साहित्य सरोकार : आम आदमी के गीतकार थे शैलेंद्र
शैलेंद्र ने एक गीतकार ही नहीं एक विचारक और दार्शनिक के रूप में अपने गीतों में सिक्का जमाया है। जब वह अपने शब्दों के जादू से आम आदमी के मन की मूक संवेदना को गीतों में ढालते हैं तो लगता है यह हमारे, आपके, सबके जीवन से जुड़ी बात है।
⚫ खुदेजा खान
शैलेंद्र ने एक गीतकार ही नहीं एक विचारक और दार्शनिक के रूप में अपने गीतों में सिक्का जमाया है। जब वह अपने शब्दों के जादू से आम आदमी के मन की मूक संवेदना को गीतों में ढालते हैं तो लगता है यह हमारे, आपके, सबके जीवन से जुड़ी बात है। सुख-दुख, प्रेम, पीडा, संघर्ष, हताशा को सहज,सरल भाषा में भरपूर अनुभूतियों के साथ उन्ढ़ेल कर सीधे हृदय के संवेदी तंत्रों तक पहुंचा देना कमाल नहीं तो और क्या है।

आठ सौ गीतों के रचयिता का हर गीत भाव तत्व से परिपूर्ण व श्रवणीय है। तथापि कुछ गीत इन्हें विचारक की श्रेणी में ला खड़ा करते हैं। जिनमें लोक धर्मिता, जीवन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता, मनुष्य जाति की जिजीविषा जो स्वयं शैलेंद्र ने भी अपने प्रारंभिक जीवनकाल में भोगी और झेली है।
सर्वहारा के लिए लिखते हुए वे सामाजिक परिवर्तन की दिशा में चेष्टारत दिखाई देते हैं। पर पीड़ा को आत्मसात कर ही कोई इतना गहन एवं मार्मिक सृजन कर सकता है।सड़क के आदमी से लेकर महलों के निवासियों तक जिस विचारपरक दृष्टिकोण से शैलेंद्र ने गीत रचे वह अद्भुत है। वामपंथी रुझान के कारण न्याय के लिए संघर्ष करने की भावना से लैस और जीवन दर्शन के प्रति आग्रह, अनायास उनके गीतों का मूल स्वर बन जाते हैं।
सबसे अधिक शीर्षक गीत लिखने वाले गीतकार के गीत एक सशक्त विचारक की छवि को दृढ़ता से समक्ष रखते हैं।
1966 में रिलीज हुई फिल्म ’तीसरी कसम’ के गीत ’दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई’ की हर पंक्ति वैचारिक कसौटी पर खरी उतरती है।
’तूने काहे को दुनिया बनाई’ इस दुनिया में पैदा होने वाले हर शख्स की जिंदगी में कभी न कभी तो ऐसे पल आए होंगे जब उसके दिल में यह सवाल मचल कर उठा होगा। दुनिया ऐसी जगह है, जहां सजा और मजा दोनों का स्वाद एक साथ चखने को मिलता है। जिस घड़ी जीने का मजा आने लगता है दूसरी ही घड़ी उस मजे को किरकिरा करने वाले कुछ ऐसे अनचाहे घटनाक्रम सामने आ आकर अड़चनें पैदा कर देते हैं जिनका सामना अपरिहार्य रूप से करना ही पड़ता है। सुख की लहर कुलांचे भरते हुए पास आती है, भिगोकर जब लौटती हैं, तब दुख की कितनी ही बेमतलब तलछट को पांव तले छोड़कर चली जाती है। फिर इन गंदली, बदमजा चीजों को साफ़ -सुथरा करने के प्रयास में जुटना पड़ता है। फिर कोई इच्छा जन्म लेने लगती है। इच्छा की पूर्ति, दृढ़ इच्छा शक्ति के बिना संभव नहीं। फिर ऊर्जा संचित कर उसे पाने की लालसा में लगना पड़ता है। यह क्रम आजीवन चलता रहता है। यही तो दुनिया का खेला है। एक के बाद एक दिन आगे बढ़ते हैं, साथ में उम्र और समय भी। इसी से तालमेल बैठाने का नाम है दुनियादारी। सवाल तो पैदा होगा ही ’काहे बनाए तूने ’माटी के पुतले’ धरती ये प्यारी प्यारी मुखड़े ये उजले, काहे बनाया तूने दुनिया का खेला, जिसमें लगाया जवानी का मेला, गुपचुप तमाशा देखे, वाह रे तेरी खुदाई, तूने काहे को दुनिया बनाई....
