शख्सियत : मोबाइल फोन में सिमटकर रह गई आज की दुनिया

डिजिटल दुनिया में जरूरत से ज्यादा रमे रहने पर लोगों में शारीरिक थकान, गर्दन में दर्द और अनिंद्रा जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर खुद की तुलना दूसरों से करने के कारण तनाव और एंग्जाइटी जैसे मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी देखे जा रहे हैं। आभासी दुनिया में दुनिया भर के लोगों से जुड़ने के बावजूद लोग अपने आसपास के असल समाज, पड़ोसियों और रिश्तेदारों से कटते जा रहे हैं।

शख्सियत : मोबाइल फोन में सिमटकर रह गई आज की दुनिया

कवयित्री तृष्णा यादव का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’आज के दौर में मोबाइल फोन सचमुच एक पूरी दुनिया बन गया है जिसमें आधुनिक समाज सिमटकर रह गया है। विज्ञान और तकनीक ने हमें असीमित सुविधाएं दी हैं, लेकिन इसके अत्यधिक उपयोग ने इंसानी रिश्तों, भावनाओं और वास्तविक जीवन की जीवंतता को गहराई  से प्रभावित किया है।’


 यह बात आधुनिक कवयित्री तृष्णा यादव ने कही। इनका मानना है कि मोबाइल की इस डिजिटल दुनिया में समाज के सिमटने की वजह से आज एक ही डाइनिंग टेबल पर बैठे लोग एक दूसरे से बात करने के बजाय अपने-अपने मोबाइल की स्क्रीन पर उलझे रहते हैं, आमने सामने बैठकर सुख-दुख साझा करने की पुरानी परंपराएं और पारिवारिक बैठकें अब मैसेज और इमोजी तक सीमित हो गई हैं।

मोबाइल की वजह से अनेक समस्याएं

 तृष्णा जी का कहना है कि डिजिटल दुनिया में जरूरत से ज्यादा रमे रहने पर लोगों में शारीरिक थकान, गर्दन में दर्द और अनिंद्रा जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर खुद की तुलना दूसरों से करने के कारण तनाव और एंग्जाइटी जैसे मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी देखे जा रहे हैं। आभासी दुनिया में दुनिया भर के लोगों से जुड़ने के बावजूद लोग अपने आसपास के असल समाज, पड़ोसियों और रिश्तेदारों से कटते जा रहे हैं। यहां तक कि लोगों को यह भी पता नहीं है कि उनके आसपास कौन-कौन रहता है। पहले जहां पड़ोस के लोग बोलने बतियाने एक दूसरे के घर  जाया-आया करते थे, वहीं अब सभी टीवी और मोबाइल की दुनिया में खोये रहते है। पड़ोसी से पड़ोसी के जीवंत रिश्ते समाप्त हो चुके हैं।

उत्पादकता कार्यों के लिए समय नहीं

 तृष्णा जी का कहना है कि आज सुबह आँख खुलने से लेकर रात को सोने तक का समय मोबाइल के इर्द-गिर्द बीतता है और उत्पादक कार्यों में समय देने के बजाय ज्यादातर समय रील्स, गेमिंग और सोशल मीडिया स्काॅल करने में बर्बाद हो रहा है। मोबाइल पर निर्भरता इस हद तक बढ़ गई है कि इसके बिना एक पल बिताना भी मुश्किल लगता है। बच्चों का बचपन अब मैदानों और आउटडोर खेलों के बजाय छोटे-छोटे  से 6 इंच के डिस्प्ले में सिमट कर रह गया है।

मानवीय सम्बन्धों के मामले में चुनौतियां

 तृष्णा जी का मानना है कि आज की पीढ़ी तकनीक के मामले में सबसे आगे है। स्मार्ट फोन, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफार्म का इस्तेमाल करने में यह पीढ़ी बेहद दक्ष है। हालांकि, तकनीकी रूप से सक्षम होने के बावजूद सामाजिक मेलजोल और मानवीय सम्बन्धों के मामले में कई चुनौतियां सामने आ रही हैं। जानकारों को मानना है कि सोशल मीडिया और बढ़ती डिजिटल निर्भरता इसके प्रमुख कारणों में शामिल है। पहले संयुक्त परिवारों का चलन ज्यादा था, जिससे बच्चों को परिवार और समाज के कई लोगों से बातचीत करने के पर्याप्त अवसर मिलते थे। इससे उनमें सामाजिकता, संवाद कौशल और रिश्तों को समझने की क्षमता विकसित होती थी, लेकिन वर्तमान समय में छोटे-छोटे परिवारों और सीमित सामाजिक संपर्क के कारण बच्चों और युवाओं में सामाजिक कौशल की कमी देखने को मिल रही है।

