शख्सियत : सोशल मीडिया के कारण ग्रामीण और शहरी लेखकों के बीच कम हुई दूरियां
परिवेश में अंतर के कारण देहाती और शहरी लेखकों की रचनाओं में बहुत फर्क देखने को मिलता है। ग्रामीण जीवन सादगी, प्रकृति और शांति का प्रतीक है। इसके विपरित, शहरी जीवन आधुनिकता, तेज रफ्तार और विकास का केंद्र है। दोनों के अपने लाभ और कमियां हैं। शहरी लेखन में प्रतिस्पर्धा से उपजी जीवन स्थितियों का वर्णन अधिक होता है। ग्रामीण क्षेत्रों के रचनाकारों की रचनाएं एक आयामी अधिक होती हैं। उनमें जीवन की आपाधापी का वर्णन कम मिलता है।
⚫ कवयित्री निर्मला सिन्हा का कहना
⚫ नरेंद्र गौड़
’ग्रामीण और शहरी लेखकों के बीच दूरी लगातार बढ़ रही थी, लेकिन सोशल मीडिया आने के बाद देहाती क्षेत्रों के रचनाकारों की भी बढ़िया रचनाएं सामने आने लगी हैं। इस तरह सोशल मीडिया ग्रामीण और शहरी लेखकों के बीच दूरी को कम करने में अहम् भूमिका निभा रहा है।’

यह कहना था छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ क्षेत्र के ग्राम जामरी की कवयित्री निर्मला सिन्हा का। इनका मानना है कि परिवेश में अंतर के कारण देहाती और शहरी लेखकों की रचनाओं में बहुत फर्क देखने को मिलता है। ग्रामीण जीवन सादगी, प्रकृति और शांति का प्रतीक है। इसके विपरित, शहरी जीवन आधुनिकता, तेज रफ्तार और विकास का केंद्र है, जहां व्यापार और नौकरियां मुख्य होती हैं। दोनों के अपने लाभ और कमियां हैं। शहरी लेखन में प्रतिस्पर्धा से उपजी जीवन स्थितियों का वर्णन अधिक होता है। ग्रामीण क्षेत्रों के रचनाकारों की रचनाएं एक आयामी अधिक होती हैं। उनमें जीवन की आपाधापी का वर्णन कम मिलता है।
प्रकाशन के संसाधन नहीं
एक सवाल के जवाब में निर्मला जी ने कहा कि देहातों में प्रकाशन के संसाधन नहीं होते हैं, ऐसे में ग्रामीण रचनाकारों की श्रेष्ठ रचनाएं भी छप नहीं पाती हैं, जबकि शहरी रचनाकारों को प्रकाशन के भरपूर अवसर मिलते हैं। आजकल सोशल मीडिया के चलन ने कुछ बदलाव अवश्य लाया है जिसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों के लेखक भी अपनी रचनाएं पोस्ट कर रहे हैं।
ग्रामीण आयोजनों में कविता पाठ
निर्मला जी ने बताया कि अब सोशल मिडिया इतना एक्टिव हो गया है कि मुझे अपने गांव का बच्चा-बच्चा कवि के रूप में जानता है। यहां तक कि किसी कार्यक्रम के दौरान लोग मेरी रचनाएं पढ़ने या गाने की परमिशन मांगने आते हैं। हमारे गांव में आये दिन महिला समूह की मिटिंग होती है, वहां भी मुझ से कविताएं सुनाने का आग्रह किया जाता है। स्थानीय स्तर के अखबारों में भी मेरी रचनाएं प्रकाशित होती रहती हंै। इसलिए सभी मुझे जानते हैं। वहीं सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय रहती हंू। इनकी रचनाएं दैनिक भास्कर, हरिभूमि, छत्तीस गढ़ झलक, लखनऊ का अभियान, धमाका न्यूज, इंदौर समाचार, जबलपुर दर्पण, युग जागरण, अमर उजाला आदि में प्रकाशित होती रहती हैं।
