साहित्य सरोकार : प्रगतिशील तेवर के कवि अनिल सोनी ’डावर’
कवि बन जाने के पीछे बरसात के दिनों उठने वाली मिट्टी की खुशबू और ग्रामीण परिवेश के साथ प्राकृतिक वातावरण ही नहीं, वहां लोगों की भूख, गरीबी, फटहाल जिंदगी और जीवन की एक नहीं अनेकानेक विसंगतियां भी अनिल जी को एक जिम्मेदार कवि बनाने में सहायक रही हैं।
⚫ अनिल सोनी ’डावर’ के कविता संकलन ’मैं शब्द हूँ’ का हुआ भव्य विमोचन
⚫ नरेंद्र गौड़
’’देखा है मैंने सिसकते हुए प्रजातंत्र को
कुर्सी के लिए भाइयों को लड़ते देखा है’’
शाजापुर जिले की तहसील शुजालपुर के गांव तलेन में जन्मे अनिल सोनी ’डावर’ अचानक हवा में किसी जादू के तहत कवि के रूप में प्रकट नहीं हो गए, वरन् इसके पीछे उनका काव्यप्रेमी परिवार और शाजापुर जिले की सतत प्रवाहमान होती रही काव्य धारा प्रमुख कारण रहे हैं। इनके काका दिवंगत कैलाश सोनी ’डावर’ अपने दौर के सशक्त कवि रहे हैं, उनकी कविताएं उस दौर के रचनाकारों में खासी लोकप्रिय थी, कहना न होगा कि रचाव की यही विरासत अनिल जी को मिली।

उल्लेखनीय है कि शुजालपुर के ही ग्राम भ्याना में स्वतंत्रता संग्राम सैनानी और ‘हम अनिकेतन, हम अनिकेतन, हम तो रमते राम, हमारा क्या घर क्या दर कैसा वेतन’ काव्य के अमर रचनाकार पं. बालकृष्ण शर्मा ’नवीन’ का जन्म हुआ, इनके अलावा शाजापुर के भट्ट मोहल्ले में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि, कथाकार, उपन्यासकार स्व. श्री नरेश मेहता, नागनागिनी गली में प्रखर कवि, कथाकार, व्यंग्य लेखक विष्णु नागर और सुंदरसी में दूसरे सप्तक के कवि स्व. हरिनारायण व्यास का जन्म हुआ। कहना न होगा कि इन सभी की कविताओं का प्रभाव अनिल जी पर जाने अनजाने अवश्य पड़ा है।
कवि बन जाने के पीछे बरसात के दिनों उठने वाली मिट्टी की खुशबू और ग्रामीण परिवेश के साथ प्राकृतिक वातावरण ही नहीं, वहां लोगों की भूख, गरीबी, फटहाल जिंदगी और जीवन की एक नहीं अनेकानेक विसंगतियां भी अनिल जी को एक जिम्मेदार कवि बनाने में सहायक रही हैं। इनकी कविताओं में प्रकृति और ग्रामीण लोकजीवन विभिन्न रूपकारों में मुखरित है। संकलन की कविताएं एक सच्चे ईमानदार आदमी की खरी कविताएं हैं, कवि समसामयिक संदर्भों से कटा हुआ नहीं है-
विश्वास का खून, बहते हुए देखा है।
दोस्ती में खंजर चलते हुए देखा है।।
देखा है मैंने सिसकते हुए प्रजातंत्र को।
कुर्सी के लिए भाइयों को लड़ते देखा है।
भारतीय ग्रामीण परिवेश की बात करें तो वहां जमीन और जोरू को लेकर संघर्ष अधिक होते हैं। पुरखों की भूमि उनकी संतानों में बंटते-बंटते आज दस-बीस बीघा रह गई है। जाहिर है इसके चलते उपज कम होती है और यही ग्रामीण अर्थव्यवस्था के चकनाचूर होने का प्रमुख कारण है, वहीं इतनी कम खेती के बावजूद दबंगों की मनमानी किसानों को आए दिन कोर्ट कचहरी के चक्कर कटवाने को मजबूर कर रही है। प्रकारांतर से अनिल सोनी की कविताओं में यह सभी दर्द और संदर्भ हैं। दरअसल ग्रामीण जीवन की ही नहीं विश्व की तमाम समस्याएं प्रेम के निरंतर हृास होने का नतीजा है।
यदि अमेरिका और इजराइल ईरान के साथ बातचीत के जरिए समस्या का समाधन कर लेते तो खोमेनेई नहीं मारे जाते। युध्द का सर्वाधिक दर्दनाक पहलू यह कि मिसाइल से हमला ईरान के दक्षिणी प्रांत होर्मोजगान के मिनाब में एक गल्र्स प्राथमिक स्कूल पर भी हुआ, जहां पढ़ रही करीब 165 मासूम छात्राएं मारी गई और 90 घायल हुई हैं। भारत ही नहीं विश्व से प्रेम तत्व तिरोहित हो रहा है और तभी तो अनिल सोनी का कवि मानता है कि-
