शख्सियत : लोकमंगल और लोक चेतना के तटों के बीच बहती है डॉ. विकास दवे की लेखन सरिता
स्वभाव में सरल, व्यवहार में विमल, कर्म में कुशल, सृजन में सबल और संपादन में सफल— अर्थात साहित्यकार डॉ. विकास दवे, मेरे मौलिक मत में, साहित्य के सदन में सुसंस्कारों का प्रकाश हैं।
⚫ श्वेता नागर
“डॉ. विकास दवे की लेखन-सरिता लोकमंगल और लोक चेतना के तटों के बीच बहती है। अधिक स्पष्ट शब्दों में कहूँ तो डॉ. दवे का लेखन लोकमंगल का अनुष्ठान है और संपादन लोकचेतना का अभियान है। स्वभाव में सरल, व्यवहार में विमल, कर्म में कुशल, सृजन में सबल और संपादन में सफल— अर्थात साहित्यकार डॉ. विकास दवे, मेरे मौलिक मत में, साहित्य के सदन में सुसंस्कारों का प्रकाश हैं।

डॉ. विकास दवे
वे इबारत के इंजीनियर की तरह इंसानियत रूपी ईंटों से साहित्य का सेतु बनाते हैं। डॉ दवे दरअसल संघर्ष-सिंधु के साहसी नाविक हैं— ऐसे साहसी नाविक, जो जानते हैं कि लहरों का मिजाज कैसा है और हवा का रुख किधर है।” सद्भाव और सद्विचारों के पुष्पों से सजा यह शब्द-गुलदस्ता प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, गीता मनीषी और भारतीय संस्कृति के अध्येता मेरे गुरु प्रो. अज़हर हाशमी जी द्वारा डॉ. दवे जी के जन्मदिवस पर लिखे गए संस्मरणात्मक आलेखों का अंश है। इन पंक्तियों में डॉ. दवे (वर्तमान निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश) के सद्कार्यों की सुगंध व्याप्त है। प्रो. हाशमी जी, डॉ. दवे के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और स्नेह का विशेष भाव रखते थे। अपनी लेखनी और वाणी के माध्यम से वे निरंतर उन्हें हृदय की गहराइयों से आशीर्वाद और दुआएँ देते रहते थे।

