साहित्य सृजन : एक ख़त जो कभी भेजा नहीं मैंने

एक ख़त जो कभी भेजा नहीं मैंने, तेरी याद में सलामत उसे रखा है मैंने। जिसमें मेरी शब-ए-तन्हाइयाँ छिपी थीं, शब-ए-दर्द की गहराइयाँ लिखी थीं मैंने।

साहित्य सृजन : एक ख़त जो कभी भेजा नहीं मैंने

⚫ मंजुला पांडे "मंजुल"

एक ख़त जो कभी भेजा नहीं मैंने,
तेरी याद में सलामत उसे रखा है मैंने।
जिसमें मेरी शब-ए-तन्हाइयाँ छिपी थीं,
शब-ए-दर्द की गहराइयाँ लिखी थीं मैंने।

बचपन की  मासूमियत,  खिलखिलाते दिन,
मिट्टी की खुशबू में सिमटे हुए  सुनहरे दिन,
गुड़ियों के खेल  काग़ज़ की कश्तियों का सफ़र,
हर छोटी-सी ख़ुशी को मुकम्मल लिखा था मैंने।

 लड़कपन की  बेख़ुदी, वो अनकही उमंगें,
आँखों में पलते ख़्वाब, दिल में उठती तरंगें,
कुछ ख़ताएँ, कुछ शरारतें, कुछ नादानियाँ,
हर मासूम फ़ितरत का हिसाब लिखा था मैंने।

माँ का नेह था,ममता की रवानी जैसा,
पिता का दुलार ,सिर पर आसमानी जैसा,
उनकी दुआओं की छाँव में पला था जीवन,
हर उस अहसान को दिल से लिखा था मैंने।

दोस्तों की दोस्ती,वो बेफ़िक्र ज़माना,
बिन कहे दर्द समझना, बिन कहे मुस्कुराना,
जो राह में मिले, जो उम्र भर साथ रहे,
हर रिश्ते का एक नाम लिखा था मैंने।

गुरु की सीख थी,अँधेरों में दीपक जैसी,
भटके हुए क़दमों को मिली मंज़िल की रेखा जैसी,
जो अक्षर उन्होंने दिए, वही जीवन-मंत्र बने,
हर  ज्ञान को प्रणाम उस ख़त में लिखा था मैंने।

फिर उम्र ने बदला अपना रंग, बदली रवानी,
जवानी ने सिखाई ख़्वाबों की निगहबानी,
कुछ ख़्वाब मुकम्मल हुए, कुछ अधूरे रह गए,
हर ख़्वाब की एक दास्तान लिखी थी मैंने।

ज़िंदगी की राह में काँटे भी बहुत मिले,
कुछ अपने मिले, कुछ अजनबी बहुत मिले,
किसी ने हौसला दिया, किसी ने तोड़ दिया,
हर शख़्स का मुझ पर असर लिखा था मैंने।

गिरना भी लिखा था, सँभलना भी लिखा था,
हार के बाद फिर से निकलना भी लिखा था,
जीत की चमक से अधिक संघर्ष की तपिश,
अपने हर इम्तिहाँ का सफ़र लिखा था मैंने।

कुछ रिश्ते वक़्त की आँधी में बिखर गए,
कुछ अपने होकर भी दिल से उतर गए,
कुछ नाम दुआ बनकर रह गए दिल में,
कुछ नामों को ख़ामोशियों में दफ़्न लिखा मैंने।

संवेदनाओं के शिखर पर जाकर देखा,
ख़ुद को कई बार टूटकर सँवरते देखा,
आँखों में समंदर था, होंठों पर ख़ामोशी,
हर अश्क का एक अर्थ लिखा था मैंने।

जो पाया, उसे शुक्र की तरह सँजोया,
जो खोया, उसे सब्र की तरह ढोया,
ज़िंदगी ने जो दिया, उसी से सीखकर
जीने का अपना फ़लसफ़ा लिखा था मैंने।

न कोई शिकायत थी, न कोई इल्ज़ाम था,
हर ज़ख़्म के पीछे कोई अपना ही नाम था,
जो कह न सकी दुनिया से कभी खुलकर,
वो सब उस ख़त के नाम लिखा था मैंने।

और आख़िर में बस इतना ही लिख पाई,
तू मेरी मंज़िल था या राह का कोई साया,
ये फ़ैसला मैं भी वक़्त पर छोड़ आई,
बस तुझको अपना एक राज़दार लिखा था मैंने।

एक ख़त जो कभी भेजा नहीं मैंने,
अपनी पूरी ज़िंदगी उसमें रख दी थी मैंने।
लिफ़ाफ़े में बंद था एक गुज़रा हुआ ज़माना,
हर साँस, हर धड़कन, हर अरमाँ लिखा था मैंने।

डर था,पढ़ेगा तो शायद समझ न पाएगा,
मेरे ख़ामोश लफ़्ज़ों को शायद पढ़ न पाएगा,
इसलिए उसे भेजने की हिम्मत न कर सकी,
अपने सीने में ही उसे महफ़ूज़ रखा है मैंने।

एक ख़त जो कभी भेजा नहीं मैंने,
तेरी याद में सलामत उसे रखा है मैंने। 

4 अक्टूबर 2026

 ⚫ मंजुला पांडे "मंजुल" उत्तराखंड