रतलाम में नशा माफिया का जाल: विभागों की सुस्ती और कागजी 'तालमेल' के भरोसे युवाओं का भविष्य!

रतलाम में नशा माफिया का जाल: विभागों की सुस्ती और कागजी 'तालमेल' के भरोसे युवाओं का भविष्य!

समन्वय सुधारने मैदान में उतरा प्रशासन

⚫ नारकोटिक्स और नशीली दवाओं की रोकथाम के लिए बुलाई गई बैठक 

हरमुद्दा
​रतलाम, 15 जुलाई। जिले में फैलते नशीले पदार्थों के कारोबार को रोकने में सरकारी अमला कितना गंभीर है, इसकी पोल खुद प्रशासनिक बैठकों में खुल रही है। जिले में बढ़ते नशे के जाल और विभागीय ढुलमुल रवैये के बीच आज प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया है।  बुधवार को कलेक्टर भवन के सभागार में नारकोटिक्स और नशीली दवाओं की रोकथाम के लिए बुलाई गई हाई-प्रोफाइल बैठक इसी कड़वी हकीकत की तस्दीक करती है। अपर कलेक्टर बृजेंद्र कुमार रावत और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की मौजूदगी में हुई इस बैठक ने साफ कर दिया कि जब तक पानी सिर के ऊपर नहीं गुजर जाता, तब तक महकमे नींद से नहीं जागते।

​बैठक में अपर कलेक्टर ने सभी विभागों को 'आपसी तालमेल' और 'त्वरित सूचनाओं के आदान-प्रदान' की घुट्टी पिलाई। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल बंद कमरों में नसीहतें देने से जमीन पर सक्रिय ड्रग माफिया का नेटवर्क ध्वस्त हो जाएगा? ​इस पूरी कवायद को अगर गौर से देखें, तो इसमें तीन बड़ी प्रशासनिक खामियां और गंभीर मुद्दे नजर आते हैं।

विभागों का अहंकार और बिखराव

​अपर कलेक्टर का यह कहना कि "आपसी समन्वय अत्यंत आवश्यक है," खुद यह कबूलनामा है कि अब तक पुलिस, नारकोटिक्स, आबकारी और स्वास्थ्य विभाग के बीच कोई तालमेल था ही नहीं। जब तक एक विभाग तस्करों की टोह लेता है, तब तक दूसरे विभाग की सुस्ती या लचर सूचना तंत्र के कारण आरोपी रफूचक्कर हो जाते हैं। 'संयुक्त कार्रवाई' के निर्देश बताते हैं कि अब तक हर विभाग अपनी पीठ थपथपाने के लिए अकेले-अकेले आधी-अधूरी कार्रवाइयां कर रहा था।

शिक्षा विभाग की 'कागजी' जागरूकता 

​बैठक में शिक्षा विभाग को स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाने और NDPS एक्ट पढ़ाने की हिदायत दी गई। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि शिक्षा विभाग के पास ऐसे अभियानों के नाम पर केवल दो-चार रैलियां निकालने, बैनर टांगने और उसकी तस्वीरें वरिष्ठ अधिकारियों को भेजने से ज्यादा का कोई ठोस रोडमैप नहीं है।

विभागों में आपसी तालमेल का अभाव

​प्रशासनिक स्तर पर सबसे बड़ी विसंगति यह रही है कि अब तक ड्रग्स और नारकोटिक्स के खिलाफ कार्रवाई करने वाले अलग-अलग विभाग (पुलिस, नारकोटिक्स, स्वास्थ्य और शिक्षा) अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग अलाप रहे थे।

​सूचनाओं की लेटलतीफी

एक विभाग के पास संदिग्धों की जानकारी होने के बावजूद दूसरे विभाग तक सूचना पहुंचने में हफ़्तों लग जाते हैं, जिसका फायदा उठाकर मुख्य तस्कर और पेडलर बच निकलते हैं।

​अंधेरे में भविष्य

शहर और ग्रामीण इलाकों के शैक्षणिक संस्थानों के आसपास नशीली दवाओं और सिगरेट-गुटखे की दुकानें धड़ल्ले से चल रही हैं, जिन पर रोक लगाने में विभाग पूरी तरह नाकाम रहा है।

​कानून के खौफ का अभाव 

​बैठक में एनडीपीएस अधिनियम की बातें तो हुईं, लेकिन धरातल पर छोटे-मोटे पेडलर्स (नशा बेचने वाले) को पकड़कर पुलिस अपनी पीठ थपथपा लेती है। जो इस अवैध धंधे के बड़े मगरमच्छ (सप्लायर्स) हैं, वे आज भी सुरक्षित हैं। सख्त धाराओं का सही इस्तेमाल न होने से अपराधियों में कानून का कोई खौफ नहीं बचा है।

फाइलों से बाहर कब निकलेगा एक्शन?

​प्रशासनिक बैठकों का यह दौर नया नहीं है। हर कुछ महीनों में ऐसी समीक्षा बैठकें होती हैं, चाय-बिस्कुट के दौर चलते हैं और फिर सब कुछ ठंडे बस्ते में चला जाता है।

​जनता की अदालत में सवाल

क्या प्रशासन सिर्फ तब जागेगा, जब नशा किसी वीआईपी के घर का दरवाजा खटखटाएगा? क्या पुलिस और नारकोटिक्स विभाग के पास वाकई ऐसा कोई तंत्र है जो बिना किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के इन ड्रग सिंडिकेट्स की रीढ़ तोड़ सके? ​अपर कलेक्टर के निर्देश कागजों पर बेहद शानदार हैं, लेकिन रतलाम की जनता अब भाषण या बैठकें नहीं, बल्कि मैदान पर 'दबिश' और नशे के सौदागरों की 'गिरफ्तारी' देखना चाहती है।

कितना होगा कड़ा प्रहार

यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बैठक के बाद रतलाम पुलिस और प्रशासन नशे के इस काले कारोबार पर कितना 'कड़ा प्रहार' कर पाता है या फिर यह भी एक और 'रूटीन' सरकारी बैठक बनकर रह जाएगी।

नशे के खिलाफ जंग में किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त नहीं

"नशे के खिलाफ जंग में किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि विभागों के बीच तालमेल की कमी के कारण कोई भी तस्कर या आरोपी बच निकला, तो संबंधित विभाग के अधिकारी की सीधी जवाबदेही तय की जाएगी।" 

बृजेंद्र कुमार रावत, अपर कलेक्टर, रतलाम


मुद्दे की बात

कार्रवाई में 'इच्छाशक्ति' की जरूरत

​रतलाम जिला लंबे समय से मादक पदार्थों की तस्करी के संवेदनशील रूट पर स्थित रहा है। ऐसे में प्रशासन को रस्मी बैठकों और पारंपरिक छापों से आगे बढ़कर टेक्नोलॉजी आधारित निगरानी, सख्त नो-टोलरेंस नीति और मेडिकल माफियाओं पर सीधी चोट करनी होगी। वरना, 'नारकोटिक्स के विरुद्ध संयुक्त कार्रवाई' की यह बैठक भी पिछले साल की तरह केवल एक और फोटो-अप साबित होकर रह जाएगी।