साहित्य रचना : शब्द बने कविता कब

मन में सौ-सौ घाव लिए कलम जब उतरे कागज़ पर, दर्द पिघलकर बनते गीत  मौन भी पकड़ता सुर में स्वर।

साहित्य रचना : शब्द बने कविता कब

मंजुला पांडेय

कविता तब तक कोरी हुई
जबतक शब्दों में भरे ना भाव,
सूनी पंक्तियाँ मरुभूमि-सम
जहां छाया मिले ना छांव।

भावों की रिक्तता भरे जब
अन्तर्मन का सागर लहराए,
हर अक्षर में स्पंदन जागे,
हर शब्द हृदय जुड़ जाए।

चलती लेखनी लिए चले
मन की गहराइयों के संग,
स्याही बनकर बहे संवेदना
रच दे जीवन का हर रंग।

मन में सौ-सौ घाव लिए
कलम जब उतरे कागज़ पर,
दर्द पिघलकर बनते गीत 
मौन भी पकड़ता सुर में स्वर।

जन्मे जब सच्ची कविता
बने वो आईना आत्मा की,
हर पढ़ने वाले के भीतर
चमके सदा वो नगीना-सी।

मंजुला पांडेय, उत्तराखंड