पुस्तक समीक्षा : कविता संकलन ’पहाड़ों की धड़कन’
ऐसा नहीं कि पहाड़ों में सिर्फ जीवन की कठिनाई ही होती हैं, वरन् वहां की धरती में लोक संस्कृति, रीतिरिवाज की जड़ें भी बहुत गहराई तक धंसी हैं। यही कारण है कि ’पहाड़ों की धड़कन’ की कविताओं में पहाड़ों का सांस्कृतिक वैभव, वहां की उत्सवधर्मिता भी शिद्दत से देखी जा सकती हैं।
⚫ उत्तराखंड का सांस्कृतिक वैभव, जीवन संघर्ष और दरकते पहाड़ों का दर्द समेटती मंजु पांगती की कविताएं
⚫ नरेंद्र गौड़
उत्तराखंड की शौका जनजाति ’भोटिया’ समुदाय का एक हिस्सा है। कवयित्री मंजु पांगती इसी जनजाति से आती हैं। इनके दो कविता संग्रह ’अरमानों का मेला’ और ’पहाड़ों की धड़कन’ प्रकाशित एवं चर्चित हैं। इनकी कविताओं में उत्तराखंड के पहाड़ों का जनजीवन, लोगों का आजीविका के लिए भीषण संघर्ष, लोक परंपराएं, रीति रिवाज, सौंदर्य तथा सांस्कृतिक अस्मिता के अनेकानेक स्वर उजागर हैं।

भोटिया जनजाति मुख्य रूप से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में निवास करती है जो ऐतिहासिक रूप से भारत-तिब्बत के बीच व्यापार, पशुपालन और अर्ध खानाबदोश जीवन के लिए जानी जाती है। इस जाति का इतिहास और संस्कृति मध्य हिमालय की विशिष्ट परंपराओं से समृध्द है। चर्चा के दौरान मंजु जी ने बताया कि इन्होंने बचपन से अपने परिवार और आसपास के लोगों का जीवन संघर्ष देखा है और बाद में पर्यटन के शौक के चलते उत्तराखंड के अनेक क्षेत्रों का भ्रमण किया और कई गांवों को उजाड़ पाया। जहां घरों के दरवाजों पर जंग लगे ताले पलायन का दर्द बयान कर रहे थे। पहाड़ों में अधिकांश युवा रोजी रोटी के लिए भारत सहित अन्य देशों पलायन कर जाते हैं, घरों में बूढ़े बुजुर्ग उनके भेजे पैसों का बेसब्री से इंतजार करते दिन बिताते हैं। इन बूढ़ों को घर का सामान, जलावन का ईंधन, पशुओं के लिए चारा लाने के लिए पहाड़ों की ऊंची चढ़ाई चढ़ना-उतरना पड़ती है। इन्होंने बताया की अपने समुदाय और समूचे उत्तराखंड के रोजमर्रा के दुखों को निकट से देखने की वजह से इनकी कविताओं में इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था।
इनका कहना है कि ऐसा नहीं कि पहाड़ों में सिर्फ जीवन की कठिनाई ही होती हैं, वरन् वहां की धरती में लोक संस्कृति, रीतिरिवाज की जड़ें भी बहुत गहराई तक धंसी हैं। यही कारण है कि ’पहाड़ों की धड़कन’ की कविताओं में पहाड़ों का सांस्कृतिक वैभव, वहां की उत्सवधर्मिता भी शिद्दत से देखी जा सकती हैं। उत्तराखंड के अनोखे रीति रिवाज हैं और अनेक बार पयैया के पेड़ से विवाह हो जाता है-
पयैया का खिलना
मनोहारी दृश्य होता है
चेरी की प्रजाति का यह पेड़
इसकी पत्तियां पवित्र मानी जाती हैं
(इसी कविता में वह आगे लिखती हैं)
पंडित के कहने पर
भाई का ब्याह भी किया गया
पांच साल की उम्र में
इसी पयैया के पेड़ के साथ
हमने खूब फल खाए
बचपन में इसके।
मंजु जी की कविता ’हँसी का रुदन’ में उन पहाड़ी महिलाओं की व्यथाकथा है जो वन प्रांतर में लकड़ियों का बोझ ढ़ोती रोज ऊंचाइयां चढ़ती उतरती हैं, लेकिन गीत गाकर किसी तरह मन को समझाने की कोशिश करती हैं, मायके की याद आने पर दो बूंद आंसू बरबस टपक ही पड़ते हैं-
टपक पड़ते हैं दो बूंद आंसू
गीतों की स्वर लहरियां
उसे डुबोने लगती हैं और
रोज का क्लेश याद आते ही
रात्रि का दृश्य
