कागजी दावों में उलझा 'मुस्कान अभियान', रतलाम में सरकारी स्कूलों में नामांकन की रफ्तार सुस्त

कागजी दावों में उलझा 'मुस्कान अभियान', रतलाम में सरकारी स्कूलों में नामांकन की रफ्तार सुस्त

⚫ ​समीक्षा में खुली पोल: कक्षा 1 से 8 तक के नामांकन में नहीं आई तेजी

⚫ कई स्कूलों में लक्ष्य से बेहद पीछे

⚫ ​कलेक्टर की तल्खी: तीन दिन में सुधार न होने पर संबंधित अधिकारियों और स्टाफ पर गिरेगी गाज

हरमुद्दा
​रतलाम, 11 जुलाई। जिले में बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए चलाया जा रहा 'मुस्कान अभियान' और जिला शिक्षा केंद्र की योजनाएं धरातल पर हांफती नजर आ रही हैं। शनिवार को कलेक्टर सभागार में हुई समीक्षा बैठक में खुद कलेक्टर मिशा सिंह ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि जिले में कक्षा 1 से 8 तक के नामांकन में अपेक्षाकृत कम वृद्धि हुई है। सबसे चिंताजनक स्थिति कक्षा 1 में प्रवेश को लेकर है, जहां कई विद्यालयों में आंकड़ा लक्ष्य के आसपास भी नहीं पहुंच पाया है। ​अधिकारियों की इसी ढीली कार्यशैली को देखते हुए कलेक्टर ने अल्टीमेटम दिया है कि तीन दिनों के भीतर जिन कम नामांकन वाले स्कूलों में सुधार नहीं हुआ, उनके प्रभारियों के खिलाफ सीधे कार्रवाई का प्रस्ताव भेजा जाए।


​नियमों की आड़ में बच्चों को रोकने का खेल, कलेक्टर ने दी हिदायत

​अक्सर देखा जाता है कि सरकारी और निजी स्कूलों में दाखिले के समय गरीब अभिभावकों को टीसी, मार्कशीट या अन्य दस्तावेजों के नाम पर चक्कर कटवाए जाते हैं। इस प्रशासनिक संवेदनहीनता पर रोक लगाते हुए कलेक्टर ने स्पष्ट निर्देश दिए:
​"दस्तावेजों के अभाव में किसी भी बच्चे का प्रवेश नहीं रुकना चाहिए। अगर कोई दस्तावेज कम भी है, तो अभिभावकों को कम से कम 3 दिन का समय दें। शिक्षा का अधिकार हर बच्चे को है और कागजी औपचारिकताएं किसी के भविष्य का रोड़ा नहीं बननी चाहिए।"

​मैपिंग और तकनीकी खामियों ने बढ़ाई 'ड्रॉपआउट' की चिंता

​समीक्षा बैठक में यह बात भी सामने आई कि आंगनवाड़ियों और स्कूलों की बसाहट के अनुसार मैपिंग में भारी लापरवाही बरती गई है। इसके अलावा तकनीकी त्रुटियों के कारण भी डाटा स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। कलेक्टर ने इन सभी तकनीकी गड़बड़ियों को तीन दिन में सुधारने की डेडलाइन तय की है। सवाल यह उठता है कि जब सत्र शुरू हुए लंबा समय बीत चुका है, तब जाकर यह मैपिंग और तकनीकी कमियां क्यों खोजी जा रही हैं? यदि समय रहते योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाता, तो आज नामांकन की यह सुस्त रफ्तार प्रशासन के लिए सिरदर्द न बनती।

​इन मोर्चों पर भी पिछड़ रहा विभाग

​बैठक के दौरान केवल नामांकन ही नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग की कई अन्य महत्वपूर्ण योजनाओं में भी सुस्ती पाई गई, जिस पर कलेक्टर ने कड़े तेवर दिखाए।

⚫ ​अपार आईडी का धीमा काम: विद्यार्थियों की डिजिटल पहचान (अपाार आईडी) का निर्माण अब तक शत-प्रतिशत नहीं हो पाया है।

⚫ ​रोजाना की हाजिरी में लापरवाही: शिक्षक और विद्यार्थियों की प्रतिदिन होने वाली ई-अटेंडेंस की व्यवस्था कई जगह ठप है।

⚫ ​बाल चौपाल और एफएलएन सिर्फ कागजों पर?: कक्षा 3 तक के बच्चों के बुनियादी ज्ञान (एफएलएन) की मॉनिटरिंग और हर महीने होने वाली 'बाल चौपाल' को लेकर जमीनी स्तर पर सक्रियता कम दिखी।

⚫ ​जीरो ऑवर और रेमेडियल क्लास: कमजोर बच्चों के लिए चलाई जाने वाली उपचारात्मक (रेमेडियल) कक्षाएं और लाइब्रेरी गतिविधियां नियमित नहीं होने पर भी सवाल खड़े किए गए।

​अल्टीमेटम के भरोसे 'मुस्कान': क्या सुधरेगी व्यवस्था?

​बैठक में जिला शिक्षा अधिकारी, जिला परियोजना समन्वयक (डीपीसी) सहित तमाम बीआरसीसी और बीएसी मौजूद थे। प्रतिवेदन की प्रस्तुति के साथ ही विभाग की कमियां सबके सामने आ गईं।
​कलेक्टर सिंह ने साफ तौर पर कहा कि 3 से 15 वर्ष के हर बच्चे को स्कूल लाना और ड्रॉपआउट बच्चों को दोबारा पढ़ाई से जोड़ना 'मुस्कान अभियान' का मूल उद्देश्य है, जिसमें लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अब देखना यह है कि कलेक्टर के इस तीन दिवसीय कड़े अल्टीमेटम के बाद शिक्षा विभाग का मैदानी अमला सच में जागता है या फिर यह अभियान सिर्फ फाइलों और बैठकों में ही मुस्कुराता रहेगा।