मुद्दे की बात : तानाशाही फरमान, व्यवस्था सुधार? या फिर एक नए लोकतांत्रिक संकट का जन्म
सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति, मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) में धांधली, जर्जर भवन, और बुनियादी सुविधाओं (जैसे शौचालय और साफ पानी) का अभाव जैसी गंभीर समस्याएं अक्सर मीडिया और जागरूक नागरिकों की सजगता के कारण ही सामने आती हैं। ऐसे में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना सीधे तौर पर सच्चाई को दबाने और अपनी प्रशासनिक विफलताओं पर पर्दा डालने जैसा प्रतीत होता है।
⚫ सिंगरौली DEO के आदेश पर उठते गंभीर सवाल
हरमुद्दा
मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) द्वारा जारी किया गया एक नया प्रशासनिक आदेश इस समय तीखी चर्चा और विवादों के केंद्र में है। इस फरमान के मुताबिक, अब कोई भी सामान्य नागरिक या पत्रकार बिना पूर्व अनुमति के स्कूल परिसर में प्रवेश नहीं कर सकेगा। सुरक्षा और शैक्षणिक माहौल को दुरुस्त करने के नाम पर लिए गए इस फैसले ने एक नए लोकतांत्रिक संकट को जन्म दे दिया है। यह आदेश यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी सरकारी संस्थाएं जनता के प्रति जवाबदेह हैं या वे अपनी कमियों को छिपाने के लिए 'सेंसरशिप' का सहारा ले रही हैं?

सुरक्षा का ढोंग या कमियों को छिपाने का पर्दा?
प्रशासन का तर्क हो सकता है कि यह कदम बाहरी तत्वों के हस्तक्षेप को रोकने और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है। लेकिन असल सवाल यह है कि क्या सरकारी स्कूलों की बदहाली का कारण आम नागरिक या मीडिया कर्मी हैं? हकीकत इसके उलट है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति, मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) में धांधली, जर्जर भवन, और बुनियादी सुविधाओं (जैसे शौचालय और साफ पानी) का अभाव जैसी गंभीर समस्याएं अक्सर मीडिया और जागरूक नागरिकों की सजगता के कारण ही सामने आती हैं। ऐसे में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना सीधे तौर पर सच्चाई को दबाने और अपनी प्रशासनिक विफलताओं पर पर्दा डालने जैसा प्रतीत होता है।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (मीडिया) की स्वतंत्रता पर प्रहार
पत्रकारिता का मूल धर्म है—सच्चाई को उजागर करना और सत्ता व व्यवस्था से सवाल पूछना। यदि किसी पत्रकार को स्कूल की अव्यवस्था दिखाने के लिए पहले उसी प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ेगी जो उस अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार है, तो क्या कभी निष्पक्ष रिपोर्टिंग संभव हो पाएगी? यह आदेश एक तरह की 'प्रशासनिक सेंसरशिप' है, जो मीडिया को उसका काम करने से रोकती है। बिना अनुमति प्रवेश को प्रतिबंधित करना सूचना के अधिकार (RTI) की भावना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक परोक्ष हमला है।
'अभिभावक और समुदाय' को अपनों से ही दूर करने की कोशिश
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं कि स्कूलों के संचालन में स्थानीय समुदाय और अभिभावकों (School Management Committee - SMC) की भागीदारी सक्रिय होनी चाहिए। सरकारी स्कूल किसी बंद सैन्य छावनी की तरह काम नहीं कर सकते। यदि किसी गरीब मजदूर को अपने बच्चे की पढ़ाई या स्कूल की स्थिति जानने के लिए 'साहब' की लिखित अनुमति का इंतजार करना पड़ेगा, तो वह डरकर स्कूल जाना ही छोड़ देगा। यह कदम जनता और सरकारी व्यवस्था के बीच की दूरी को और ज्यादा बढ़ा देगा। नियम केवल आम जनता की आवाज और मीडिया के कैमरों को रोकने के लिए ही क्यों बनाए जाते हैं?
सुधार का रास्ता है पारदर्शिता न की प्रतिबंध
मुद्दे की बात तो यह है कि सुधार का रास्ता पारदर्शिता है, पाबंदी नहीं। यदि सिंगरौली प्रशासन सचमुच शिक्षा व्यवस्था को सुधारना चाहता है, तो उसे स्कूलों के दरवाजे बंद करने के बजाय अपनी कार्यप्रणाली को इतना पारदर्शी बनाना चाहिए कि किसी को 'अचानक' निरीक्षण की जरूरत ही न पड़े। बंद दरवाजों के भीतर कभी भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का विकास नहीं हो सकता; वहाँ सिर्फ भ्रष्टाचार और लापरवाही पनपती है।
ऐसे अधिकारियों का तो होना चाहिए डिमोशन
इस तानाशाही आदेश को तत्काल वापस लिया जाना चाहिए, और ऐसे आदेश निकालने वाले अधिकारियों का डिमोशन होना चाहिए जो कि उसे पद के योग्य नहीं है। या फिर सेवा से ही बर्खास्त किया जाना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही तंत्र की मालिक है और मालिक को अपने ही बच्चों के स्कूल में जाने के लिए किसी 'नौकरशाह' की अनुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
नौकरशाह" नागरिकों के "मालिक"
मुद्दे की बात यह भी है कि मध्य प्रदेश में "नौकरशाह" नागरिकों के "मालिक" बने बैठे हैं, जिन पर सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। खासकर जहां पर भी महिला अधिकारी है, अधिकांश जगह लगभग ऐसी ही स्थितियां हैं। अपनी प्रतिभा और हुनर को प्रदर्शित करने में सक्षम नजर नहीं आती। आमजन के अधिकारी रिजर्व नेचर के नजर आते हैं।
Hemant Bhatt