बनना चाहती थी कलेक्टर
निर्मला जी का जन्म भिलाई में श्री संतराम सिन्हा तथा श्रीमती सोनिया के घर हुआ। इन दिनों यह छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ क्षेत्र के ग्राम जामरी में रहती हैं। आप ’निशा’ उपनाम से कविताएं लिखती हैं। इन्हें बचपन से ही लिखने पढ़ने का शौक रहा है। इन्होंने बताया कि यह पढ़ लिखकर कलेक्टर बनना चाहती थी, लेकिन कम उम्र में शादी कर दिए जाने के कारण यह सपना अधूरा रह गया। निर्मला जी ने बताया कि कोरोना काल में इन्होंने गांव के बच्चों को निःशुल्क ट्यूशन पढ़ाकर शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आप कविताएं, ग़ज़ल, शेरो शायरी, गीत और आलेख लिखती हैं। इनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, जीवन के बहुआयामी चित्र और भावनात्मक गहराई होती है। इन्हें अनेक सम्मानों से नवाजा जा चुका है जिनमें अटल भारत रत्न सम्मान, बेस्ट लेखक अवार्ड, कबीर सम्मान, जानकी सम्मान, महिला शक्ति सम्मान, शक्ति वाहिनी सम्मान, छत्तीसगढ़ गौरव सम्मान प्रमुख हैं। इनके दो कविता संग्रह ’निर्मला की कलम से’ और ’मेरी उड़ान’ प्रकाशित तथा चर्चित हैं। इसके अलावा अनेक साझा संकलनों में इनकी रचनाएं शामिल हैं। इनकी कविताओं में संवेदना, जीवन के अनुभव, सामाजिक सरोकार और भावनाओं की गहराई है। इन्हें बहुमुखी कवयित्री भी कहा जाता है।
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निर्मला सिन्हा की कविताएं
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पैरों पे पर लगने से
रोके कब तलक
पैरों पे पर लगने से
रोके कब तलक
मेरे ख्वाबों को कोई
बाँधे कब तलक
दहलीजों की हदें भी तो
टूटेंगी एक दिन
हर उड़ान को थामे
कोई कब तलक
मेरी आँखों में पलते हैं
आकाश कितने
इन आँखों को झुकाए
कोई कब तलक
मैंने चुप रहकर सदियाँ गुजारी हैं
मेरी खामोशी पर तेरे
सवाल कब तलक
मेरी राहों में दीवारें
खड़ी कर दो तुम
मेरे कदमों को रोकोगे
आखिर कब तलक
मैंने हर बंदिश को सहकर देखा है
अब मुझे यूँ ही परखोगे
तुम कब तलक
मेरी चाहत को इजाजत की
जरूरत क्यों हो
मेरे हिस्से का फैसला
करोगे कब तलक
मैं भी इंसान हूँ, मेरे भी अरमान हैं
हर अरमान को कुचलोगे
तुम कब तलक
मेरी उड़ान को पिंजरे में
कैद कर कर
खुद को आजाद समझोगे
तुम कब तलक
मैंने आँसुओं से सींचे हैं सपने अपने
इन सपनों से मुझे दूर
रखोगे कब तलक
अब जो ठानी है तो
मंजिल तक जाऊँगी
मेरे रास्ते में आओगे तुम कब तलक
बहुत सह लिया, बहुत
झुक लिया मैंने
अब मेरे हौसले को
झुकाओगे कब तलक
मेरे पंखों में अब आसमान बसता है
इस उड़ान को रोक
पाओगे कब तलक
पैरों पे पर लग चुके हैं अब मेरे
मुझे उड़ने से रोके
कोई कब तलक।
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कैसे नियम, कैसे रिवाज
कैसे नियम, कैसे रिवाज
मोहे आई न जग से लाज
किसने लिखे ये दस्तूर सारे
किसने बाँटे दिन और रात?
किसने तय की मेरी हदें
किसने बाँधी मेरी उड़ान?
