शख्सियत : पेपर लीक की समस्या राजनीति से कहीं ज्यादा देश के भविष्य से जुड़ी

आंदोलनों का श्रेय हमेशा ही संदिग्ध रहा है। किसी एक के साथ-साथ अनेक चलते हैं, तब कहीं जाकर एक सार्थक सृजनात्मक आंदोलन सामने आ पाता है। कोई भी आंदोलन किसी एक की बपौती नहीं हो सकता है। कारवाॅं धीरे-धीरे ही बनता है।

शख्सियत : पेपर लीक की समस्या राजनीति से कहीं ज्यादा देश के भविष्य से जुड़ी

कवि राजकुमार कुम्भज का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

’पेपर लीक मामलों ने इधर अंदाजेबयां से कुछ अलग व कुछ अधिक ही कुख्याति अर्जित कर ली है,तो क्यों नहीं इसकी जम्मेदारी भी तय होना जरूरी हो जाता है? राजनीति से कहीं ज्यादा जरूरी ये मुद्दा देश के भविष्य से जुड़ा है।’
 

यह बात जाने माने कवि तथा विचारक राजकुमार कुम्भज ने कही है। इनका कहना है कि संसद में इन दिनों जो कुछ भी निरंतर घटित हो रहा है, उसने नैराश्य और ऊब का ही अधिक विस्तार किया है।

आंदोलनों का श्रेय संदिग्ध

एक सवाल के जवाब में कुम्भज जी ने कहा है कि ये विश्वास करना कठिन नहीं होना चाहिए कि सरकारी संरक्षण से भी कभी-कभी कुछ आंदोलनकारी मोहरे पैदा किए जाते रहे हैं और फिर ’यूज एण्ड थ्रो.’मतलब खत्म-खेल’ कहीं-कहीं ऐसा भी हुआ है कि फलाँ प्रदर्शन, सत्ता-पक्ष व्दारा सम्पादित और प्रायोजित मालूम हो जाता है। एक खास बात और है कि आंदोलनों का श्रेय हमेशा ही संदिग्ध रहा है। किसी एक के साथ-साथ अनेक चलते हैं, तब कहीं जाकर एक सार्थक सृजनात्मक आंदोलन सामने आ पाता है। कोई भी आंदोलन किसी एक की बपौती नहीं हो सकता है। कारवाॅं धीरे-धीरे ही बनता है।

विफलता स्वीकार नहीं करती हैं सरकारें

 कुम्भज जी का मानना है कि हठी सरकारें अपनी तथाकथित असफलताओं की खर्चिली  इश्तहारबाजी में तो आगे रहतीं हैं, किन्तु विफलताएं कभी भी स्वीकार नहीं करती हैं, क्योंकि इससे उनके भय के तथाकथित क्षेत्रफल का क्षरण साबित होता है।

अमर्यादित भाषा-व्यवहार

 सीजेपी प्रायोजित इस कथित छात्र-छात्राओं के रोषपूर्ण-आंदोलन में कतिपय तत्वों व्दारा जो और जैसा बेशर्म, बेहूदा और बदचलनी भरा प्रदर्शन प्रस्तुत किया गया, उसका कोई भी और कैसा भी प्रतिकार, हमेशा कमतर ही कहा जाएगा। कुम्भज जी का कहना था कि सीजेपी प्रायोजित आंदोलन में आंदोलनकारियों ने नितांत अनावश्यक और नितांत अमर्यादित भाषा-व्यवहार को सहजतापूर्वक अपनाया क्योंकि किसी भी प्रदर्शन में लेशमात्र भी लिहाज का नहीं होना, उच्छंखलता ही कहा जाएगा। उन्मुक्त हो चली पीढ़ी के नये संस्कार क्या अपने परिवार तथा परिजनों से इस हद तक त्रस्तता-आग्रही हो गए हैं कि वे समस्त सामाजिकता से विमुख हो जाने पर उतर आये हैं?

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार में जन्म

 कुम्भज जी का जन्म 12 फरवरी 1947 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी किसान परिवार में हुआ। वे छात्र जीवन में सक्रिय राजनीतिक भूमिका के कारण पुलिस प्रशासन व्दारा लगातार त्रस्त किये जाते रहे। बिहार प्रेस विधेयक 1982 के विरोध में सशक्त और सर्वथा मौलिक प्रदर्शन में भाग लिया। 1975 के आपातकाल में भी इन्हें पुलिस बराबर परेशान करती रही। वे प्रदेश के एकमात्र ऐसे कवि व लेखक रहे जिनकी, अपमानित करने की हद तक ’सर्च’ ली गई। आपातकाल के दौरान ही ’सर्च’ बाद एक रात पुलिस लाॅक-आप में गुजारी।

