शख्सियत : टीवी मोबाइल के बजाए अब बच्चों को मिट्टी में खेलने, फूल-पत्ती बटोरने की दी जाने लगी है सीख
⚫ कवयित्री सबीना खत्री का कहना
⚫ नरेंद्र गौड़
‘करोड़ों बच्चों को स्क्रीन की लत लगाने वाले टेक दिग्गज अब अपने बच्चों को मिट्टी में खेलने और फूल पत्तियां बटोरने की सीख दे रहे हैं। वहीं स्नैपचैट सीईओ आल्टमैन का कहना है कि बच्चों को एआई तकनीक से जोड़ने की उनकी कोई योजना नहीं है। सैन फ्रांसिस्को जहां गुगल का हेड आफिस है, उससे महज तीन किमी दूर प्रसिध्द वाल्डोर्फ स्कूल में फोन पूरी तरह बैन है।’

यह जानकारी सुप्रसिध्द कवयित्री सबीना खत्री ने दी। इन्होंने बताया कि करोड़ों बच्चों को स्क्रीन की लत में झोंक देने वाले टेक दिग्गज अब पछता रहे हैं और बच्चों को टीवी, मोबाइल से दूर रहने की सलाह दे रहे हैं। बच्चों के अभिभावकों से कहा जा रहा है कि बच्चों को मिट्टी में खेलने दिया जाए और फूल पत्तियां बटोरने की प्रेरणा दी जाए। गुगल हेड आफिस से तीन किमी दूर वाल्डोर्फ स्कूल की सालाना फीस करीब 40 लाख रूपए तक है, जहां सिलिकाॅन वैली के शीर्ष टेक एक्जीक्यूटिव्स और एआई शोधकार्ता अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं। इस स्कूल का सीधा फलसफा है, बिना फोन यानी बिना भटकाव और बिना तुलना वाला ’असली बचपन’! यहां मशीनी सीख के बजाए इंसानी सोच और स्पष्ट दृष्टि विकसित करने पर जोर दिया जाता है।
पहले तो स्क्रीन का लती बनाया गया
सबीना जी ने बताया कि टैक कंपनियों ने बच्चों और किशोरों को स्क्रीन का लती बनाने के लिए जानबूझकर ऐसे एल्गोरिदम डिजाइन किए। एक तरफ पूरी दुनिया के बच्चे स्मार्टफाॅन, रील्स और सोशल मीडिया के जाल में उलझ चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ सिलिकाॅन वैली के शीर्ष एक्जीक्यूटिव, जिन्होंने यह डिजिटल तिलस्म रचा है, अपने ही घरों में टेक्नोलाॅजी पर सख्त पहरा बिठाए हुए हैं।
डिजीटल दुनिया से दूर रखा जा रहा
एक सवाल के जवाब में सबीना जी ने कहा कि आम परिवारों के विपरित, जहां गैजेट्स मनोरंजन या देखभाल को साधन बन चुके हैं, टैक एग्जीक्यूटिव्ज के घरों में डिजीटल दुनिया के मुकाबले सादगी, बोरियत और असली जीवन की गतिविधियों को ज्यादा महत्व दिया जाता है। मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने दूसरी बेटी के जन्म पर खुला पत्र लिखा, तो उसमें डिजिटल दुनिया का जिक्र तक नहीं था। उन्होंने बेटी को बाहर खेलने, फूलों की खुशबू लेने और पत्ते बटोरने की सलाह दी।
स्क्रीन देखने की अनुमति नहीं
सबीना जी ने बताया कि फेसबुक के शुरूआती निवेशक पीटर थील ने खुलासा किया कि वे अपने बच्चों को हफ्ते भर में सिर्फ डेढ़ घंटे स्क्रीन देखने की अनुमति देते हैं। वहीं स्नैपचैट के सीईओ इवान स्पीगल दो साल के बेटे को बिल्कुल स्क्रीन टाइम बिताने नहीं देते। बड़े बच्चों के लिए भी हफ्ते में 90 मिनट तय हैं। स्पीगल के मुताबिक बचपन में टीवी से दूरी ने उन्हें पढ़ने की आदत, रचनात्मक सोच और नवाचार की क्षमता विकसित करने में मदद की है।
दस साझा संग्रहों में रचनाएं
झांसी में जन्मी सबीना जी ’सबी’ उपनाम से शेर-ओ-शायरी, कविताएं तथा कहानियां लिखती हैं। दस साझा संकलनों में इनकी कविताएं संकलित हैं। आप अर्थशास्त्र में एमए, बीएड कर चुकी हैं तथा एक शिक्षण संस्था में प्राचार्य रही हैं। इनकी अनेक कहानियों तथा ग़ज़लों का प्रकाशन विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में होता रहा है। इन्हें आगमन संस्था व्दारा प्रतिष्ठित ’प्राईड वुमन’ अवार्ड से नवाजा जा चुका है। रू-ब-रू संस्था व्दारा इन्हें कहानी ’प्रेरणा’ के लिए लखनऊ में सम्मानित किया गया था। उल्लेखनीय है कि गाजियाबाद में आयोजित ’कलम के दीवाने’ कार्यक्रम के दौरान प्रथम आने पर आपको विशेष पुरस्कार प्रदान किया गया है। सबीना जी इन दिनों महासमुंद (छत्तीसगढ़) में स्वतंत्र रचनाकर्म में व्यस्त हैं।
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सबीना जी की रचनाएं
लड़ते ही रहे
लड़ते ही रहे लड़ाई अपनी ही
दुश्वारियों से
मगर न खत्म हुआ इम्तिहां उन
मक्कारियों से।
ख़्वाहिशों ने धकेला हर बार
दुनिया में मुझे
तोलते ही रहे हर बार खुद को
खरीदारियों से।
ढूंढ़ा किए थे सभी तरफ
महफिल-ए-सुकूं
पाला पड़ता रहा मेरा इन्सां की
अदाकारियों से।
चेहरे पर चेहरा लिए फिरते हैं
आजकल लोग
कब तक बचा पाएंगे खुद को
फनकारियों से।
न ढूंढ़-ए-सबी वफाएं जमाने की
सरगोशियों में
सम्भल जा अब भी दिखावे की
वफादारियों से।
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मेरे दिल की आरजू
मेरे दिल की आरजू का तू
सवाल याद रखना!