ऑनलाइन शिक्षण एवं लेखन में व्यस्त

 तृष्णा जी का जन्म कोलकता में स्व. श्री मुकेश यादव तथा श्रीमती कौशल्या जी के घर हुआ। विवाह के बाद आप कोलकता में ही रह रही हैं। आपको 25 वर्षों का विद्यालयी शिक्षण का अनुभव है। इन दिनों ऑनलाइन शिक्षण और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। इनका कहना है कि हृदय अनुभूतियों और भावों को शब्द रूप देने के लिए लिखना बहुत जरूरी है। इनकी रचनाएं दैनिक विश्वामित्र और छपते-छपते समाचार पत्र के अलावा अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इन्हें अनेक ऑनलाइन साहित्यिक मंचों व्दारा सम्मानित किया जा चुका है। इन्हें नेपाल की प्रतिष्ठित संस्था ’शब्द प्रतिभा’ व्दारा नारी शक्ति सम्मान, जगदीश साहित्य संस्थान प्रयागराज व्दारा महादेवी वर्मा साहित्यसेवा सम्मान एवं कोलकता से सनातनी कवयित्री सम्मान से नवाजा जा चुका है। वर्ष 2014 और 2016 में इन्हें सर्वश्रेष्ठ शिक्षक सम्मान प्रदान किया गया। इसके अलावा आप महिला समिति के माध्यम से समाज सेवा के कार्यों से भी संलग्न हैं।
तृष्णा यादव की कविताएँ

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स्त्री टूटती है जब 

स्त्री टूटती है 
जब वह प्रेम में छली जाती है
स्वार्थ के पैरों तले निर्ममता से 
रौंदी जाती है।
स्त्री टूटती है 
जब वैवाहिक संबंधों में 
विश्वास की नींव दरकती है
हर उम्मीद जब राख बनकर बिखरती है।
स्त्री टूटती है 
जब उसके प्रेम को 
अग्नि परीक्षा से परखा जाता है
उसके हर सच को जब 
झूठ के कटघरे में 
खड़ा किया जाता है।
स्त्री टूटती है 
जब उसकी पहचान महज 
रिश्तों तक सीमित कर दी जाती है
जिम्मेदारियों के बोझ तले 
खुद की पहचान दम तोड़ जाती है। 
स्त्री टूटती है 
जब हर दिन थोड़ा-थोड़ा 
खुद को जोड़ती  है
पर हर रात बिखरकर भी 
खुद को  जिंदा रखती है।

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संवेदना की मौत

संवेदना चुपचाप मर गई
नृशंसता, हैवानियत के मलबे में 
मौन दबकर रह गई
कभी सड़कों पर, कभी 
सूनी गलियों में, कभी भीड़ के शोर में
शून्य में जैसे खो गई
चीखें उठी थी पर
दीवारों में दफ्न हो गई
आहत जिंदगी सिसकती रही
आंखें बर्फ सी जमती रही
न्याय की चैखट पर दस्तक हुई
पर दीवारें सब गूंगी हो गई
आंसू गवाही देते रहे
सच की चीखें गूंजती रही
पर साजिशों की 
परछाइयां गहरी हो गई
फरियाद थककर जड़ हो गई,
फैसले की आँखें बंद हो गई
दुनिया खामोश पत्थर बन गई
इंसानियत की चिता जल गई
संवेदना चुपचाप मर गई।

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आत्म मंथन

आज स्वयं को पहचाना मैंने
स्वयं का किया आत्म मंथन मैंने
अंगारों पर चलती रही आज तक
स्वयं को जलाकर क्या पाया मैंने?
जीवन के हर पन्ने को मौन पढ़ा मैंने
मिथ्यारोपों, वंचनाओं की भीड़ में
स्वयं को अकेले पाया मैंने 
मौन त्याग, समर्पण देकर
शून्य के सिवा क्या पाया मैंने?
शायद ये अंतहीन यात्रा थी मेरी
जिसका न कोई ओर न छोर पाया मैंने 
भग्न हृदय के अवशेषों से
स्वयं को ढूंढकर निकाला मैंने
सृजन के इस नव संसार में
स्वयं से स्वयं को पाया मैंने।

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आत्मिक प्रेम चाहती है स्त्री

स्त्री दैहिक प्रेम नहीं 
आत्मिक प्रेम चाहती है
तन की छुअन नहीं मन की 
छुअन अनुभूत करती है
मुखर नहीं मौन शब्दों में  
प्रेम का स्पर्श पढ़ती है
संवेदना और सम्मान में 
प्रेम की गहराई गढ़ती है
दैहिक प्रेम उसके लिए
क्षणिक आकर्षण है
आत्मिक प्रेम मन का शाश्वत बंधन है
शब्दों की मोहिनी मधुरता 
उसे आकर्षित नहीं करती
वह आत्मीयता और प्रेम का 
बंधन चाहती है
जो उसे अपने मजबूत पाश में बांधे रखे
उसके स्वाभिमान और 
गरिमा को बनाए रखे
स्त्री क्षणभंगुर प्रेम नहीं चाहती है
वह प्रेम में स्थायित्व चाहती है
स्त्री प्रेम की तात्कालिक 
संतुष्टि नहीं चाहती
स्त्री प्रेम की मजबूत गहराई में जीती है
स्त्री आत्मिक प्रेम में 
अपना अस्तित्व ढूंढती है
उसी में अपनी पूर्णता देखती है।