जिंदगी आसान तो नहीं फिर भी जवानी के जोश में दुनिया जीतने का हौसला भी कम नहीं होता, लगता है बस हमने चाहा, ठान लिया तो कुछ भी नामुमकिन नहीं। जो चाहेंगे, जैसा चाहेंगे, वैसा हो ही जायेगा। पर वक्त के साथ धीरे-धीरे सब समझ आने लगता है कि जीवन केवल स्वच्छंद उड़ान नहीं, पग-पग पर ठोकरों का सिलसिला है। गिरो उठो, सम्भलो कि फिर से चलने लायक हो सको। चोट लगे तो मरहम पट्टी भी खुद करो। जख्म भरने का इंतजार करो और फिर मंजिल की तरफ़ उठ खडे हो। यह फिर... फिर पीछा नहीं छोड़ता। हारो या जीतो फिर भी थक कर बैठो मत। मार्टिन लूथर किंग जूनियर का उद्धरण याद आ रहा है ’अगर आप उड़ नहीं सकते- तो दौड़ें, अगर आप दौड़ नहीं सकते- तो चलें, अगर आप चल नहीं सकते- तो रेंगें लेकिन आप जो भी करें आपको आगे बढ़ते रहना होगा।’
दुनिया बनाने वाला तो गुपचुप तमाशा देख रहा है उसकी खुदाई पर उंगली उठाने से क्या फायदा। एनालिसिस करना है तो अपने आप का करो कि आप कितने पानी में हैं।अब तक क्या सीखा, क्या समझा, क्या जाना, अपने आप को भी और इस दुनिया को भी। एक विचारक की भांति गीतकार जीवन के अनेक पड़ावों से होकर गुज़रता है।
चलिए इस गीत के दूसरे अंतरे में प्रवेश करके देखते हैं-
’तू भी तो तड़पा होगा, मन को बना कर, तूफां ये प्यार का, मन में छुपा कर कोई छवि तो होगी, आंखों में तेरी, आंसू भी छलके होंगे, पलकों में तेरी, बोल क्या सूझी तुझको, काहे को प्रीत जागाई, तूने काहे को दुनिया बनाई....
मन की गति, प्रकाश की गति से भी तेज़ होती है। पलछिन रोशनी से झिलमिलाते ख््वाबों- ख्यालों के बीच इस मन में कहीं प्रेम जगह बना ले तोः क्या ही कहने! मन की हालत उस पारे जैसी हो जाती है जो स्थिर नहीं रह पाता। ऐसे प्रेम से भरे मन को फिर कहां चैन मिलता है। प्रिय मिलन की आस हो और आस, निराशा में बदल जाए तो इस तड़प को किसे दिखाएं, किसे बताएं, व्याकुल प्रेम वेदना से पीड़ित हृदय, उस अदृश्य शक्ति से गुहार लगाने लगता है। प्रीत ही तो है जिससे इस सृष्टि में प्रेमिल सौंदर्यानुभूति के अनेकानेक आयाम मनुष्य को मनुष्य से जोड़े रखने की क्षमता रखते हैं। सोचिए अगर यह दुनिया न होती तो न हम जैसे मानुष होते न मानुष की कोमल संवेदनाएं, न हृदय में धड़कती भावनाएं। सारा झंझट मनुष्य की भावुक प्रेमासिक्त संवेदनाओं का ही है। यह संवेदनाएं बहुत गहरे जाकर कभी आनंदित करती हैं और कभी आहत कर देती हैं। इनका कोई पैरामीटर नहीं हैः सारा कुछ परिस्थितिजन्य होता है। अंतिम अंतरे में प्रेमी युगल के मिलन की पराकाष्ठा, धैर्य की सीमा लांघती हुई तड़प उठती है।
प्रीत बनाके तूने जीना सिखाया, हंसना सिखाया-रोना सिखाया, जीवन के पथ पर मीत मिलाए, मीत मिला के तूने सपने जगाए, सपने जगा के तूने, काहे को दे दी जुदाई, तूने काहे को दुनिया बनाई....
सृष्टि का चक्र नर और नारी दो प्राणियों के इर्द-गिर्द घूमता है। इन्हीं के सानिध्य से संसार अस्तित्व में आया। पृथ्वी के सर्वश्रेष्ठ प्राणी के रूप में उनके पास अभिव्यक्ति की सबसे समृद्ध भाषा है। इसका सबसे सुंदरतम माध्यम है दो हृदय को आपस में जोड़ने वाला प्रेम। संवाद स्थापित होने और दो का युग्म बनने की प्रक्रिया बनते ही जैसे नवरस अपनी उदात्तता के साथ जीवन में छाने लगते हैं। नए अध्याय का पदार्पण, एक-एक पृष्ठ को पलट कर जिंदगी का सबक सिखाने लगते हैं। रोना, हंसना, क्रोध, ग्लानि, भय, घृणा, साहस, क्षोभ, आसक्ति जैसे भावों का जीवन में समावेश होने लगता है। बंद आंखों के सपने, जागती आंखों के सामने यथार्थ की कठोरता लिए, सम्मुख खड़े होने लगते हैं। जुदाई का अर्थ व्यापक संदर्भों में खुलने लगता है। दरअसल यही वह समय होता है जब जीवन की पाठशाला हमें नए-नए पाठ सिखाती है और दुनिया में जीने के लायक परिपक्व बनाती है। यही दर्शन, इस गीत को विचारक की कसौटी पर कसकर अपने को सिद्ध करता है।