प्रेम स्नेह की पराकाष्ठा है
ईश्वर की अमानत है
इंसान को बख्शी खुदा की नेमत है
प्रेम का ढाई अक्षर
हैवान को इन्सान बना देता है
रास्ते के पाषाण को
भगवान बना देता है।
यदि दुनिया में प्रेम और भाईचारा कायम हो जाए तो शांति और अहिंसा का परचम लहरा सकता है। अनिल सोनी की कविताएं जो कुछ भी दृश्यमान जगत है, उसके भीतर तक जाकर जीवन के विभिन्न आयामों की गहरी पड़ताल करती हैं। इस संग्रह की रचनाएं आंसुओं से सराबोर, ताजा लहू में डूबी कविताएं कही जा सकती हैं, जो काट देने के बाद फिर से बार-बार बहुत मेहनत के पसीने से सींचकर लिखी और रची गई हैं। यदि महसूस करने की क्षमता और संवेदना है तो इनके शब्द-शब्द में उम्मीद की रौशनी है, लेकिन कहीं-कहीं गहरी हताशा और निराशा के स्वर भी हैं। वहीं रौशनी की एक बूंद को अपनी मुट्ठी में बंद कर लेने का खेल है तो यह प्रश्न भी है कि आज़ाद चीज़ों को क़ैद करने का ऐसा खेल क्यों होता है? यहां कभी न लौट सकने वाले बचपन की स्मृतियां हैं और तलेन जैसे गांव के बहाने भारत के तमाम ग्रामों का प्राकृतिक वैभव भी अनेक रंगों रूपों में परिलक्षित हैं।
यह कविताएं अपनी बात कहने के लिए किसी कविताई कौतुक, अलंकारिता या भाषायी बंतुपन का आसरा नहीं ढंूढ़ती। इनमें अपनी आंचलिकता के साथ मालवी बोली का वह स्वाद है जो अनिल जी को अपने मालवा के साथ ही समग्र देश की सार्वभौम बोलचाल से प्राप्त हुआ है। अनिल जी के पांव अपनी जमीन को पहचानते हैं और अपने आसमान को भी।
यह कविताएं उन दृश्यों को सामने रखती हैं जो अतिपरिचित हैं, सभी के देखे-भाले हैं। इन कविताओं में आंसू भी हैं और लहू भी। ये कविताएं जीवन के बहुत ज़रूरी और अनिवार्य सवालों को बेलाग ढंग से बेखौफ होकर उठाती हैं। इनमें किसी तरह का संकोच या हकलाहट नहीं है। इस संकलन में कुछ रचनाएं होली के रंगों की छटा भी बिखेर रही हैं-
होली खेलें प्रेम से, न हो कोई मलाल
आओ प्रियवर पास में, मल दूं रंग गुलाल
होली है तो प्रेम से, मिलने का त्योहार
रंग प्यार का घोल के, करो प्रेम बौछार।
इन दिनों अनिल जी इंदौर में पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के सहायक संचालक हैं। साथ ही शोध छात्र भी हैं।
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इंदौर के अरिहंत महाविद्यालय में अनिल सोनी के प्रथम कविता संकलन ’मैं शब्द हूं’ का विमोचन पूर्व कलेक्टर तथा वरिष्ठ साहित्यकार राजीव शर्मा, उज्जैन नगर निगम के अपर आयुक्त एवं मोटीवेशनल स्पीकर संतोष टैगोर, चेयरमेन अरिहंत ग्रुप ऑफ इस्टीट्यूट्स जयंत कासलीवाल, कवि तथा पत्रकार नरेंद्र गौड़ एवं साहित्यकार अदिति अमित भदौरिया की उपस्थिति में हुआ। कार्यक्रम का संचालन सुश्री अदिति सोनी ने किया।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में दोपहर दो बजे से कवि सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमें फिल्मी गीतकार बाबू घायल, जगदीश सेन, राजेश यादव, राजेश सत्यम, कान्हा सोनी, भगवान दास सोनी, कन्हैया राज, हरिसिंह पतंग, वंदना योगी जाहृन्वी, मिथुन मिथलेश, डाॅ. सुरेश विरमाल, मनोज दुबे, राजेंद्र विश्वकर्मा, विवेक शर्मा, दिनेश पाठक, नरेंद्र सक्सेना, राकेश दांगी, तथा अमित सोनी ’डावर’ ने शानदार काव्य पाठ कर श्रोताओं को देर तक बांधे रखा।

कविता संकलन- मैं शब्द हूं
कवि- अनिल सोनी ’डावर’
प्रकाशक- शब्दाहुति प्रकाशन, ए-21, ग्राउंड फ्लोर, दयालबाग, सूरज कुंड, सेक्टर -39, फरीदाबाद-121009
Hemant Bhatt