Mp 43 : रतलाम नगर निगम का बिना वास्तु नियोजन का निर्माण

Mp 43 : रतलाम नगर निगम का बिना वास्तु नियोजन का निर्माण

व्यापारी, व्यापार और वास्तु के दृष्टिकोण से एक आलोचनात्मक विश्लेषण

हेमंत भट्ट
​रतलाम, 16 अगस्त। नगर निगम द्वारा सड़क के समतल (Road Level) से 5 फीट नीचे बनाए गए 43 दुकानों का यह व्यापारिक परिसर नगर नियोजन और वास्तु सिद्धांतों की अनदेखी का एक ज्वलंत उदाहरण बन सकता है। बिना किसी वास्तु शास्त्रीय परामर्श और व्यावहारिक उपयोगिता के अध्ययन के तैयार की गई इस गर्त (बेसमेंट) जैसी संरचना ने व्यापारियों के सामने न केवल आर्थिक, बल्कि मानसिक और व्यावहारिक संकट खड़ा कर दिया है।

⚫ वास्तु शास्त्र के अनुसार नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव
​वास्तु शास्त्र में जमीन का ढाल, प्रकाश और प्राकृतिक वायु के प्रवाह का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है

राहु और शनि दोष (गर्त की स्थिति): 

सड़क से नीचे धंसा हुआ निर्माण वास्तु में 'पाताल लोक' या गर्त का प्रतिनिधित्व करता है। यह स्थिति राहु और शनि के नकारात्मक प्रभाव को बढ़ाती है, जिससे कार्यों में रुकावट और निरंतर मानसिक तनाव बना रहता है।

​सकारात्मक ऊर्जा (प्राण ऊर्जा) का अवरोध

5 फीट नीचे होने के कारण यहाँ सूर्य का पर्याप्त प्रकाश और स्वच्छ हवा नहीं पहुँच पाती। वास्तु के अनुसार जहाँ प्राकृतिक रोशनी और हवा बाधित होती है, वहाँ 'तमस' (अंधकार और नकारात्मकता) का वास होता है, जो व्यापारिक समृद्धि को रोक देता है।

​दिशा और गुरुत्वाकर्षण बल का असंतुलन

सड़क के स्तर से नीचे होने के कारण मुख्य मार्ग की ऊर्जा (Chi Energy) परिसर में सीधे प्रवेश करने के बजाय उसके ऊपर से गुजर जाती है, जिससे दुकानों का ऊर्जा क्षेत्र कमजोर पड़ जाता है।

कड़ी मशक्कत के बाद मिल सकती है रोटी, उन्नति नहीं

सिविल इंजीनियर एवं आर्किटेक्ट का भी यही कहना है कि सड़क से चार फीट नीचे दुकान होना व्यापार की दृष्टि से ठीक नहीं है। वैसे देखा जाए तो सड़क से एक फिट ऊपर तो दुकान होनी चाहिए। सड़क के लेवल की भी नहीं होनी चाहिए। व्यापारियों की भी मानता है कि सड़क लेवल से बनी दुकान चलती नहीं है। कहते हैं कि है तो सड़क पर आ गया। भले ही दुकान है लेकिन वह बिल्कुल सड़क के लेवल में है तो किसी काम की नहीं। कड़ी मशक्कत के साथ रोटी जरूर मिल सकती है, उन्नति नहीं।

​⚫ व्यापार और ग्राहकों के आकर्षण पर प्रतिकूल असर
​व्यापारिक दृष्टि से किसी भी दुकान की सफलता का पहला नियम "दृश्यता" (Visibility) और "सुलभता" (Accessibility) होता है:

नगर निगम की लापरवाही और प्रशासनिक विफलता

​नगर निगम का मुख्य दायित्व ऐसा बुनियादी ढांचा (Infra Structure) तैयार करना है जो जनहित और व्यापारियों की आर्थिक प्रगति में सहायक हो। वास्तु और जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करने के कारण यह परियोजना एक प्रशासनिक असफलता साबित हो सकती है।

​अव्यावहारिक डिजाइन: शहर के लिए चिंता रखने वाले बुद्धिजीवियों का भी कहना है कि बिना स्थानीय भौगोलिक स्थिति और उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन किए केवल जगह भरने के उद्देश्य से 43 दुकानें नीचे बना दी गईं। लोगों का तो यह कहना है कि निगम के जिम्मेदारों ने कमिशन अपना मिशन पूरा कर लिया। 

​जनता के पैसे की बर्बादी : निगम द्वारा लगाए गए राजस्व का उचित रिटर्न न तो निगम को मिल पा रहा है और न ही व्यापारियों को।

​भविष्य की उपेक्षा: सीवेज प्रबंधन, जलभराव और अग्नि सुरक्षा (Fire Safety) के मानकों पर भी यह नीचे बनी संरचना बेहद संवेदनशील है।

मुद्दे की बात

मुद्दे की बात यह है कि ​नगर निगम रतलाम द्वारा वास्तु और व्यावहारिक सिद्धांतों के बिना किया गया, यह निर्माण स्थानीय व्यापारियों के लिए एक आर्थिक दलदल बन सकता है। ग्राहकों के लिए सीढ़ियों के बजाय आसान रैंप की व्यवस्था की जाए। अव्वल तो यही था कि 5 फीट भराव करने के बाद निर्माण किया जाता तो mp43 नजर आता। इतनी मिन्नत नहीं करना पड़ती, प्रोजेक्ट पूरा होने के पहले ही दुकाने सब चली जाती। अब जिन्होंने शर्मा शर्मी दुकाने ली है वह भी यहां पर दुकान खोलते हैं या गोदाम बना देते हैं पता नहीं?