पुतले की छीना-झपटी : कानून-व्यवस्था सुधारना या हादसे को न्योता देना?
प्रशासनिक व्यवस्था और जन-प्रतिनिधित्व के बीच का टकराव किसी भी शहर की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करता है। रतलाम के वर्तमान संदर्भ में जो परिस्थितियां बन रही हैं, वे प्रशासनिक अदूरदर्शिता और "क्राइसिस मैनेजमेंट" (संकट प्रबंधन) की विफलता को दर्शाती हैं।
⚫ रतलाम कलेक्टॉरेट का 'सुरक्षा फोबिया': कानून-व्यवस्था या प्रशासनिक अहंकार?
हरमुद्दा
राजनीतिक विरोध में किसी जन-प्रतिनिधि या मंत्री का पुतला फूंकना एक प्रतीकात्मक विरोध है। पुतला कपड़े, घास-फूस और थोड़े से ज्वलनशील पदार्थ से बनता है। जो पुतला कुछ मिनटों में जलकर खाक हो जाता, प्रशासन उसे "बचाने" के लिए पुलिस बल झोंक देता है।

गंभीर खतरा
जब पुलिसकर्मी जलते हुए या आग लगाने की कगार पर खड़े पुतले को छीनने के लिए प्रदर्शनकारियों पर झपटते हैं, तो पेट्रोल या आग की लपटें किसी पर भी गिर सकती हैं।
विचारणीय बिंदु
यदि इस छीना-झपटी में किसी पुलिसकर्मी या आम नागरिक की जान पर बन आए, या कोई गंभीर रूप से झुलस जाए, तो उस 'अनहोनी' की जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या एक बेजान पुतले को खाक होने से बचाना, हाड़-मांस के इंसानों की जिंदगी दांव पर लगाने से ज्यादा जरूरी है?
"नकारात्मक प्रचार" से नेताओं को 'जबरन हीरो' बनाने की कला
प्रशासनिक समझदारी का पहला नियम है—विवाद को हवा न देना। लेकिन रतलाम प्रशासन इस नियम के बिल्कुल उलट चल रहा है।
तर्क
जब आप किसी छोटे या सामान्य प्रदर्शन को रोकने के लिए आधा दर्जन थानों का बल लगा देते हैं, बैरिकेड्स खड़े कर देते हैं, तो आप खुद उस मुद्दे को 'कल्ट' (बड़ा) बना देते हैं।
नतीजा
जिस नेता या कार्यकर्ता को जनता शायद गंभीरता से न लेती, उसे कलेक्टॉरेट के बाहर पुलिस से जूझता हुआ देखकर जनता के मन में 'सिम्पैथी' (सहानुभूति) पैदा होने लगती है। प्रशासन अपनी इस हठधर्मिता से छोटे-मोटे नेताओं को मुफ्त में 'पॉलिटिकल माइलेज' और 'हीरो' बनने का तमगा बांट रहा है।
ज्ञापन से गुरेज और संवादहीनता का 'कम्फर्ट जोन'
एक जिला कलेक्टर या प्रशासनिक अधिकारी का पहला दायित्व है कि वह जनता की बात सुने, चाहे वह कितनी ही कड़वी क्यों न हो। लेकिन रतलाम में पिछले कुछ महीनों से "गेट बंद करो, संवाद खत्म करो" की नीति चल रही है।
आलोचना
जनप्रतिनिधियों (चाहे वे सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के) को कलेक्टॉरेट में घुसने से रोकना, जनता की समस्याओं के ज्ञापन को स्वीकार करने में आनाकानी करना यह दर्शाता है कि प्रशासन जनता के प्रति जवाबदेह होने के बजाय खुद को एक 'अभेद्य किले' में बंद रखना चाहता है।
नतीजा
संवाद की कमी हमेशा असंतोष को जन्म देती है। जब आप शांतिपूर्ण तरीके से ज्ञापन देने वालों के लिए दरवाजे बंद करेंगे, तो वे सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होंगे।
पुलिस बल का अनुत्पादक दुरुपयोग और आम जनता की प्रताड़ना
इस पूरी प्रशासनिक खींचतान में सबसे ज्यादा नुकसान कानून-व्यवस्था और आम रतलाम निवासी का हो रहा है।
तर्क
जिस पुलिस बल को शहर की ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने, अपराधों पर अंकुश लगाने, और महिला सुरक्षा में तैनात होना चाहिए, वह सैकड़ों की संख्या में कलेक्टॉरेट के बाहर केवल इसलिए खड़ा रहता है ताकि कोई पुतला न जल पाए या कोई नेता अंदर न आ पाए।
जनता की परेशानी
कलेक्टॉरेट के आसपास के रास्तों को ब्लॉक कर देने से दफ्तर, अस्पताल या स्कूल जाने वाले आम नागरिक परेशान होते हैं। शहर में बेवजह एक आपातकाल (Emergency) जैसा तनावपूर्ण माहौल पैदा कर दिया जाता है।
मुद्दे की बात
"लोकतंत्र लाठी से नहीं, चलता है लचीलेपन से"
रतलाम प्रशासन को यह समझना होगा कि विरोध का गला घोंटने की कोशिशें अक्सर विरोध को और ज्यादा उग्र बना देती हैं। यदि कोई पुतला जला रहा है, तो उसे जलने दीजिए; कानून के दायरे में उसकी वीडियोग्राफी कराइए और बाद में उचित कार्रवाई कीजिए। जलती आग में हाथ डालकर पुतला छीनना और सैकड़ों पुलिसकर्मियों की जान जोखिम में डालना बहादुरी नहीं, बल्कि प्रशासनिक अदूरदर्शिता है। मुख्यमंत्री और गृह विभाग को रतलाम की इस 'अति-प्रतिबंधात्मक' कार्यप्रणाली का संज्ञान लेना चाहिए, इससे पहले कि यह प्रशासनिक जिद किसी बड़े हादसे का कारण बन जाए।
Hemant Bhatt