नाचने लगता है उसकी आंखों में
बाँज व लकड़ी के बोझ ये लथपथ
घर पहुंचने पर
वो गठ्ठर फेंकेगी आँगन में
गाय दुहने बैठेगी
चूल्हा चैका और बच्चे सम्भालेगी।
मंजु जी की नजर पहाड़ों की लचर होती जा रही शैक्षणिक व्यवस्था पर भी है, जहां भारत के मैदानी इलाकों की तरह पब्लिक स्कूल खुल चुके हैं और सरकारी स्कूलों में बच्चे भर्ती नहीं होते हैं। इनकी कविता ’आसमान के करीब’ में सरकारी स्कूलों में साल दर साल घटती संख्या को लेकर चिंता कुछ इस तरह है-
शैक्षणिक व्यवस्था के
बाजार सज गए हैं
आकर्षक और लुभावने भरोसों
और वादों दावों के साथ
प्राइवेट स्कूलों में
माँ बाप और बच्चों की
भीड़ जुटने लगी है
सरकारी स्कूलों में
साल दर साल
घटती छात्रों की संख्या
मंजु पांगती के कवि का दिल उस समय बैठ जाता है, जब इनके इलाके में इक्कीसवीं सदी की महिला होकर भी उसे घर परिवार और समाज में जलील होना पड़ता है। इनकी कविताएं ऐसी महिलाओं की पक्षधर हैं और उनकी व्यथा का हिस्सा बनती है। तथाकथित पुरुषवादी सोच मैदानी इलाकों की तरह पहाड़ी संस्कृति में भी घुलमिल चुकी है-
हर बार दिल बैठ जाता है
बेकसूर को जलील होते देख
कहीं दूर से उठती सिसकारियां
निश्चित ही किसी
महिला का विलाप था
इक्कीसवीं सदी की महिला
आत्मनिर्भर है
परिवार में सम्मानित होने पर भी
दुत्कारी जाती है समाज में।
हिमाचल और उत्तराखंड से हर साल सैंकड़ों युवक अपने गांव की पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत तथा खाड़ी के देशों में रोटी रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं। इनमें से कुछ चीन, जापान, अमेरिका, ब्रिटेन भी जाते हैं और देहातों में रह जाते हैं, बूढ़े माता पिता, दादा दादी जैसे रिश्तेदार। अनेक बार उन्हें नवब्याहता पत्नी को भी गांव में छोड़ने की मजबूरी का सामना करना पड़ता है। देश को आजादी मिले 78 बरस बीतने के बाद भी पहाड़ों में रोजगार के संसाधनों का टोटा है। वहां अधिकांश अर्थ व्यवस्था पर्यटन आधारित है। देवी देवताओं के बीसियों मंदिरों में दर्शन तथा बर्फबारी का आनंद लेने के लिए लाखों लोग मैदानों से पहाड़ों की तरफ जाते हैं, इसी के चलते वहां अर्थ व्यवस्था का पहिया घूमता तो है, लेकिन स्थाई रोजगार फिर भी नहीं मिल पाता। यही कारण है कि उत्तराखंड़ की धरती उद्योग धंधों के मामलों में सपाट है। इसी पलायन का दर्द मंजु जी की कविता में अनेक जगह मुखर है-
दिल में बसता है पहाड़
फिर भी जाना पड़ा था
छोड़ अपना घरबार
कुछ वक्त की मजबूरी
कुछ पेट की भूख
कुछ बड़ा बन जाने का
दिल में जज्बा
मैदानों से पहाड़ों की तरफ मौज मस्ती के लिए जाने वाले लोग वहां अथाह कूड़ा कचरा फेंक आते हैं, इनमें पुण्य कमाने के लिए जलाई गई अगरबत्ती के खाली पुड़े, हार फूल, नारियल के खोखे, डिस्पोजल, भोजन की जूठन सहित बहुत सी सामग्री होती है। वहां भी मैदानी इलाकों की तरह सुबह सवेरे फटेहाल बच्चों को पहाड़ों की खाक छानते, कम कपड़ों में भीषण ठंड में ठिठुरते कूड़े के ढ़ेर से अपने काम की वस्तुएं, एक बड़े से झोले में जमा करते देखा जा सकता है। स्कूली शिक्षा से वंचित, करूणा और मजबूरी की मार से सताए इन बच्चों के चेहरे देख मंजु जी को कहना पड़ा-
कूड़ा बीनते
बच्चों की पहली
पाठशाला है भूख
कुछ खाया होगा
या नहीं! सुबह
सुबह सुबह
अपने कद से बड़ा लेकिन
भूख के मुकाबले बहुत
