साहित्य रचना : शरद का चांद रजत किरणों से धरती का अभिषेक कर रहा
शरद पूर्णिमा का चांद साक्षी बन कर रहा चरण वंदन उतर गया इसलिए धरती के आंगन यमुना की धार में समा ले रहा महारास का आनंद
⚫ दीपा शर्मा "उजाला"
शरद का चांद
रजत किरणों से
धरती का अभिषेक
कर रहा धरती इठलाती इतराती
किरणो से अपनी
काली चुनर सजा
शरद का उत्सव मनाती
कृष्ण सन्ग राधा भी
हाथों में मेहंदी सजाती

प्रेम में डूबी गोपिया
कृष्ण कृष्ण की रटन लगाती
यमुना के तट पर
बंसी की धुन में
सब मदमस्त हो
कुछ पल को
अपनी सुदध भी भूल जाती
महारास रचा कृष्ण
कर गए सबको निहाल
पर छोड़ गए कुछ सवाल
योगेश्वर कृष्ण ,कामदेव कृष्ण
गोपियों कौन से
कृष्ण को है चाहती
कुछ नही मन मे
वह आज बस
कृष्ण मय ही होना चाहती
शरद पूर्णिमा का चांद
साक्षी बन कर रहा चरण वंदन
उतर गया इसलिए धरती के आंगन
यमुना की धार में
समा ले रहा महारास का आनंद
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जब मेरे होठो के गीत
तेरे होठो पर सजते है
जब तेरी आंख का पानी
मेरे नैनों से गिरता है
जब मेरे होठो के गीत
तेरे होठो पर सजते है
जब मेरे चेहरे की मुस्कान
तेरे चेहरे पर सजती है
वह प्यार कुछ और ही होता है
जब मेरे नैना तुझसे मिलकर
बिन बोले ही सब कह जाते हैं
बिन वाद्य यंत्रों के
संगीत के स्वर उमड़ते हैं
और चहुंओर बजती
बिन बात के शहनाई है
वह प्यार कुछ और ही होता है
जब मेरे हृदय की धड़कन
तेरे हृदय से होकर आती है
जब घंटो साथ सूनी सड़क पर
बिन बोले साथ-साथ चलते हैं
बस साथ पाने का
कोई भी कारण खोज लेते हैं
वह प्यार कुछ और ही होता
⚫ दीपा शर्मा "उजाला" फरीदाबाद

Hemant Bhatt