सामाजिक सरोकार : हरियाली अमावस्या 12 अगस्त को शुरू होगा त्रिवेणी वनरोपण अभियान
⚫ शिवगढ़ की भाई-बहन पहाड़ी पर रोपी जाएगी पीपल, बरगद और नीम की त्रिवेणी
⚫ पद्मश्री महेश शर्मा के मुख्य आतिथ्य में 12 अगस्त को होगा शुभारंभ
⚫ पीपल, वट और नीम की त्रिवेणी लगाने का आह्वान
हरमुद्दा
रतलाम, 11 अगस्त । त्रिवेणी वनरोपण अभियान का शुभारंभ शिवगढ़ क्षेत्र स्थित भाई-बहन पहाड़ी पर हरियाली अमावस्या 12 अगस्त (बुधवार) को दोपहर 12 बजे होगा। हार्टफुलनेस शिवगढ़-रतलाम से जुड़े इस अभियान। मुख्य अतिथि सामाजिक कार्यकर्ता एवं शिवगंगा अभियान झाबुआ के संस्थापक पद्मश्री महेश शर्मा होंगे।

त्रिवेणी वन रोपण बिरसा मुंडा सामाजिक सेवा समिति रतलाम ने आह्वान किया है कि 12 अगस्त को अमावस्या तिथि पर अपने पूर्वजों के निमित्त कम से कम एक त्रिवेणी लगाकर पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लें। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए स्थायी योगदान बन सकता है। समिति ने त्रिवेणी वनरोपण अभियान में अधिक से अधिक लोगों से शामिल होने और पौधरोपण के इस प्रयास को जनअभियान बनाने की अपील की गई है।

समिति से जुड़े लोगों ने बताया कि इस महाअभियान का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के साथ प्रकृति के प्रति आभार की परंपरा को आगे बढ़ाना और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित वातावरण तैयार करने का संदेश देना है। श्रावण कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हरियाली अमावस्या के नाम से जाना जाता है। भारतीय परंपरा में यह पर्व केवल पर्यावरण संरक्षण के महत्व और आवश्यकता को दर्शाने वाला अवसर ही नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और आध्यात्मिकता से जुड़ा पवित्र पर्व भी है।

मान्यता है कि हमारे पूर्वज अनंत काल से प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने के पर्व के रूप में इस दिन को मनाते आए हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए हरियाली अमावस्या पर पौधरोपण को पर्यावरण संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।
पीपल, वट और नीम की त्रिवेणी लगाने की परंपरा
समिति के अनुसार हरियाली अमावस्या के दिन नदियों और पर्वतों के किनारे स्नान करने तथा भगवान का पूजन-अर्चन करने के बाद शुभ मुहूर्त में वृक्षों का रोपण किया जाता है। शास्त्रीय परंपरा में विशेष रूप से त्रिवेणी (पीपल, वटवृक्ष और नीम के पौधों) के रोपण का महत्व बताया गया है। त्रिवेणी आने वाली पीढ़ियों के लिए वरदान है और जहां त्रिवेणी स्थापित होती है, वहां सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने की मान्यता है।
लंबे समय तक पर्यावरण को लाभ पहुंचाने वाले वृक्ष
बता दें कि पीपल और वट की तरह नीम का वृक्ष भी दीर्घायु होता है। नीम की औसत आयु लगभग 150 से 200 वर्ष बताई जाती है, जबकि अच्छी देखभाल और अनुकूल जलवायु में यह 250 से 300 वर्ष तक भी जीवित रह सकता है। त्रिवेणी के तीनों वृक्ष पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। पीपल और वट को लेकर मान्यता है कि ये रात्रि के समय भी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। तीनों वृक्षों को एक ही स्थान पर लगाए जाने पर इनके विकसित होने के बाद यह स्थान प्राकृतिक रूप से हवा को शुद्ध करने और आसपास के पर्यावरण को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है।
गर्मी में पक्षियों के लिए बनेंगे आश्रय और भोजन का माध्यम
आयोजन समिति के अनुसार भीषण गर्मी के दिनों में जब पक्षियों के लिए भोजन की उपलब्धता कम हो जाती है, तब विकसित वृक्ष उनके लिए आश्रय का माध्यम बनते हैं। त्रिवेणी के वृक्ष न केवल पक्षियों को छाया और सुरक्षित स्थान उपलब्ध करा सकते हैं, बल्कि इन पर लगने वाले फल, बीज और अन्य प्राकृतिक संसाधन उनके भोजन में भी सहायक हो सकते हैं। इस दृष्टि से त्रिवेणी वनरोपण अभियान को पर्यावरण, जैव विविधता और पक्षियों के संरक्षण से जोड़ने का एक प्रयास है।
एक वृक्ष दस पुत्रों के समान
भारतीय परंपरा में वृक्षों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा गया है- “दशपुत्रसमो द्रुमः।” इसका आशय है कि एक वृक्ष दस पुत्रों के समान होता है। अर्थात पेड़-पौधों की रक्षा करना अपने बच्चों की रक्षा करने के समान माना गया है। आयोजकों ने इसी भाव के साथ लोगों से पर्यावरण संरक्षण में भागीदारी करने और हरियाली अमावस्या के अवसर पर पौधरोपण का संकल्प लेने की अपील की है।
Hemant Bhatt