मैं जब भी मांगू तुझसे वो जवाब
याद रखना।
आईना जब भी देखे अक्स
टूटने न पाए
देखा था जो हुस्न तूने वो शबाब
याद रखना।
महफिल में नूर बनके जो
शमां थी जलाई
तीरगी में भटक कर वो
माहताब याद रखना।
वो शज़र अब कहां है जो था
इश्क की निशानी
भूलना पड़ा है ’सबी’ भूलने का वो
सबब याद रखना।
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उभर आया है
उभर आया है फिर से जख्म़
पुराना कोई
उसकी बातों ने लगाया है फिर
निशाना कोई।
उतर आया है चेहरे पर उसकी
बातों का असर
बाकी है अब भी मुझ पर इल्जाम
लगाना कोई।
मैं निकल आई हूं बहुत दूर इन
तंग राहों पर
कह दो उसे जाकर अब न जाल
बिछाना कोई।
देखकर दरवाजा बंद कर ही
लिया जब तूने
मिल ही जायेगा दोस्त मुझको
ठिकाना कोई।
सुना है टूटे हुए खण्डहर चुप से
रोते हैं रातों को
जैसे उनको देख कर हंसे न उन पर
जमाना कोई।
जायेंगे जिस रोज़ तेरी बज्म़ से
अलविदा कहकर
लोगों को बता देना कहकर कुछ
भी बहाना कोई।
सुनकर गैरों से उनके इश्क के
बेमानी चर्चे ’सबी’
बीती है क्या हम पर कभी
उनको बताना कोई।
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इक तस्वीर के टुकड़े
मिले हैं आज राह में मुझे इक तस्वीर
के टुकड़े
टूटा है मेरा ख्वाब हुए मेरी ताबीर
के टुकड़े।
मोहब्बत से बनाया था ख्यालों में
जो घरोंदा
बिखरे हुए थे आज उसी जागीर
के टुकड़े।
जिन्दगी में धुंआ है ग़म का कुछ
इस कदर
हो गये मेरी जिन्दगी के तनबीर
के टुकड़े।
न बन सका मेरा मिटाया नाम
दिल से ऐसा
मिले हैं उसी टूटे हुये दिल की तहरीर
के टुकड़े।
न कर बेवफाई इस कदर तू भी
टूट जायेगा
कहीं हो न जायें ’सबी’ तासीर
के टुकड़े।
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मेरे आंशिया पर बिजलियां
मत गिरा देना मेरे आशियां पर
बिजलियां
छाई हैं स्याह सी आज यहाँ
बदलियां।
गुल गुलशन सभी दिख रहे
वीरान से
नाचती थी गुलशन में जहां
तितलियां।
समंदर बस उबल रहा है जोर से
दिख नहीं रही हैं आज
कश्तियाँ।
छुप रहें हैं परिंदे सहम करके
घोसलों में
खो गईं आज उनकी लो सब
मस्तियां।
मौला बचा लेना ग़ुरबत के मारों को
उजड़ जायें न ’सबी’ आज महकी
बस्तियां।
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सबक सिखाना
कर गये जो सितम सबक उनको
सिखाना है
जमाने से हम नहीं हमसे है जमाना
बताना है।
जो उठा कर मुंह हमें कुचल देते थे
सरे आम
बहुत हुआ अब हमें उठे हुए सरों को
झुकाना है।
कहते हैं खामोश रह आज ऐसा ही
जमाना है
बदल कर रहेंगे वक्त़ को उनको
दिखाना है।
समझ कर नासमझ वह बहुत
बनाया बेगाना है
नहीं है नादान नवजवां अब यह बात
सुनाना है।
करें कहां तक सब्र बताओ अब
उनको जलाना है
’सबी’ न तोड़ ऐसे होंसले सभी को
समझाना है।

Hemant Bhatt