धर्म संस्कृति : समाज में सद्भाव, करुणा, सत्य और आध्यात्मिक चेतना का प्रसार करना जरूरी

धर्म संस्कृति : समाज में सद्भाव, करुणा, सत्य और आध्यात्मिक चेतना का प्रसार करना जरूरी

स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वतीजी ने कहा

⚫ अधिक मास में श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ महोत्सव की पूर्णाहुति

हरमुद्दा
रतलाम, 8 जून। संत भगवा वस्त्र किसी व्यक्ति, संगठन या सत्ता के प्रभाव में आकर नहीं धारण करते, बल्कि यह त्याग, तपस्या, सेवा और लोकमंगल का प्रतीक है। भगवा रंग सांसारिक मोह-माया से विरक्ति तथा ईश्वर और समाज के प्रति समर्पण का संदेश देता है। संत अपने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग कर जनकल्याण, धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के संरक्षण के लिए जीवन समर्पित करते हैं। उनका उद्देश्य केवल आत्मकल्याण ही नहीं, बल्कि समाज में सद्भाव, करुणा, सत्य और आध्यात्मिक चेतना का प्रसार करना भी होता है। इसलिए भगवा वस्त्र त्याग और परमार्थपूर्ण जीवन का प्रतीक माना जाता है।

यह विचार महामण्डलेश्वर स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वतीजी महाराज ने श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ महोत्सव के सातवें दिन व्यक्त किए।

सच्ची मित्रता का सर्वोत्तम उदाहरण

श्री हरिहर सेवा समिति एवं श्री कालिका माता सेवा मंडल ट्र्स्ट द्वारा आयोजित कथा प्रसंग में भगवान का विवाह एवं सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए स्वामीजी ने कहा कि सुदामा और भगवान कृष्ण की मित्रता भारतीय संस्कृति में सच्ची मित्रता का सर्वोत्तम उदाहरण मानी जाती है। यह  मित्रता समाज को यह संदेश देती है कि सच्ची मित्रता धन, पद और वैभव पर नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, सम्मान और निस्वार्थ भाव पर आधारित होती है। भगवान भी अपने भक्त और मित्र के प्रेम को सर्वोच्च मानकर उसका सम्मान करते हैं। भगवान कृष्ण ने सुदामा की गरीबी नहीं, बल्कि उनके हृदय की पवित्रता को महत्व देकर मित्रता का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किया। 

पाप और अत्याचार ही अनर्थ के कारण 

जब भी जीवन में  विचार - आचरण बिगड़ेगा तब आसुरी प्रवृति बढने लगती है । यही वजह होती है कि पृथ्वी पर पाप और अत्याचार का भार भी बढने लगता है जो कई विपदाओं और अनर्थ का कारण बनता है । अपने आचार विचार को यदि दूषित होने से बचाना है तो कथा, सत्संग और नाम सुमिरन करना चाहिए । कथा में आपको अपने मन को परमात्मा से जोड़े रखने के विभिन्न सौपान बताये जाते है, उनको अपनाने से आप भगवान और संत की निगरानी में रहेंगे । 

सुपर स्पेशिलिटी का अहम घातक 

स्वामीजी ने बताया कि हमारी संस्कृति में पारिवारिकता का भाव बहुत महत्वपूर्ण है । विवाद होते ही तब है, जब प्रेमभाव का स्थान अहमभाव ले लेता है । स्वयं में सुपर स्पेशिलिटी का जो अहंकार है, वो ही दुःख का मूल बन जाता है । परिवार में सभी के विचार को सम्मान दिया जाना चाहिए । घर परिवार की हर समस्या का समाधान प्रेमभाव में निहित है । कथा और सत्संग जैसे आयोजन न केवल परिवार में बल्कि समाज और राष्ट्र में भी परस्पर सामाजिक समरसता को बढ़ाने के कार्य में सेतु बनते है।

स्वागत-वन्दन-अभिनंदन 

कार्यक्रम में महापौर प्रहलाद पटेल ने पूज्य स्वामीजी से आशीर्वाद प्राप्त किया। उनका आयोजन समिति परिवार द्वारा शाल - श्रीफल भेंटकर अभिनन्दन किया गया।