छुवन रखता है 
कौन है खोता सुध बुध पग पर
घुंघरू जैसा तुलकर
कौन गीत गाकर मन का, 
संगीत सुना जाता है
कौन छलक जाता है हृदय से
कविता जैसी बहकर।