रतलाम में सत्ता के रसूक के आगे बेबस आमजन
यह सिर्फ एक मार्ग के बंद होने का मामला नहीं, बल्कि आम आदमी के बुनियादी अधिकारों और प्रशासनिक संवेदनहीनता का प्रतीक बन गया है। जब तक आम जनता की सुविधा के बजाय राजनीतिक रसूख और धनबल को प्राथमिकता मिलती रहेगी, तब तक शहरवासी ऐसे ही जाम और प्रताड़ना के चक्रव्यूह में पिसते रहेंगे।
⚫ चौमुखी पुल से गणेश देवरी मार्ग बंद
⚫ जाम से जूझते रहे लोग
हरमुद्दा
रतलाम, 23 अक्टूबर। शहर के मुख्य व्यावसायिक केंद्र और हृदय स्थल कहे जाने वाले चौमुखी पुल से गणेश देवरी तक के व्यस्त मार्ग को गुरुवार रात से अचानक बंद किए जाने से आम नागरिकों, दुकानदारों और राहगीरों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। एक निजी बड़ी दुकान के उद्घाटन और रसूखदारों के दबाव के चलते मुख्य मार्ग को अवरुद्ध कर दिए जाने से पूरा क्षेत्र ट्रैफिक जाम की चपेट में आ गया।

आम जनता के इस रोजमर्रा के रास्ते को कथित तौर पर 'बपौती' मानकर बंद किए जाने से शुक्रवार सुबह से लेकर रात तक अफरा-तफरी का माहौल बना रहा।

प्रशासन की दोहरी नीति: आमजन पर सख्ती, रसूखदारों की रखवाली
स्थानीय नागरिकों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, स्थिति को नियंत्रित करने के बजाय जिला और पुलिस प्रशासन पूरी तरह रसूखदारों की सेवा में तत्पर नजर आया।
पुलिस की मनमानी: शुक्रवार सुबह करीब 11:30 बजे जब एक व्यक्ति ने पुलिसकर्मियों से अनुरोध किया कि उसे महज चार दुकान आगे सामान की डिलीवरी देनी है, तो पुलिस ने उसकी एक नहीं सुनी। नियम और सहूलियत का हवाला देने के बजाय पुलिस ने डंडे का दम दिखाया। हद तो तब हो गई जब एक सहयोगी पुलिसकर्मी उस आम नागरिक का वीडियो बनाने में व्यस्त दिखा, जिसके बाद उस व्यक्ति को मजबूरन भारी पैकेट अपने कंधों पर उठाकर पैदल ले जाना पड़ा।

बेरिकेटिंग और यातायात डायवर्जन: चौमुखी पुल, भुट्टा बाजार तिराहा और गणेश देवरी मार्ग पर बिना किसी पूर्व सूचना के बैरिकेड्स लगा दिए गए। इससे शहर का मुख्य ट्रैफिक गलियों में भटकता रहा। वहां पर भी अतिक्रमण और सड़कों पर सामान ने यातायात अवरुद्ध किया मगर देखने वाला कोई नहीं था
पार्किंग की व्यवस्था शून्य, सड़क पर कब्जा

मार्ग बंद करने के बावजूद उद्घाटन वाली दुकान और आसपास के क्षेत्र में पर्याप्त पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं थी।
दोपहर ढलते ही स्थिति बेकाबू हो गई: सड़क के दोनों किनारों पर अनियोजित ढंग से वाहन खड़े कर दिए गए। सड़क के बीचों-बीच वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। हालात ऐसे थे कि दोपहिया वाहन चालकों और पैदल चलने वालों के लिए भी गुजरना मुश्किल हो गया। चार पहिया और तीन पहिया वाहन चालकों ने तो इस रास्ते से गुजरने की सोचना ही बंद कर दिया।

जनता का आक्रोश: "आखिर कब तक कुबेरपतियों की चाकरी करेगा प्रशासन?"
इस घटनाक्रम के बाद शहर की आम जनता में भारी आक्रोश व्याप्त है। स्थानीय लोगों का सवाल है कि क्या शहर के मुख्य मार्गों को चंद रसूखदारों की कमाई और आयोजनों के लिए गिरवी रख दिया गया है? आमजन का पेट्रोल, समय और मानसिक सुकून दांव पर लगाकर सिर्फ इसलिए परेशानी बढ़ाई गई ताकि कुछ लोग अपनी धौंस जमा सकें।
यहां पर भी आंखें मूंदी रही
शहर की सड़कों के पोल पर भी बेतहाशा बैनर होर्डिंग नजर आए जहां पर कभी होर्डिंग नहीं लगे वहां पर भी लगाए गए। इस कारण वाहन चालक भी परेशान हुए मगर इस मुद्दे पर भी जिला प्रशासन और जिम्मेदार आला अधिकारी आंखें मूंदे रहे।
खुले तौर पर जनता का सवाल
जनता ने खुले तौर पर सवाल उठाया है कि क्या जिला और पुलिस प्रशासन सिर्फ पूंजीपतियों और सत्ता के करीबियों की चाकरी के लिए है? व्यवस्था के इस रवैये से आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यह सिर्फ एक मार्ग के बंद होने का मामला नहीं, बल्कि आम आदमी के बुनियादी अधिकारों और प्रशासनिक संवेदनहीनता का प्रतीक बन गया है। जब तक आम जनता की सुविधा के बजाय राजनीतिक रसूख और धनबल को प्राथमिकता मिलती रहेगी, तब तक शहरवासी ऐसे ही जाम और प्रताड़ना के चक्रव्यूह में पिसते रहेंगे।
Hemant Bhatt