साहित्य रचना : मैं आज की नारी हूँ
कमजोर, कमसिन ना समझना मुझे तुम वक्त पड़े तो दुर्गा बन कर पापियों का संहार भी करती हूँ ज्यादा की न ख्वाइश मुझे अपने हिस्से का आकाश पूरा मैं चाहती हूँ हाँ मैं आज की नारी हूँ
⚫ सुजाता पुरोहित
(गंगटोक, सिक्किम)
मॉं, बहन, पत्नी, प्रेमिका
पापा की मैं बेटी प्यारी हूॅँ
ईश्वर की अनमोल संरचना
कोमल हूॅं मैं कमजोर नहीं
कभी दुर्गा तो कभी काली हूॅँ

रोके किसी के ना रुके
वो अंधड़, तूफान विनाशकारी हूॅँ
हाॅं, मैं आज की नारी हूँ
सृष्टि का सृजन मैं करती
सबके दिल में बसती हूॅँ
सह कर दंभ जमाने का
अधरों पर मुस्कान सजाती हूँ
देह पर घाव लेकर अपनों के
मलहम सब को लगाती हूँ
तम से भरी राहों में
आशा का दीप जलाती हूँ
हाँ! मैं आज की नारी हूँ
दुख के बादल छाए कभी
दामिनी बन कर आए कभी
बनकर मेह उन पर बरसती हूँ
ओढ़ कर नेह का मैं आंचल
मनोबल सबका बढ़ाती हूँ
जुल्म की हर दीवार को तोड़
मंजिल को गले लगाती हूँ
समझ सका न मुझको कोई
ऐसी अबूझ पहेली हूँ
हाॅं, मैं आज की नारी हूँ
अब मैं दुखी, अबला नहीं
किसी की दया की पात्र नहीं
अपने बलबूते खुद की किस्मत
खुद ही मैं सजाती हूँ
कमजोर, कमसिन ना
समझना मुझे तुम
वक्त पड़े तो दुर्गा बन कर
पापियों का संहार भी करती हूँ
ज्यादा की न ख्वाइश मुझे
अपने हिस्से का
आकाश पूरा मैं चाहती हूँ
हाँ मैं आज की नारी हूँ
हाँ मैं आज की नारी हूँ।

⚫ सुजाता पुरोहित
Hemant Bhatt