शहर की बेहाली और जवाबदेही का अकाल: आवारा कुत्तों का आतंक से लेकर विकास के नाम पर भ्रष्टाचार तक
कागजी आदेशों को घोलकर पी जाने वाले और जनता की गाढ़ी कमाई को लीपापोती की भेंट चढ़ाने वाले यदि अब भी नहीं चेते, तो रतलाम की जनता का आक्रोश किसी बड़े बदलाव का सबब बन सकता है। विकास विज्ञापनों में नहीं, ज़मीन पर दिखना चाहिए!
हेमंत भट्ट
शहर की कालोनियों, सड़कों, गलियों मुहल्लों में दौड़ते आवारा कुत्तों के खौफ से सहमा हर शख्स, महीनों से धूल फांकती सड़कें और विकास के नाम पर हो रही कागजी बयानबाजी—यह रतलाम की आज की कड़वी सच्चाई है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों से लेकर स्थानीय जनता के गुस्से तक, सब कुछ व्यवस्था के बहरे कानों और भ्रष्टाचार के दलदल में खो गया है। सवाल यह है कि आखिर आम जनता कब तक इन लापरवाहियों का खमियाजा भुगतती रहेगी?
आवारा कुत्तों का आतंक

शिकार के लिए एक्शन की मुद्रा में
सुप्रीम कोर्ट का आदेश और निगम की गहरी नींद
अगस्त 2025 में देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि सभी नगर निगमों, नगर परिषदों और अन्य स्थानीय निकायों को आवारा और खतरनाक कुत्तों के प्रबंधन के लिए पुख्ता व्यवस्था करनी होगी। लेकिन रतलाम नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों ने इस आदेश को मानो हवा में उड़ा दिया है।
दान में मिली जमीन पर भी चुप्पी
शेल्टर होम के लिए दानदाताओं द्वारा जमीन उपलब्ध कराए भी 5 महीने बीत चुके हैं, लेकिन ज़मीन पर कोई ईंट तक नहीं रखी गई। नतीजा यह है कि शहर की हर कॉलोनी और मोहल्ले में आवारा कुत्तों का आतंक सिर चढ़कर बोल रहा है।
जान-माल दोनों का नुकसान
स्थिति यह है कि छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का घर से बाहर निकलना मुहाल हो गया है। झुंड के झुंड घूम रहे ये कुत्ते आए दिन राहगीरों को अपना शिकार बना रहे हैं। इसके अलावा, टू-व्हीलर की सीटें फाड़ना और फोर-व्हीलर के कवर्स को नुकसान पहुंचाना आम बात हो गई है—जिससे जनता को शारीरिक पीड़ा के साथ-साथ गंभीर आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ रहा है।
'छपास' की प्रवृत्ति और खोखले आश्वासन का नाटक
विकास के दावों की पोल खोलती चांदनी चौक से बाजना बस स्टैंड तक की सड़क इसकी बानगी है। पिछले 13 महीनों से यह मार्ग प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ा हुआ है। जब क्षेत्र के आक्रोशित रहवासियों ने मजबूरन चक्का जाम किया, तब जाकर नगर निगम की नींद टूटी।
पटकथा वाला ड्रामा: मौके पर पहुंचे महापौर और कमिश्नर ने जनता का गुस्सा सुना, औपचारिकता निभाई और 15 मिनट का वह एपिसोड खत्म हो गया। महापौर जी अपने वजूद की पुंगी बजाते रहे और नागिन की तरह कमिश्नर का सर नाच रहा। कमिश्नर भी कम पड़ने वाले में नहीं थे उन्होंने भी नहले पर दहला मार दिया। 58 दिन में नहीं हुआ काम तो नौकरी से ले लूंगा विश्राम। ऐसा प्रतीत होता था कि पूरी पटकथा पहले से ही तय थी—जनप्रतिनिधि बोलेंगे और जनता ताली बजाएगी ताकि कैमरे के सामने तस्वीरें चमक सकें।
फोटोज और पब्लिसिटी
इस पूरे घटनाक्रम में सिर्फ अखबारों में सुर्खियां छपीं, फोटो चमकीं और संपर्क सूत्र बढ़े। छपास के पिपासु इन जिम्मेदारों को शायद यह अहसास ही नहीं है कि जब तक शहर की समस्याएं जिंदा रहेंगी, तब तक उनकी कार्यशैली पर सवाल उठते रहेंगे।
बजट का खेल और कमीशनखोरी का दीमक
जब निर्माण कार्य शुरू होते हैं, तो उसमें भी भ्रष्टाचार का दीमक लग जाता है। बहाना यह बनाया जाता है कि महंगाई के कारण डामरीकरण संभव नहीं है और डामर के भाव 60% तक बढ़ गए हैं।
बजट का गणित: कोई यह नहीं बताता कि इस कार्य के लिए पहले ही अनुमानित बजट से कई गुना राशि स्वीकृत की जा चुकी है। जहाँ बुनियादी काम कम लागत में हो सकता है, वहाँ भारी-भरकम बजट के बावजूद गुणवत्ता से समझौता किया जाता है। आंकड़ों में दिखाया जाता है कि इतने करोड़ के विकास कार्य हो गए।
नुकसान जनता का: स्पष्ट है कि यह घाटा महंगाई का नहीं, बल्कि कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार का है, जिसकी कीमत आम जनता अपनी जेब और सुरक्षा से चुका रही है। इसके बावजूद भी स्तरीय कार्य नहीं हो पाते हैं।
रिपेयरिंग के नाम पर लीपापोती और कमजोर होती आंखें
शहर के विभिन्न हिस्सों में पाइपलाइन डालने के बाद सड़कों की मरम्मत के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही है। न्यू रोड, सिविक सेंटर के सामने और अन्य कॉलोनियों में हाल ही में किए गए सीमेंट-कंक्रीट के कार्य 15 दिन भी नहीं टिक पा रहे हैं।
उखड़ती सड़कें: सड़क की परतें उखड़ रही हैं, गिट्टियां बाहर निकल रही हैं और सड़कें पूरी तरह से उबड़-खाबड़ हो चुकी हैं।
निरीक्षण पर सवाल: इस घटिया निर्माण को देखने वाले इंजीनियरों की नजरें या तो कमजोर हो चुकी हैं या फिर वे व्यवस्था की इस लापरवाही पर आंखें मूंदकर बैठे हैं।
खरी-खरी बात
कागजी आदेशों को घोलकर पी जाने वाले और जनता की गाढ़ी कमाई को लीपापोती की भेंट चढ़ाने वाले यदि अब भी नहीं चेते, तो रतलाम की जनता का आक्रोश किसी बड़े बदलाव का सबब बन सकता है। विकास विज्ञापनों में नहीं, ज़मीन पर दिखना चाहिए!
Hemant Bhatt