रतलाम की ऐतिहासिक धरोहर: 79 वर्षों से सामाजिक समरसता की मिसाल बना राणीजी मंदिर प्रवेश दिवस

रतलाम की यह ऐतिहासिक घटना इस बात की गवाही देती है कि जब सामाजिक बदलाव की शुरुआत होती है, तो वह पीढ़ियों तक एक प्रेरणास्रोत बन जाती है। राणीजी मंदिर प्रवेश की यह 79वीं वर्षगांठ आज भी समाज को समानता, समरसता और बंधुत्व का पाठ पढ़ा रही है।

रतलाम की ऐतिहासिक धरोहर: 79 वर्षों से सामाजिक समरसता की मिसाल बना राणीजी मंदिर प्रवेश दिवस

⚫ ​रतलाम के धानमंडी स्थित अजबकुंज बिहारी मंदिर (राणीजी मंदिर) में मंदिर प्रवेश की 79वीं वर्षगांठ का हर्षोल्लासपूर्वक आयोजन

⚫ ​महर्षि वाल्मीकि सनातन धर्मसभा एवं विकास समिति द्वारा पूजा-अर्चन और वंदन कर इस ऐतिहासिक दिन को किया याद 

⚫ ​24 अक्टूबर 1947 को प्रकाशित रतलाम दरबार गजट के माध्यम से हरिजन समुदाय की 13 जातियों को मिला मंदिर प्रवेश 

⚫ रुढ़िवादिता को समाप्त करते हुए महात्मा गांधी के विचारों को दिया मूर्त रूप

हरमुद्दा
रतलाम, 24 अक्टूबर। ​रतलाम की माटी ने हमेशा से देश को सामाजिक समरसता और भाईचारे का एक अनूठा संदेश दिया है। इसी गौरवशाली परंपरा का निर्वाह करते हुए महर्षि वाल्मीकि सनातन धर्मसभा, विकास समिति रतलाम के अध्यक्ष पं. शिवपाल छप्री और संयोजक कमल भाटी वाल्मीकि के नेतृत्व में समिति के सदस्यों ने धानमंडी स्थित ऐतिहासिक राणीजी मंदिर (अजबकुंज बिहारी मंदिर) पहुंचकर मंदिर प्रवेश की 79वीं वर्षगांठ पर विशेष पूजन-अर्चन किया।

⚫ ​ऐतिहासिक अवसर: रतलाम के धानमंडी स्थित अजबकुंज बिहारी मंदिर (राणीजी मंदिर) में मंदिर प्रवेश की 79वीं वर्षगांठ का हर्षोल्लासपूर्वक आयोजन किया गया।

⚫ ​गौरवशाली परंपरा: महर्षि वाल्मीकि सनातन धर्मसभा एवं विकास समिति द्वारा पूजा-अर्चन और वंदन कर इस ऐतिहासिक दिन को याद किया गया।

⚫ ​रियासतकालीन गजट: 24 अक्टूबर 1947 को प्रकाशित रतलाम दरबार गजट के माध्यम से हरिजन समुदाय की 13 जातियों को मंदिर प्रवेश का अधिकार मिला था।

⚫ सामाजिक समरसता का प्रतीक: तत्कालीन महाराजा श्रीलोकेन्द्रसिंह जी द्वारा रुढ़िवादिता को समाप्त करते हुए महात्मा गांधी के विचारों को मूर्त रूप दिया गया था।

इतिहास के पन्नों से: क्या है 24 अक्टूबर 1947 का महत्व?

​उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय से शोधकार्य (पी.एच.डी.) कर रही शोधार्थी पूजा खरे (छप्री) ने इस ऐतिहासिक घटना पर प्रकाश डालते हुए बताया कि देश की आजादी के ठीक बाद और रतलाम रियासत के भारतीय संघ में विलय से पूर्व, 24 अक्टूबर 1947 को रतलाम दरबार गजट (असाधारण, नोटिफिकेशन नंबर 8622) प्रकाशित किया गया था।
​तत्कालीन मंत्री के.सी. शर्मा के हस्ताक्षर और राजमुद्रा से जारी इस गजट में हरिजन समुदाय के अंतर्गत 13 अनुसूचित जातियों (बलाई, बांसफोड़, बरबुंडा, मेहत्तर, बागरी, भांभी, चमार, कोली, महार, भंग, पारधी, पासी और खटिक) को आधिकारिक रूप से शामिल किया गया था।

​महाराजा श्रीलोकेन्द्रसिंह जी का ऐतिहासिक कदम

उस ऐतिहासिक दिन विजयादशमी (विजय दिवस) का पर्व था। रतलाम के तत्कालीन महाराजा श्री लोकेन्द्रसिंह जी ने महात्मा गांधी के विचारों और राष्ट्रीय विचारधारा को साकार करते हुए समाज की रूढ़िवादिता को खत्म करने का ऐतिहासिक कदम उठाया। महाराजा द्वारा अपनी पूज्यनीय दादी अजबकुंवर द्वारा बनवाए गए धानमंडी स्थित राणीजी मंदिर में हरिजन समुदाय के भाइयों को बड़े स्नेह, सम्मान और आदर के साथ हजारों नागरिकों की साक्षी में मंदिर प्रवेश कराया गया था। इस दौरान बाधा पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई थी।

कार्यक्रम में गरिमामयी उपस्थिति

​मीडिया प्रभारी रोहित भाटी ने बताया कि ​इस प्रेरणादायक और ऐतिहासिक आयोजन में समिति के पदाधिकारी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे, जिनमें प्रमुख रूप से मंदिर के पुजारी गोपाल कृष्ण चतुर्वेदी, ​नगर पुरोहित पं. शिवपाल छपरी, ​कमल भाटी वाल्मीकि (संयोजक) अशोक हाडे, सुरेंद्र आर्य, मुकेश खरे, रवि चनाल, राजू कल्याणे, श्याम छपरी, शुभम चनाल, सुरेंद्र गोसर, सुनील गोरन, शिवांश छपरी, जय श्री देवहंस एवं विकास हंस उपस्थित रहे।

समानता, समरसता और बंधुत्व का पाठ पढ़ा रही समाज को

रतलाम की यह ऐतिहासिक घटना इस बात की गवाही देती है कि जब सामाजिक बदलाव की शुरुआत होती है, तो वह पीढ़ियों तक एक प्रेरणास्रोत बन जाती है। राणीजी मंदिर प्रवेश की यह 79वीं वर्षगांठ आज भी समाज को समानता, समरसता और बंधुत्व का पाठ पढ़ा रही है।