भारी थैला लिए पहुंच जाते
कूड़े के ढेर पर
मंजु जी की कविता में लोक संस्कृति के अनेक आयाम देखे जा सकते है, वहीं उनमें पीढी दर पीढ़ी चली आ रही किंवदंतियां, लोकगाथाएं भी कविता में जगह पाती हैं। इनकी ऐसी ही एक कविता ’प्योंली’ नामक फूल को लेकर है। बताती हैं कि यह उत्तराखंड में बसंत के आगमन पर खिलने वाला कोमल पीले रंग का सुंदर फूल होता है। इसके बारे में कहा जाता है कि एक राजा जंगल में शिकार करने गया था। जहां उसे एक सुंदर बाला दिखी। उसके रूप सौंदर्य से प्रभावित होकर राजा ने उससे ब्याह कर लिया, लेकिन वह महल में उदास रहने लगी। अपने जंगल के वियोग में एक दिन वह दुनिया से चल बसी। उसकी इच्छानुसार उसको उसी जगह दफना दिया गया। कुछ समय बाद वहां सुंदर कोमल पीले रंग का फूल खिल आया। मंजु की कविता में उत्तराखंड इस कदर मुखर है कि वह इनके संकलन ’पहाड़ों की धड़कन’ के शुरूआती से लेकर अंतिम पन्नों तक संग-संग चलता है। पहाड़ों के इतने अधिक रूपाकार हैं कि कविता की सृष्टि पहाड़ों में दूध में पानी की तरह घुली मिली जान पड़ती है-
गए तो थे पहाड़
कुछ दिन रुक कर
लगा वो बात अब कहां
जो छोड़ गए थे तब
मन लौट-लौटकर
देख रहा था बीते वक्त को
उत्तराखंड के कुमाऊंनी अंचल में लोक गायक प्रहलाद सिंह मेहरा का बड़ा नाम है। मात्र 53 बरस की उम्र में दिवंगत इस लोक गायक ने उत्तराखंड के लोगों में जो जगह बनाई वैसी अन्य किसी गायक ने नहीं। वहां भी फिल्मी गीतों की फूहड़ता भले ही जगह बना रही हो लेकिन प्रहलाद जी को आज भी सुना और गुनगुनाया जाता है। इस लोक गायक ने पहाड़ों की संस्कृति को अपने कंठ में जिस प्रकार संजोया था, वह बेमिसाल है। आज भी उन्हें घर-घर में सुना जाता है। मंजु जी की एक कविता उन्हीं को समर्पित है-
तुम्हारे चार शब्दों ने
शहरी और गांव देहात की
औरतों के व्यस्त जीवन और
बेहद कठिन जीवन में
उल्लास उमंग के सतरंगी
इंद्रधनुषीय एक नहीें
अनेकानेक रंग भर दिए थे
आज भी तुम्हारे गीत
लाखों लाख पहाड़ों को
लांघ जाते हैं
उत्तरीभारत के मैदानों में मार्च के दिनों टेसू अर्थात पलाश के फूलों के खिलने पर ऐसा लगता है मानों जंगल में आग लगी हो, ठीक उसी तरह उत्तराखंड में बुरांश के लाल सुर्ख फूलों के खिलने से वन प्रांतर के चेहरे खिल उठते हैं। इन फूलों में मादक खुशबू आती है और इनसे शर्बत भी बनाया जाता है। वहां ’फूल देई’ नामक उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है, तब बुरांश के फूलों का महत्व और बढ़ जाता है-
फूलदेई पर देहरी पर
चढ़ाया जाता है
स्वास्थ्य हित में लाभकारी
बुरांश का फूल
उबल रहा बड़े-बड़े भगोनों में
स्वरोजगार का साधन बन
पोषित कर रहा
पहाड़वासियों को बुरांश
पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री की अस्मिता से जुड़े सवालों को भी मंजु जी ने उठाया है। मसलन जिंदगी में एक बार के बाद फिर से छले जाने की पीड़ा, विवाद से बचने के क्षणों में चुप्पी साधना सहित अनेक जीवन की जीवंत स्थितियां हैं जो इनकी कविताओं की पुख्ता बुनियाद खड़ी करती हैं। इन कविताओं में वासंती फूलों और लचकती डालियों से लबरेज ताज़गी है तो कहीं कुछ ऐसे भाव भी उतरे हैं जो हर वक्त जी में एक हलचल-सी मचाए रहते हैं। अनेकानेक सवाल करती मंजु जी की कविता चिरंतन परिचित अनसुलझे सवालों के उलझे घेरों के बीच एक रहस्य खोजती है। यह कविताएं विमर्श के सीमित दायरों में अपने को क़ैद नहीं रखतीं, वह उससे बाहर आकर उन सच्चाइयों को देखने की कोशिश करती हैं। यह कविताएं मनुष्यता की स्थापना के लिए प्रतिबध्द, उसके चिंतन का गुलदस्ता है, जिसके फूल प्रेम की सुगंध से सराबोर हैं। यह गहरी संवेदना और आत्मीयता से दमकती कविताएं हैं।