दो तीन बार जेल यात्रा

 अस्सी बरस की उम्र में अस्वस्थ चल रहे कुम्भज जी ने बताया कि उन्होंने अपनी निजी जिंदगी में भी पुलिस की दखलंदाजी भुगती है।  1988 के मानहानि विधेयक के खिलाफ खुद को जंजीरों में बाॅंधकर एकदम अनूठा सड़क- प्रदर्शन किया था। डेढ़-दो सौ शीर्ष स्थानीय पत्रकारों के साथ जेल भी हुई। देशभर में प्रथमतः अपनी पोस्टर कविताओं की सड़क-प्रदर्शनी 1972 में दिल्ली के कनाॅट प्लेस में लगाकर आप साहित्यकारों तथा पाठकों के बीच खासे चर्चित हुए। दो तीन मर्तबा जेल यात्रा भी करना पड़ी। तिहाड़ जेल में 15 दिन सजा काटने के दौरान इनका एकदम नए अनुभव से गुजरना हुआ, लेकिन इस सभी के बावजूद कुम्भज जी जिंदादिल और स्वतंत्र पत्रकार हैं।

चौथा सप्तक में कविताएं 

कुम्भज जी की अब तक 76 स्वतंत्र कविता-पुस्तकें विभिन्न स्थानों और प्रकाशनों से प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा आज भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाओं का प्रकाशन जारी है। दूरदर्शन के जरिए भी इनकी कविताओं ने आम पाठकों तक अपनी पहुॅंच बनाई है। यहाॅं ये उल्लेख अत्यंत उल्लेखनीय है कि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ’अज्ञेय’ व्दारा संपादित ’चौथा सप्तक’ में आपकी कविताएं शामिल हैं। देश-प्रदेश के लिए पर्याप्त सम्मान का विषय है कि अभी तक कुम्भजजी की छह दर्जन से अधिक स्वतंत्र कविता- पुस्तकों का प्रकाशित होना चुका है।

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कुम्भज जी की कविताएं


सँकरे हैं दरवाजे़

हर गली, तँग गली
भूली-बिसरी-सी
दीवारें ही दीवारें हैं
हर तरफ, चारों तरफ
खिड़की दिखाई नहीं 
देती है कहीं कोई 
सॅंकरे हैं दरवाजे और 
मुँडेर ही मुँडेर  
कहने को हैं दिशाएं
दस आने-जाने को
मगर हर बार, हर कहीं
दोराहे-चैराहे
इधर जाऊँ कि उधर 
जाऊॅं कि किधर 
उलझता ही जाता हूॅं 
उलझनों की तरह 
धूप में बैठी स्त्रियाॅं बुनती हैं 
स्वेटर जैसे 
ऊन का गोला नहीं है सूर्य।

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जीवन में जीवन जैसा.

भूले से भूल गया जो भी 
याद आ ही जाता है 
ऑंखें खुलते ही 
बशर्ते कि नींद नहीं हो आचरण में  
पत्थर बरस रहे हों 
सिर ऊपर छोटे-बड़े 
और पैरों में बॅंधी हों बेड़ियाॅं लोहे की
सोने से ज्यादा मँहगा 
बिकता हो साहस
डरते-डरते मरने से 
पहले मरते हों वीर
खोना-पाना कठिन नहीं है
जरा भी नहीं 
नियम नहीं है कि जो 
खोया, फिर पाया 
नमक नहीं, पानी नहीं
किताब नहीं है 
तब फिर बचता ही क्या है जीवन में 
जीवन जैसा, पाने जैसा?

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एक औरत अंधेरे में

एक औरत अंधेरे में 
जाग रही है, सदियों से घर के लिए 
और भाग रही है नँगे पाॅंव जॅंगल-जॅंगल 
तलाश रही है अन्न, जल और आग 
कुएँ की गहराई तक 
जाती नहीं हैं सीढ़ियाॅं
बिखरे-बिखरे हैं नन्हीं तितलियों के रॅंग
औरत समेट रही है 
कुछ सूखी लकड़ियाॅं
ताकि सेंक सके चार रोटियाॅं घर के लिए 
लोरी सुनकर भूखे ही सो गए हैं बच्चे 
देर नहीं,सुबह हो रही है
जाग रहे हैं बच्चे 
बच्चों के जागने से पहले, जरा कुछ पहले 
उम्मीद लिए घर पहुॅंचना है 
एक औरत को
एक औरत अंधेरे में।

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बच्चों की पीठ पर

घोड़ा बन रहे हैं बच्चे 
एक-दूसरे की पीठ पर सवार होकर 
उड़ रहे हैं खुले आसमान की ओर 
मुट्ठियों में कसकर पकड़ लेने को चाॅंद
और चाॅंद है कि रोज ही अपनी अदा में 
घटता-बढ़ता रहता है नितांत बेशर्मी से 
शर्म जो होती जरा भी तो डूब न मरता 
सीधे-सरल उतरकर जमीन पर 
बच्चों की पीठ पर।

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है जिम्मेदारी कारण कविता

बदलती हैं हवाएं, बदलता है पानी 
बदलते है शहर, बदलते हैं नाम शहरों के 
सुर सॅंगीत के बदलते हैं ताल सहित 
तान बदलती हैं, तानें बदलते हैं धार अपनी 
साजिशें बंद कमरों की अपने ही हठ में 
बदलती रहती हैं दृष्टि और दृष्टिकोण 
गूॅंथते हुए मिर्च-मसालों में ढेरों लिप्साएं
मगर जिद है जिम्मेदारी कारण कविता 
कि बदलती नहीं है रीढ।