कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच झूलती रतलाम की शिक्षा व्यवस्था

कलेक्टर मिशा सिंह की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में शिक्षा विभाग की इन तमाम लापरवाहियों की कलई खुलकर सामने आ गई, जिसके बाद खुद कलेक्टर को कड़े तेवर अपनाते हुए अधिकारियों को अल्टीमेटम जारी करना पड़ा।

कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच झूलती रतलाम की शिक्षा व्यवस्था

शिक्षा शुरू मगर अब तक न किताबें बंटीं, न पूरे हुए नामांकन

⚫ समीक्षा बैठक में खुली विभाग की पोल

हरमुद्दा
​रतलाम, 15 जुलाई। जिले की सरकारी शिक्षा व्यवस्था ढर्रे पर लौटती नहीं दिख रही है। शिक्षा सत्र शुरू हो गया, मगर विभाग की सुस्ती का आलम यह है कि अब तक न तो बच्चों को शत-प्रतिशत किताबें मिल पाई हैं और न ही सभी बच्चों का स्कूलों में दाखिला सुनिश्चित हो सका है। कलेक्टर मिशा सिंह की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में शिक्षा विभाग की इन तमाम लापरवाहियों की कलई खुलकर सामने आ गई, जिसके बाद खुद कलेक्टर को कड़े तेवर अपनाते हुए अधिकारियों को अल्टीमेटम जारी करना पड़ा।

'अमृत महोत्सव' में भी दाखिले के लिए 'विशेष रणनीति' की दरकार क्यों?

​कलेक्टर ने बैठक में कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों के शत-प्रतिशत नामांकन के लिए 'विशेष रणनीति' बनाने और अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं। यह निर्देश अपने आप में विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान है। सत्र शुरू होने से पहले ही 'स्कूल चलें अभियान' जैसे बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, फिर ऐसा क्यों है कि जुलाई का महीना आधा बीत जाने के बाद भी प्रशासन को आंगनवाड़ी से पहली कक्षा में आने वाले बच्चों और पांचवीं से छठी कक्षा में जाने वाले ड्राप-आउट (पढ़ाई छोड़ने वाले) बच्चों को खोजने के लिए चाइल्ड ट्रैकिंग ऐप का सहारा लेना पड़ रहा है? बीईओ और बीआरसी जैसे मैदानी अधिकारी आखिर सत्र के शुरुआती दिनों में क्या कर रहे थे?

हफ्ता भर का अल्टीमेटम: अब तक क्यों नहीं बंटीं पाठ्यपुस्तकें?

​बैठक का सबसे चौंकाने वाला पहलू पाठ्यपुस्तकों के वितरण की धीमी रफ्तार रहा। बच्चों के हाथों में किताबें न होना विभाग की घोर लापरवाही को दर्शाता है। कलेक्टर को निर्देश देना पड़ा कि 'एक सप्ताह के भीतर' शत-प्रतिशत पुस्तकें बांटी जाएं और अधिकारी खुद जाकर इसका भौतिक सत्यापन करें। सवाल यह उठता है कि बिना किताबों के सरकारी स्कूलों के नौनिहाल अब तक क्या पढ़ रहे थे? क्या केवल औपचारिकता के लिए स्कूल खोले गए हैं?

​अपार आईडी और प्रगति पत्रक में लेती-लतीफी

​डिजिटल इंडिया के इस दौर में विद्यार्थियों की 'अपार आईडी' (APAAR ID) तैयार करने और डाटा मिलान का काम भी समय पर पूरा नहीं हो सका है। इसके अलावा कक्षा 6, 7 और 8 के विद्यार्थियों के प्रगति पत्रक (रिजल्ट कार्ड) अब तक तैयार न होना यह बताता है कि अकादमिक सत्र का पिछला पेंडिंग काम ही अभी तक नहीं निपटाया जा सका है।

​शिक्षकों की गैर-हाजिरी और निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगाने में बेअसर अमला

​बैठक में शिक्षकों की नियमित उपस्थिति पर विशेष जोर दिया जाना यह साफ करता है कि जिले के ग्रामीण और दूरदराज के अंचलों में शिक्षक अब भी अपनी मर्जी से स्कूल आ-जा रहे हैं। वहीं, निजी स्कूलों द्वारा शिक्षा विभाग को सहयोग न देने की बात भी सामने आई है, जिस पर कलेक्टर ने नियमानुसार कार्रवाई की चेतावनी दी है। यह दर्शाता है कि विभाग का निजी शिक्षण संस्थाओं पर जो प्रशासनिक नियंत्रण होना चाहिए, वह बेहद कमजोर है।

​जिला पंचायत सीईओ की मौजूदगी में खिंचाई, क्या सुधरेगी स्थिति?

​बैठक में जिला पंचायत सीईओ सुश्री वैशाली जैन की मौजूदगी में शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों (डीईओ, डीपीसी) को जिस तरह से समय सीमा में काम पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं, वह प्रशासनिक सख्ती को तो दिखाता है, लेकिन यह इस बात की गारंटी नहीं है कि व्यवस्था रातों-रात बदल जाएगी।

मुद्दे की बात

क्या एक सप्ताह के भीतर किताबें सच में हर बच्चे तक पहुंच जाएंगी या फिर अधिकारी केवल कागजी रिपोर्ट तैयार कर कलेक्टर को सौंप देंगे? रतलाम जिले के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों का भविष्य फिलहाल विभाग की इस सुस्त रफ्तार और फाइलों के फेर में फंसा नजर आ रहा है।