शिक्षक शिक्षिकाओं के लिए अब 'स्कूल चले हम' आदेश
देर से ही सही, DPI का यह फैसला सरकारी स्कूलों में दम तोड़ती शिक्षा व्यवस्था के लिए एक 'बूस्टर डोज' साबित हो सकता है। रतलाम सहित पूरे प्रदेश के अभिभावक और नौनिहाल इस बात से राहत महसूस कर सकते हैं
⚫ सालों बाद मूल स्कूलों में लौटेंगे 'अटैच' शिक्षक
⚫ DPI के कड़े रुख से रतलाम सहित प्रदेश भर में खलबली
⚫ नहीं आए तो नहीं मिलेगा वेतन, होगी कार्रवाई
⚫ हेमंत भट्ट
मध्यप्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग का महत्वाकांक्षी नारा 'स्कूल चले हम' इन दिनों विद्यार्थियों से ज्यादा उन शिक्षकों पर सटीक बैठ रहा है, जो सालों से मलाईदार टेबल, प्रशासनिक दफ्तरों या नेताओं की परिक्रमा में 'अटैच' (संबद्ध) थे। लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) ने एक कड़ा और बहुप्रतीक्षित आदेश जारी कर नेताओं के पीए, जनगणना, चुनाव और प्रशासनिक व्यवस्था के नाम पर मलाई काट रहे शिक्षकों के अटैचमेंट को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया है।
आदेश में साफ है—या तो मूल स्कूल में जाकर बच्चों को पढ़ाइए, नहीं तो जुलाई का वेतन रोकने के साथ ही सीधे सस्पेंशन (निलंबन) की गाज गिरेगी।
आदेश की मुख्य बातें
'लौटिए वरना नपेगा वेतन'
DPI द्वारा जारी इस आदेश ने प्रशासनिक गलियारों में सालों से जमे शिक्षकों की नींद उड़ा दी है। विधायकों के निजी सहायक (PA), चुनाव कार्य, जनगणना या अन्य गैर-शैक्षणिक प्रशासनिक कार्यों में अटैच सभी शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति समाप्त कर दी गई है। शिक्षकों को बिना किसी देरी के अपने मूल विद्यालय में जाकर कार्यभार संभालना होगा।
कड़ी कार्रवाई की चेतावनी
आदेश की नाफरमानी करने वाले शिक्षकों का जुलाई महीने का वेतन रोक दिया जाएगा और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
जब 'गुरुजी' दफ्तर बाबू बन गए, तो नौनिहाल कैसे पढ़ें?
यह आदेश शिक्षा विभाग की उस दबी हुई हकीकत को उजागर करता है, जहां कागजों पर तो शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के लिए भर्ती होते हैं, लेकिन रसूख के दम पर वे दफ्तरों के बाबू या नेताओं के खास नुमाइंदे बन जाते हैं। जो शिक्षक सालों से चॉक और ब्लैकबोर्ड से दूर रहकर सिर्फ फाइलों को इधर-उधर करने या नेताओं की जी-हुजूरी में व्यस्त थे, क्या वे अचानक स्कूल के माहौल में ढल पाएंगे? सालों बाद स्कूल का रुख कर रहे इन शिक्षकों के लिए अब बच्चों के बीच जाकर पढ़ाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं लग रहा है।
रतलाम जिले का हाल
चुनाव दर चुनाव खाली होते स्कूल
अगर सिर्फ रतलाम जिले की बात करें, तो यहां स्थिति और भी गंभीर रही है। जिले में हजारों शिक्षकों को एसआईआर, जनगणना और लगातार होने वाले चुनावों में झोंक दिया गया था। कभी लोकसभा, कभी विधानसभा, तो कभी नगर निगम और पंच-सरपंच चुनाव। ऐसा लगता है जैसे शिक्षकों की भर्ती पढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि केवल चुनाव संपन्न कराने के लिए की गई हो।
प्रभावित होता भविष्य
इस अंतहीन 'ड्यूटी चक्र' के कारण रतलाम के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के स्कूलों में अध्यापन कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा था। कई स्कूल तो एक या दो शिक्षकों के भरोसे राम भरोसे चल रहे थे।
लेटलतीफी से जागी सरकार, पर क्या जमीनी हकीकत बदलेगी?
DPI ने सुध तो ली है और यह कदम निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन यह विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून कहता है कि शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाया जाना चाहिए, फिर भी सालों-साल यह खेल कैसे चलता रहा? कई शिक्षक रसूखदार नेताओं और विधायकों के पीए बने बैठे हैं। क्या स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी इन राजनीतिक दबावों से मुक्त होकर आदेश का शत-प्रतिशत पालन करवा पाएंगे?
क्या रतलाम के दफ्तर खाली होंगे? रतलाम जैसे जिलों में जहां बड़ी संख्या में शिक्षक कलेक्ट्रेट, जिला पंचायत या तहसील कार्यालयों में 'अटैच' होकर मजे काट रहे हैं, क्या वे वाकई ईमानदारी से क्लासरूम का रुख करेंगे?
मुद्दे की बात

देर से ही सही, DPI का यह फैसला सरकारी स्कूलों में दम तोड़ती शिक्षा व्यवस्था के लिए एक 'बूस्टर डोज' साबित हो सकता है। कई शिक्षक शिक्षिकाएं तो इस आदेश के बाद फुले नहीं समा रहे हैं क्योंकि उन्हें वापस अपने बच्चे और स्कूल मिल गए हैं जिनके लिए वह नियुक्त हुए थे। चुनावी कार्य के कारण काफी परेशान थे। जरूरत होने पर भी अवकाश नहीं मिल रहा था। रतलाम सहित पूरे प्रदेश के अभिभावक और नौनिहाल इस बात से राहत महसूस कर सकते हैं कि अब उनके गुरुजी दफ्तरों की फाइलों से फुर्सत पाकर ब्लैकबोर्ड की तरफ लौटेंगे। लेकिन देखना यह होगा कि यह आदेश सिर्फ कागजी कड़कनाथ साबित होता है या वाकई जमीनी स्तर पर सरकारी स्कूलों की तकदीर बदलता है।
Hemant Bhatt