सामाजिक सरोकार : हिंदी हमारी सांस्कृतिक चेतना की उन्नायक

सामाजिक सरोकार : हिंदी हमारी सांस्कृतिक चेतना की उन्नायक

⚫ डॉ.अशोक भार्गव ने कहा

⚫ विश्व हिंदी परिषद के बैनर तले हुआ विज्ञान भवन नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन

हरमुद्दा
नई दिल्ली, 3 नवंबर। हिंदी भारत की आत्मा और राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान है। हिंदी हमारी सांस्कृतिक चेतना की उन्नायक है। हिन्दी की बात बहुत होती है किन्तु हिंदी में बात कम होती है। यदि हिन्दी में बात होने लगे तो हिंदी की समस्या ही हल हो जाए।

उक्त उदगार इंदौर के डॉ.अशोक कुमार भार्गव, आईएएस,पूर्व कमिश्नर रीवा शहडोल संभाग ने विश्व हिंदी परिषद द्वारा विज्ञान भवन नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी - हिंदी, राष्ट्रवाद और सुशासन' विषय पर विशिष्ट अतिथि के रूप में व्यक्त किए।

17 देश के प्रतिनिधि ने की शिरकत

इस सम्मेलन का उद्घाटन भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने किया। इस अवसर पर विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गैरिटा पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री अश्विनी चौबे, विश्व हिन्दी परिषद के मुख्य संरक्षक इंद्रेश कुमार, वरिष्ठ प्रचारक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, परिषद के अध्यक्ष पद्मभूषण यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद, महासचिव डॉ. विपिन कुमार, उपाध्यक्ष डाॅ.डीएस मिश्रा, राष्ट्रीय समन्वयक नंद किशोर साहा सहित अमरीका ऑस्ट्रेलिया लंदन नीदरलैंड जापान आदि 17 देशों के प्रतिनिधि और गणमान्य अतिथि उपस्थित थे।

मातृभाषा में होनी चाहिए ऊंची से ऊंची शिक्षा

इस अवसर पर डॉ. भार्गव ने कहा कि अटल जी हिन्दी के प्रति गहन निष्ठावान थे किंतु अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान भी करते थे। वे चाहते थे कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना चाहिए। ऊंची से ऊंची शिक्षा भी मातृभाषा में होना चाहिए क्योंकि इससे बच्चों में बेहतर समझ, विश्लेषण की क्षमता,आत्मविश्वास की वृद्धि, अपनी संस्कृति से जुड़ाव, बौद्धिक तथा संज्ञानात्मक विकास सहजता से होता है।

गूँजी हिंदी विश्व में स्वप्न हुआ साकार

डॉ.भार्गव ने कहा कि अटल जी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में पहली बार हिंदी में भाषण कर वैश्विक स्तर पर हिंदी की गरिमा, सम्मान और वैश्विक संवाद की सामर्थ्य को गौरान्वित किया। साथ ही कूटनीति के परिप्रेक्ष्य में भारत की सांस्कृतिक पहचान और आत्मविश्वास को नए आयाम दिए हैं। तब अटल जी ने कहा था कि "गूँजी हिंदी विश्व में स्वप्न हुआ साकार, राष्ट्रसंघ के मंच से हिन्दी की जयकार, हिन्दी की जयकार हिंद हिंदी में बोला, देख स्वभाषा प्रेम विश्व अचरज में डोला।" राष्ट्रवाद के संबंध में डॉ. भार्गव ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक चेतना के सशक्त प्रवक्ता अटल जी का समग्र व्यक्तित्व राष्ट्र प्रथम की भावना को समर्पित है जिसका स्वरूप वसुदधैव कुटुंबकम, सर्व समावेशी, राष्ट्र के प्रति प्रेम, निष्ठा, गौरव समर्पण और भारत बोध का प्रतीक है।

भारत भूमि का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्र पुरुष

डॉ.भार्गव ने कहा कि राष्ट्रवाद अटल जी के इस कथन में मुखर होता है कि 'भारत भूमि का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष है। हिमालय इसका मस्तक है। इसका बिंदु बिंदु गंगाजल है और कंकर कंकर शंकर है। यह वंदन, अभिनंदन, तर्पण और अर्पण की भूमि है।मरेंगे तो इसके लिए जिएंगे तो इसके लिए और मरने के बाद गंगा में बहती हुई हमारी अस्थियों को कोई कान लगाकर सुनेगा तो एक ही आवाज आएगी भारत माता की जय।

अनेक जन केंद्रीय योजनाएं हुई शुरू

डॉ.भार्गव ने सुशासन के संबंध में कहा कि सामाजिक समरसता के प्रबल समर्थक अटल जी ने सुशासन के दर्शन को सही अर्थों में जमीनी स्तर पर क्रियान्वित किया है। प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही, संवेदनशील और उत्तरदायी भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन, समावेशिता, सहभागिता और कानून के शासन को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए अनेक जन केंद्रित योजनाएं प्रारंभ की।प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, नदी जोड़ो योजना, स्कूल चलेॅ हम की टेग लाइन के साथ सर्व शिक्षा अभियान, फसल बीमा योजना, किसान क्रेडिट कार्ड.अंत्योदय योजना, नई दूरसंचार नीति और सामरिक दृष्टि से राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिए परमाणु शक्ति परीक्षण कर विश्व को चकित कर दिया। अटल जी महाशक्तियों के आर्थिक बहिष्कार के आगे झुके नहीं  वरन दृढ़ता और निर्भीकता से कहा कि' बाधाएं आती हैं आएं, घिरे प्रलय की घोर घटाएं, पांवो के नीचे अंगारे, सर पर बरसे यदि ज्वालाएं,निज हाथों में हंसते हंसते, आग लगाकर जलना होगा, कदम में मिलाकर चलना होगा।