साहित्य सृजन : टूटन
⚫ रंजनालता, समस्तीपुर
तुम हर जगह
कुछ-न-कुछ जोड़ते रहते हो—
टूटे तार,
बिखरे खिलौने,
मुरझाए पौधे,
उदास चेहरे...
मगर...
जब हमारे बीच
कुछ टूटता है-

तुम
न जाने कहाँ चले जाते हो।
तुम्हें उस समय
न कोई टूटा तार दिखाई देता है,
न कोई मुरझाया पौधा,
न कोई उदास चेहरा...
बस,
हम दिखाई नहीं देते
तुम्हें।
या शायद
बहुत साफ़ दिखाई देते हैं—
इसीलिए
नज़रें फेर लेते हो।
काश!
तुम समझ पाते
हर टूटन को
जोड़ना ज़रूरी नहीं होता,
कभी-कभी
सिर्फ़ पास बैठ जाना भी
बहुत होता है।

⚫ रंजनालता, समस्तीपुर
Hemant Bhatt