डॉ. दवे के सहज और सरल व्यवहार के तो वे कायल थे ही, साथ ही साहित्य अकादमी द्वारा किए जा रहे नवाचारों और उसकी उपलब्धियों के भी अत्यंत प्रशंसक थे। चूँकि हाशमी जी एंड्रॉयड फोन का उपयोग नहीं करते थे, इसलिए वे सोशल मीडिया से भी जुड़े नहीं थे। किंतु जब भी मैं उनके घर जाती, वे मुझसे प्रायः पूछते— “बताओ, तुम्हारे मामाजी की अकादमी में क्या-क्या कार्यक्रम चल रहे हैं? उन्हें कौन-कौन से पुरस्कार या सम्मान मिले हैं?” फिर मुस्कराकर कहते— “मुझे उनके बढ़ते यश को देखकर बहुत अच्छा लगता है।” दवे जी की उपलब्धियों के विषय में सुनकर वे प्रफुल्लित होकर कहते— “अरे वाह! जियो, विकास जी। आपकी विकास-यात्रा ऐसे ही निरंतर आगे बढ़ती रहे। मेरे आशीर्वाद आपके साथ हैं।” यह कहते-कहते उनकी आँखें भी भर आती थीं। एक बार मैंने हाशमी सर से हँसते हुए कहा— “आप विकास मामाजी को इतना याद करते हैं, लेकिन वे आपको इस तरह याद नहीं करते, हां ,आपके प्रति सम्मान का भाव वे अवश्य रखते हैं । " तब उन्होंने अत्यंत सहजता से कहा— “आशीर्वाद और शुभकामनाएँ देने में मैं यह सोचकर देरी नहीं करता कि सामने वाला मुझे याद कर रहा है या नहीं। वे अच्छा कार्य कर रहे हैं और यह मेरा संस्कार है कि मैं उन्हें बधाई और शुभकामनाएँ दूँ।”
प्रोफेसर हाशमी का डॉक्टर दवे से गहरा स्नेह
प्रो. हाशमी सर का डॉ. दवे के प्रति स्नेह किस सीमा तक गहरा था, इसे इस घटना से समझा जा सकता है कि 10 जून को संसार को अलविदा कहने के दस दिन पूर्व, अर्थात 30 मई को, हाशमी जी आई.सी.यू. में भर्ती थे। उनके स्वास्थ्य की स्थिति अत्यंत गंभीर थी, किंतु उन्हें तब भी डॉ. दवे का जन्मदिन स्मरण रहा। अर्धचेतन अवस्था में भी उन्होंने आई.सी.यू. से उन्हें फोन कर आशीर्वाद दिया और कहा कि इस बार वे उनके जन्मदिवस पर आलेख नहीं लिख पा रहे हैं, इसका उन्हें अत्यंत दुःख है। यह प्रमाण है कि डॉ. दवे का व्यक्तित्व कितनी विराटता लिए हुए है ,जो भी उनसे मिला , वह उनके साथ आत्मीयता और स्नेह के बंधन से जुड़ गया।
साहित्य में विश्वास का वसंत
सन् 2021 में रतलाम में म.प्र. साहित्य अकादमी का एक साहित्यिक आयोजन संपन्न हुआ था। उस समय डॉ. दवे निदेशक बने ही थे। इस आयोजन में प्रो. अजहर हाशमी जी का भी व्याख्यान था तथा साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे जी भी उपस्थित थे। उस अवसर पर हाशमी जी के कहे हुए शब्द आज भी स्मृति में जीवंत हैं। उन्होंने कहा था— “डॉ. दवे साहित्य में विश्वास का वसंत लेकर आए हैं।”
लेखनी को विस्तार देने के लिए प्रयत्नशील
उनका यह कथन पूर्णतः सत्य सिद्ध हुआ। आज हम देख रहे हैं कि मध्यप्रदेश में साहित्य के क्षेत्र में स्थापित रचनाकार हों अथवा वे नवोदित साहित्यकार, जो अपनी लेखनी को विस्तार देने के लिए प्रयत्नशील हैं— सभी के मन में डॉ. दवे के प्रति विश्वास का भाव जागृत हुआ है। उन्हें यह भरोसा है कि यदि वे राष्ट्र और समाजोपयोगी साहित्य का सृजन करना चाहते हैं, तो साहित्य अकादमी से उन्हें पूर्ण सहयोग और मार्गदर्शन प्राप्त होगा। निश्चय ही कहा जा सकता है कि इस विश्वासपूर्ण वातावरण का निर्माण, साहित्य अकादमी के निदेशक के रूप में, डॉ. दवे की अभूतपूर्व उपलब्धि है। डॉ. दवे से जुड़ा यह संस्मरण इस बात का प्रमाण है कि साहित्य अकादमी में उनके द्वारा किए गए विकास कार्य केवल पदीय दायित्वों का निर्वाह मात्र नहीं हैं, बल्कि साहित्य के माध्यम से समाज-सेवा का एक सतत और स्तुत्य अभियान हैं। उनका उद्देश्य सदैव यही रहा है कि साहित्य अकादमी द्वारा संचालित योजनाओं और कार्यक्रमों में वरिष्ठ रचनाकारों के अनुभव और लेखन का सम्मान हो तथा नवोदित रचनाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का पूर्ण अवसर प्राप्त हो। डॉ. दवे की पारदर्शी कार्यप्रणाली ने इस भ्रम और धारणा को भी तोड़ा है कि साहित्य अकादमी जैसी बड़ी संस्थाओं से जुड़ने और अवसर प्राप्त करने के लिए केवल पहुँच और पहचान की आवश्यकता होती है। आज जिस प्रकार म.प्र. साहित्य अकादमी के कार्यक्रम प्रदेश के छोटे-बड़े शहरों ही नहीं, बल्कि गाँवों तक निरंतर आयोजित किए जा रहे हैं, उसे देखकर सहज ही कहा जा सकता है कि यदि आपमें साहित्यिक प्रतिभा है, तो साहित्य अकादमी स्वयं आप तक पहुँच जाएगी। उनकी विकास-यात्रा इसी प्रकार निरंतर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित करती रहे।

⚫ प्रस्तुति : श्वेता नागर
Hemant Bhatt