अधिकारी बदलते रहे, पर नहीं बदली कुपोषण की तस्वीर :
जब तक व्यवस्था केवल 'निरीक्षण-निर्देश-फोटो' के चक्रव्यूह से बाहर निकलकर बुनियादी गरीबी, भुखमरी और स्वास्थ्य ढांचे की बदहाली पर काम नहीं करेगी, तब तक ये 'दस्तक अभियान' सिर्फ बजट खपाने का जरिया बने रहेंगे।
⚫ रतलाम में सिर्फ अभियानों के भरोसे नौनिहालों की सेहत?
⚫ कलेक्टर की 'सख्ती' और मैदानी हकीकत के बीच सुलगते सवाल
⚫ क्या केवल औचक निरीक्षणों और कागजी निर्देशों से सुधरेगी बच्चों की स्थिति?
हरमुद्दा
रतलाम, 16 जुलाई। जिले में एक बार फिर सरकारी अमला 'दस्तक अभियान' (14 जुलाई से 31 अगस्त) के नाम पर सक्रिय हो गया है। गुरुवार को कलेक्टर मिशा सिंह ने बाल चिकित्सालय स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) का दौरा किया, जहां 18 कुपोषित बच्चे भर्ती मिले। कलेक्टर ने हमेशा की तरह अधिकारियों और मैदानी कार्यकर्ताओं को 'निर्देशों की घुट्टी' पिलाई। लेकिन इस पूरी कवायद के पीछे जिला प्रशासन और महिला बाल विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। मुद्दे की बात तो यह है कि जिस जगह पर कलेक्टर निरीक्षण कर रही थी, वहीं पर बच्चे जमीन पर थे। उनकी माता भी जमीन पर बैठी हुई थी। कोई बिछोना नहीं था इस तरफ भी उनका शायद ध्यान नहीं गया। उनके पलंग खाली पड़े हुए हैं।

जाने इस पूरे सरकारी तमाशे और उसकी ज़मीनी हकीकत
अभियान के भरोसे ही क्यों चलती है व्यवस्था?
मुद्दे का सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बच्चों की सेहत और पोषण जैसे संवेदनशील मुद्दे को साल भर एक सतत प्रक्रिया के तहत क्यों नहीं सुधारा जाता? प्रशासन केवल 'दस्तक अभियान' जैसे विशेष आयोजनों का इंतजार क्यों करता है?
⚫ क्या अभियान खत्म होने के बाद कुपोषण की पहचान और इलाज का काम बंद हो जाता है?
⚫ बाल चिकित्सालय के पोषण पुनर्वास केंद्र में एक साथ 18 बच्चों का भर्ती होना यह साफ दर्शाता है कि ज़मीनी स्तर पर कुपोषण की स्थिति कितनी भयावह है और नियमित स्वास्थ्य सेवाएं इसे रोकने में विफल रही हैं।
'पोषण ट्रैकर ऐप' और कागजी आंकड़ों का मायाजाल
कलेक्टर ने स्वास्थ्य विभाग और महिला बाल विकास विभाग को आपसी समन्वय से 'पोषण ट्रैकर ऐप' पर प्रविष्टि दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।
हकीकत: मैदानी क्षेत्रों में काम करने वाली आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के पास अक्सर नेटवर्क की समस्या, पुराने मोबाइल फोन या तकनीकी समझ की कमी होती है।
ध्यान यहां पर
प्रशासन का पूरा ध्यान बच्चों की सेहत सुधारने से ज्यादा केवल ऐप पर 'डेटा' और 'ग्रीन टिक' सुनिश्चित करने पर केंद्रित रहता है। आंकड़ों की इस बाजीगरी में असली कुपोषित बच्चा कहीं पीछे छूट जाता है।
'फॉलो-अप' का खोखला दावा
कलेक्टर ने निर्देश दिया कि एनआरसी से डिस्चार्ज होने के बाद भी बच्चों का निरंतर फॉलो-अप लिया जाए।
सवाल यह उठता है कि पूर्व में डिस्चार्ज हुए बच्चों में से कितने प्रतिशत वास्तव में कुपोषण से पूरी तरह मुक्त हो पाए? हकीकत यह है कि एनआरसी से घर लौटने के बाद गरीब परिवारों के पास उचित पोषण आहार उपलब्ध नहीं होता, जिससे बच्चे दोबारा अति कुपोषित की श्रेणी में आ जाते हैं। केवल कागजों पर फॉलो-अप दर्ज कर लेने से बच्चों का वजन नहीं बढ़ने वाला।
मैदानी अमले पर दबाव, संसाधनों का अकाल
प्रशासन ने आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को मैदानी स्तर पर भ्रमण करने, कुपोषितों को खोजने और माताओं को परामर्श देने का भारी-भरकम काम तो सौंप दिया है, लेकिन क्या इन कार्यकर्ताओं की समस्याओं को तवज्जो मिल रहा है?
⚫ क्या उन्हें सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जाने के लिए आवश्यक संसाधन और सुरक्षा प्रदान की जा रही है?
⚫ बिना जमीनी कार्यकर्ताओं की समस्याओं का समाधान किए, केवल ऊपर से निर्देश थोप देने से अभियान कभी सफल नहीं हो सकते।
प्रशासनिक अमले की लंबी फौज, नतीजा ढाक के तीन पात
निरीक्षण के दौरान सिविल सर्जन डॉ. ए पी सिंह, जिला कार्यक्रम अधिकारी सुभाष जैन, डॉ. आर सी डामोर सहित अधिकारियों की एक लंबी फौज मौजूद थी। लेकिन सवाल वही है कि इतने बड़े प्रशासनिक अमले के बावजूद रतलाम जिला कुपोषण के
कलंक से पूरी तरह मुक्त क्यों नहीं हो पा रहा है?
मुद्दे की बात

जब तक व्यवस्था केवल 'निरीक्षण-निर्देश-फोटो' के चक्रव्यूह से बाहर निकलकर बुनियादी गरीबी, भुखमरी और स्वास्थ्य ढांचे की बदहाली पर काम नहीं करेगी, तब तक ये 'दस्तक अभियान' सिर्फ बजट खपाने का जरिया बने रहेंगे।
Hemant Bhatt