मैंने तो बस इतना जाना
जिंदगी मिली है, जीना है
मन में जो अरमान जगे हैं
उनको भी तो सीना है
क्यों हर ख्वाहिश पर पहरा हो
क्यों हर ख्वाब का हिसाब?
क्यों मेरी रूह की आवाज़ को
दुनिया कहे बेहिसाब?
तहजीब अगर जंजीर बने तो
ऐसी तहजीब से क्या काम?
रिवाज अगर साँसें रोकें
ऐसे रिवाजों को सलाम?
मैंने तस्लीम नहीं किया
हर फरमान जो मुझ पर लादा
जिस राह ने मन को पुकारा
उस राह को अपना बना लिया
न कोई शिकवा, न कोई मलाल
न दुनिया की परवाह आज
जीना था जिंदगी-जी ली सारी
करनी थी मन की कर ली आज
कल किसने देखा है आखिर
किसके हाथ में है परवाज?
आज अगर खुद को जी लिया
तो क्या बुरा है ये अंदाज?
कैसे नियम, कैसे रिवाज
अब मोहे आई न जग से लाज।
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मलाल नहीं है
उसके जाने का मलाल नहीं है
मलाल तो इसका है
मैं पुरुष क्यों नहीं जन्मी!
शायद तब
इन पथरीली राहों पर
मेरे पग न रुकते
चुप्पी की इन दीवारों से
मेरे स्वर न झुकते
मैं भी कह देती
जो मन में पलता रहा
मैं भी चल देती
उस ओर
जहाँ मेरा अपना कोई
मुझे पुकारता रहा
पर नारी हूॅं
मेरे पंखों पर
मर्यादाओं के धागे बाँध दिए गए
मेरी आँखों में बसे स्वप्न
लोक-लाज के नाम
कर दिए गए
वह दूर चला गया
तो आँसू नहीं आए
आँसू तो उन क्षणों के हैं
जो मेरे होकर भी
मेरे न हो पाए
उसकी स्मृति आज भी
निशीथ की निस्तब्धता में
दीप-सी जलती है
पर मेरे अधरों की
अनकही पुकार
वहीं कहीं
मौन होकर ढलती है
उसके जाने का मलाल नहीं
मलाल तो उस जन्म का है
जिसमें प्रेम तो मेरा था
पर उसे चुनने का अधिकार
मेरा नहीं था!
काश, जन्म ने
मुझे केवल स्त्री न
बनाया होता
एक स्वतंत्र मन भी दिया होता
तो शायद
विरह मेरा भाग्य न होता
और प्रेम मेरी सबसे
बड़ी विवशता न होता।
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वीरों और वीरांगनाओं के नाम
पद्मिनी की अमर कथा में
स्वाभिमान की ज्वाला थी
चित्तौड़ की उस धरती पर
नारी की दृढ़ता निराली थी
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने
रण में साहस दिखलाया
मातृभूमि की रक्षा करते
वीरगति को अपनाया
अवंतीबाई ने भी उठकर
अंग्रेजों को ललकारा
स्वाधीनता के प्रथम संग्राम में
माँ भारती को शीश उतारा
भगत सिंह की जवानी ने
आजादी का स्वप्न सँजोया
हँसकर फाँसी को अपनाया
पर सिर अपना नहीं झुकाया
मंगल पांडे की हुंकार से
विद्रोह की चिंगारी जली
बेगम हजरत महल के साहस से
1857 की मशाल जली
सुभाष ने हुंकार लगाई
आजादी का बिगुल बजाया
चंद्रशेखर आजाद ने
स्वाभिमान का मान बचाया
उधम सिंह के संकल्प में
जलता था प्रतिशोध नहीं-
अन्याय के विरुद्ध न्याय की
अडिग पुकार थी वही
कितने नाम इतिहास में हैं
कितने अब भी अनजाने
जिनके त्याग से आज हम
स्वतंत्र गगन में हैं मुस्काने
उनकी गाथा केवल इतिहास नहीं
हमारी अमर विरासत है
तिरंगे की हर लहर में
उनकी शौर्य-गाथा जीवित है।

Hemant Bhatt