विचार सरोकार : नाती-पोते खिलाने की उम्र में शिक्षकों पर 'टीईटी' की तलवार

​शिक्षा की गुणवत्ता जरूरी है, लेकिन यह उन कंधों को तोड़कर नहीं हासिल की जानी चाहिए जिन्होंने इस व्यवस्था को सालों तक संभाला है। नाती-पोते खिलाने की उम्र में शिक्षकों के हाथों में 'टीईटी का नोटिस' थमाना हमारी व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है। उम्मीद है कि नीति निर्माता इस मानवीय पहलू को समझेंगे और इन 'बूढ़े बरगदों' को ससम्मान छांव देंगे।

विचार सरोकार : नाती-पोते खिलाने की उम्र में शिक्षकों पर 'टीईटी' की तलवार

वीरेंद्र त्रिवेदी

"जिस उम्र में इंसान जिंदगी की भागदौड़ से थककर घर पर नाती-पोतों के साथ वक्त बिताने और सुकून की सांस लेने की सोचता है, उस उम्र में हमारे समाज के राष्ट्रनिर्माता (शिक्षक) हाथों में किताबें थामे परीक्षा केंद्रों के बाहर कतारों में खड़े रहेंगे।"

यह मुद्दा देश के उन हजारों वरिष्ठ, तदर्थ (Ad-hoc) और संविदा शिक्षकों की कड़वी हकीकत है, जिन पर जीवन के इस पड़ाव में टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) पास करने का कानूनी दबाव है। ऐसा न करने पर उनकी सालों की नौकरी, पेंशन और सामाजिक सम्मान दांव पर लगा है।

​अनुभव बनाम आधुनिक नियम: कहाँ है टकराव?

​शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) और नई शिक्षा नीतियों के तहत गुणवत्ता सुधारने के लिए टीईटी को अनिवार्य किया गया है। नियम अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन इन्हें लागू करते समय 'मानवीय दृष्टिकोण' और 'व्यावहारिक अनुभव' को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है।

​बदला हुआ परीक्षा पैटर्न

50 या 55 वर्ष पार कर चुके शिक्षकों ने अपनी पढ़ाई दशकों पहले पारंपरिक तरीके से की थी। आज की टीईटी परीक्षा पूरी तरह से आधुनिक शिक्षाशास्त्र (Pedagogy), तार्किक क्षमता और कंप्यूटर आधारित या ओएमआर पैटर्न पर आधारित होती है, जिससे तालमेल बिठाना इस उम्र में बेहद कठिन है।

​याददाश्त और एकाग्रता की उम्र

विज्ञान भी मानता है कि उम्र बढ़ने के साथ बहुत पुरानी पढ़ी हुई बातों को याद रखने या प्रतियोगी परीक्षाओं को हल करने की गति (Speed) धीमी हो जाती है।

​दशकों का व्यावहारिक अनुभव 

जो शिक्षक पिछले 20-30 साल से ब्लैकबोर्ड पर चाक घिसकर पीढ़ियां संवार रहे हैं, क्या उनकी योग्यता को महज तीन घंटे की एक लिखित परीक्षा से आंका जाना न्यायसंगत है?

संकट केवल नौकरी का नहीं, आत्मसम्मान का है

​एक शिक्षक के लिए समाज में उसका सम्मान ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। जब एक गुरु, जिसने खुद हजारों बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर बना दिया, समाज के सामने परीक्षा में 'अनुत्तीर्ण' घोषित होता है, तो उसका आत्मसम्मान पूरी तरह टूट जाता है।

​एक बुजुर्ग शिक्षक की पीड़ा

"जिन बच्चों को मैंने ककहरा (ABCD) सिखाया, आज उन्हीं के हमउम्र बच्चों के साथ परीक्षा हॉल में बैठकर पर्चा हल करना और फिर फेल हो जाना, मानसिक रूप से मार देने जैसा है।"

​इस उम्र में असफलता के परिणाम

​आर्थिक संकट

 इस उम्र में नौकरी जाने का मतलब है बुढ़ापे का सहारा छिन जाना। कई राज्यों में ऐसे शिक्षकों की सेवाएं समाप्त की जा रही हैं या उनका वेतन आधा कर दिया जा रहा है।

​पारिवारिक जिम्मेदारियां

50-60 की उम्र वह समय होता है जब बच्चों की शादियां, उच्च शिक्षा और खुद की बीमारियों के खर्च सबसे ज्यादा होते हैं। ऐसे में आय रुकना पूरे परिवार को गर्त में धकेल देता है। समाधान की राह क्या हो सकता है बीच का रास्ता? नियमों की सख्ती अपनी जगह है, लेकिन सरकारों और कोर्ट को इस बुजुर्ग कार्यबल के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाना चाहिए।

​उम्र के आधार पर छूट

एक निश्चित आयु सीमा (जैसे 50 या 52 वर्ष से अधिक) पार कर चुके अनुभवी शिक्षकों को टीईटी परीक्षा से पूरी तरह छूट (Exemption) मिलनी चाहिए। उनके लिए केवल आंतरिक मूल्यांकन या रिफ्रेशर कोर्स पर्याप्त होना चाहिए।

​क्लासरूम परफॉर्मेंस को आधार बनाएं

परीक्षा के अंकों के बजाय, इस बात की जांच हो कि शिक्षक स्कूल में बच्चों को कैसा पढ़ा रहे हैं। उनका पिछला 20 साल का ट्रैक रिकॉर्ड ही उनका सर्टिफिकेट माना जाए।

छत्तीसगढ़ में ऐसा

छत्तीसगढ़ के परिणाम ने शिक्षकों की मायूसी में दस गुना इज़ाफ़ा कर दिया। छत्तीसगढ़ में बरसों से कार्यरत शिक्षकों के लिए अभी हाल ही में टीईटी की परीक्षा हुई तो परिणाम चौंकाने वाला रहा। सिर्फ 8 प्रतिशत कार्यरत शिक्षक ही उत्तीर्ण हो पाए। 92 प्रतिशत शिक्षक ये परीक्षा उत्तीर्ण ही नहीं कर पाए।

ससम्मान विदाई (VRS) का विकल्प

यदि सरकार नियमों से समझौता नहीं कर सकती, तो इन शिक्षकों को जबरन निकालने के बजाय पूर्ण पेंशन लाभ के साथ स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) का विकल्प दिया जाना चाहिए, ताकि उनका बुढ़ापा सुरक्षित रहे।

नीति निर्माता समझेंगे मानवी पहलुओं को

कुल मिलाकर ​शिक्षा की गुणवत्ता जरूरी है, लेकिन यह उन कंधों को तोड़कर नहीं हासिल की जानी चाहिए जिन्होंने इस व्यवस्था को सालों तक संभाला है। नाती-पोते खिलाने की उम्र में शिक्षकों के हाथों में 'टीईटी का नोटिस' थमाना हमारी व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है। उम्मीद है कि नीति निर्माता इस मानवीय पहलू को समझेंगे और इन 'बूढ़े बरगदों' को ससम्मान छांव देंगे।