यूं भी बिना विचारे तो कुछ भी नहीं लिखा जा सकता। शैलेंद्र क्योंकि भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से भी जुडे़ रहे इसलिए उनके गीतों में सामाजिक यथार्थ के दृश्य बहुतायत से आते हैं और वैचारिकी की तीक्ष्ण धार भी दिखती है। एक समय पर जीवन- यापन के लिए उन्होंने रेलवे में छोटी-मोटी नौकरी की थी। लिहाजा वे मजदूर, कामगारों के दुख- दर्द को करीब से जानते थे। सड़क का आम आदमी केवल भूख से ही नहीं झूझता, प्रेम की रिक्तिता भी उसे तोड़ देती है। इस सिलसिले में शैलेंद्र का एक गीत और है। 1959 (फिल्म-अनाड़ी ) प्रेम के जज्बे से लबालब भरा, इसमें अपने सिवा दूसरे से प्रेम करने की गुज़ारिश करते हुए वे कहते हैं-प्रेम केवल अपने प्रिय से ही नहीं किया जाता। प्रेम के अनेक रूप, प्रतिरूप, दृष्टिकोण, आयाम होते हैं। समूची सृष्टि में चाहने के लिए बहुत कुछ है। अंततरू यह भाव मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति से जुड़ा हुआ है। मानव यदि मानव मात्र से प्रेम भाव रखे तो यह धरती स्वर्ग बन जाए। दया, करुणा, सहानुभूति, ममता, वात्सल्य, स्नेह, उदारता इन सब के मूल में प्रेम जनित भावना का संवेग है। अंतस में लेश मात्र भी प्रेम की उपस्थिति संवेदना जगाने के लिए काफ़ी है। इसका स्वाद गूंगे के गुड़ के समान तंत्रिकाओं में घुलकर आनंदित करता है। गीत की पंक्तियां देखें-
किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है
जिंदगी क्या है? सिर्फ जिए जाना या किसी मक़सद से जीना और ये मक़सद क्या.... केवल अपने लिए जीना या औरों को भी अपनी परिधि में शामिल कर लेना। वैसे सबके लिए जीने के मायने अलग-अलग होते हैं। कोई भौतिक सुखों में आकंठ डूब कर सोचता है, यही जीवन है। कोई धर्म-अध्यात्म की राह पर चलते हुए इसका अर्थ खोजता है। शैलेंद्र यहां प्रेम को सर्वोपरि मान कर सबसे प्रेम पूर्ण व्यवहार करके जीवन का लक्ष्य व अर्थ निर्धारित करते हैं। स्वयं से ऊपर उठकरय किसी अन्य से प्रीतिपूर्ण व्यवहार ही जीवन मूल्यों के नैतिक आचरण का आधार बनता है।किसी की खुशी में खुश होने का उदात्त भाव, किसी की पीडा को हरने की करुणाजनक संवेदना। ये भी जीने का एक ढंग है। धन-दौलत जैसे बाहरी दिखावे को, माया मोह को, सामाजिक प्रतिष्ठा का मानक भले ही माना जाता हो लेकिन वास्तविक सुख की परिपूर्णता मन के प्रेम से आपूरित होने में है। प्यार से भरा एक हृदय जिसमें सबके लिए सौहार्द हो, सदाशयता हो। यही कल्पना की होगी गीतकार ने और लिखा होगा-
माना अपनी जेब से फ़क़ीर हैं फिर भी यारों दिल के हम अमीर हैं
लुटे जो प्यार के लिए वो ज़िंदगी
जले बहार के लिए वो ज़िंदगी, किसी को हो न हो हमें है एतबार
जीना इसी का नाम है।
भरोसे की नींव पर टिका प्रेम का सेतु, डगमगाता नहीं। स्थिर, अटल रहकर दो छोरों को आपस में जोड़े रखता है। अमर प्रेम की सच्ची गाथाओं का गवाह है इतिहास। शेक्सपियर के रोमियो-जूलियट से लेकर हीर-रांझा तक। धरती के हर हिस्से पर प्रेम करने वाले प्रेम की खातिर मर मिटे। मरकर भी ये किरदार अमर हो गए। प्रेमियों के लिए मिसाल बन गए। प्रेम ही है जो किसी के आंसुओं में मुस्कुराने की क्षमता रखता है। फूलों की तरह खिलता है। कली-कली को ऊर्जस्वित होकर नवजीवन के प्रति आश्वस्ति प्रदान करता है। विषमताओं में डटे रहने की प्रेरणा देता है। जीवन की इस यात्रा के झंझावातों में तमाम संघर्ष समाहित रहते हैं।संघर्ष करते हुए भी प्रेम सर्वोच्च स्थान पर आसीन अपनी महिमा को अक्षुण्ण रखता है। यही चुंबकीय आकर्षण प्रेम की शक्ति है।गीत का अंतिम अंतरा है-
रिश्ता दिल से दिल के एतबार का
जिंदा है इसी से नाम प्यार का कि मर के भी किसी के काम आएंगे
किसी के आंसुओं में मुस्कुराएंगे कहेगा फूल हर कली से बार-बार
जीना इसी का नाम है।

प्रस्तुति : खुदेजा खान
Hemant Bhatt