कविता अगर प्रश्न करना भूल जाए, कविता अगर पाठक के मन को झकझोरना भूल जाए या कविता सिर्फ राग दरबारी के आलाप में तल्लीन हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि कविता अपने चरित्र, व्यक्तित्व, धर्म और उद्देश्य को भूल चुकी है। यहां एक बात और किसी भी कवि को पढ़ते समय पाठक यही ढूंढता है कि उसमेें नया क्या है और कितना चौकन्ना है, वह अपने समय और आसपास के जीवन को देखने, जानने बूझने के लिए। इनमें वह आत्मीयता है जिसका जवाब नहीं। इन कविताओं के आंचल में उनींदे स्वप्न और ढ़ेर सारी कल्पनाओं को भेंट करने के अलक्षित कोनें हैं, लेकिन कविता के किसी भी हिस्से को अलग करके उद्धत करना मुश्किल है, मंजु जी का पूरा संकलन ’पहाड़ों की धड़कन’ एक कहानी है। वस्तुतः ये कविताएं एक मुकम्मल इकाई की तरह हैं। इसलिए उन्हें हिस्सों में नहीं पढ़ा जा सकता। कई बार तो किसी पंक्ति या पंक्तियों को अलग करके रखने में यह भी डर लगता है कि संदर्भ से कट जाने पर उसका अर्थ ही न बदल जाए! मंजु जी की बहुत सी कविताएं उदात्त प्रेम को समर्पित हैं जिसे लेकर इनका मानना है कि प्रेम भावना के तिरोहित हो जाने के कारण ही विश्व में हिंसा अपने चरम पर है, इन दिनों विभिन्न देश एक दूसरे के खिलाफ युध्दरत हैं। यदि विश्व में प्रेम और भाईचारा बढ़ेगा तो सभी तरफ शांति और उल्लास छा जाएगा।
मंजु जी के इस संकलन में कविताएं अधिक लम्बी नहीं हैं, लेकिन इनकी आवाज दूर तक जाती है। अपने अंचल को समर्पित कविताएं मसलन पिंडर के लिए मेरी भावांजलि, कुमकुम, पहाड़, परंपरा, फरवरी में बर्फबारी आदि, हालांकि इन सभी की चर्चा ही नहीं इन्हें गौर से पढ़ा भी जाना चाहिए, क्योंकि यह कविताएं मंजु जी को सशक्त कवि बनाती हैं। इनका कहना है कि इनकी मां बचपन में चल बसी थी और इसी वजह से उनकी तलाश कविता के जरिए करती रही हैं। इनके लिए पहाड़ सौंदर्य का पर्याय नहीं होकर बेहद कठिन जीवन स्थिति है। विकास के नाम पर लगातार काटे जा रहे वनों की पीड़ा भी इन कविताओं में है तो बांध और पुलों के निर्माण के दौरान पहाड़ों के दरक जाने और उसकी वजह से विनाशलीला का भी यह कविताएं मुखर दस्तावेज हैं।
मंजु जी के पास अनगिनत बिम्बों का पिटारा है, यह संकलन जिसके पन्ने दर पन्ने खोलते जाइए आप दंग हुए बिना नहीं रहेंगे। मुझे पूरा विश्वास है इस संग्रह को पढ़ने के बाद आप विचलित हुए बिना नहीं रह सकते। इनके इस संकलन ’पहाड़ों की धड़कन’ की अनेक कविताएं और अनेक पंक्तियां मन में उतरकर आपकी स्मृति का हिस्सा हो जाएंगी। कविताओं की भाषा सरल और प्रवाहमान है।
मुनस्यारी जिला पिथौरागढ़ में स्व. दुर्गासिंह मर्तोलिया और स्व. भागीरथी के घर जन्मी मंजु जी इन दिनों राजकीय प्राथमिक विद्यालय, ग्वालदम, विकासखंड थराली जिला चमोली (उत्तराखंड) में शिक्षिका हैं। ‘पहाड़ों की धड़कन’ संकलन का प्रकाशन न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुध्द नगर, नई दिल्ली-110012 ने किया है।

Hemant Bhatt