मुद्दे की बात : व्यक्तिगत महिमामंडन, सामाजिक सरोकार और दिखावे का दीप उत्सव

उत्सव का तरीका संवेदनशीलता और जन-आकांक्षाओं के अनुरूप होना चाहिए। ईश्वर की जयंती और किसी जीवित व्यक्ति के जन्मदिन के अंतर को बनाए रखना बेहद जरूरी है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि करोड़ों रुपये के संसाधन केवल सोशल मीडिया रील्स और क्षणिक रिकॉर्ड बनाने में फूंकने के बजाय यदि गरीबों और वंचितों के जीवन में उजाला लाने में लगाए जाएं, तभी सही अर्थों में सेवा और नेतृत्व का उत्सव मनाया जा सकता है।

मुद्दे की बात : व्यक्तिगत महिमामंडन, सामाजिक सरोकार और दिखावे का दीप उत्सव

करोड़ों दीपोत्सव पर उठे सवाल, दिखावा या फिजूलखर्ची?

⚫ हेमंत भट्ट

भारतीय परंपरा और शास्त्रों में दीप प्रज्वलन को ज्ञान, प्रकाश और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रतीक माना गया है। रामनवमी या दीपोत्सव जैसे पावन अवसरों पर अयोध्या जैसे सांस्कृतिक केंद्रों में लाखों दीप जलाना जन-भावना, आस्था और राष्ट्रीय गौरव से जुड़ा विषय रहा है। किंतु, जब ईश्वर और आस्था के नाम बने इन प्रतीकों का प्रयोग किसी जीवित राजनीतिक व्यक्ति के जन्मदिन को मनाने के लिए किया जाता है, तो यह परंपरा और औचित्य दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

​हाल ही में 17 सितंबर को देश के प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर राष्ट्रव्यापी स्तर पर 'करोड़ों दीपक' जलाने का जो प्रयास हुआ, उसने आम जनता और नीति-विश्लेषकों के बीच एक नई बहस को जन्म दिया है। यह आयोजन एक सामाजिक उत्सव से अधिक 'दिखावा संस्कृति' (Show-off Culture) का प्रतीक बन कर रह गया। आम जनता और कई विचारकों के बीच इस आयोजन के औचित्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

​धार्मिक परंपरा बनाम निजी आयोजन

​सनातन परंपरा में रामनवमी, जन्माष्टमी या दीपोत्सव जैसे पर्वों पर प्रभु के सम्मुख दीपक जलाना शास्त्रों के अनुकूल और आस्था का विषय माना गया है। अयोध्या में दीपोत्सव के जरिए रिकॉर्ड बनाना धार्मिक और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा मामला था। लेकिन किसी जीवित व्यक्ति के जन्मदिन पर इस तरह व्यापक स्तर पर दीपक जलाना सनातन परंपरा के कई जानकारों और आम लोगों के गले नहीं उतर रहा है। यहां तक की पार्टी पदाधिकारी को भी केवल एक कार्यभार नजर आया। ना उन्हें समय की चिंता थी नहीं सभी दीप प्रज्वलित होने की। दीपक के सामने बैठे, फोटो खींचवाये और उठकर चल दिए। अब प्रशासनिक अधिकारियों को तो मौजूद रहना उनकी ड्यूटी में शामिल है और दीपक जलाना भी कार्य में शामिल है, वरना पार्टी पॉलिटिक्स हो जाती। इस दौरान कोई एक व्यक्ति भी मंदिर में दीपक लेकर नहीं गया जबकि पूरा परिसर विभिन्न देवी देवताओं के मंदिरों से दर्शनीय है।

​⚫ आर्थिक और भौतिक संसाधनों की निरर्थक बर्बादी

आज के समय में जब आम नागरिक महंगाई की मार झेल रहा है, तब इस प्रकार का फिजूलखर्च जनता के गले नहीं उतरता।

​सामग्री की बर्बादी: करोड़ों लीटर तेल, बाती, मोमबत्तियां और माचिस का प्रयोग बिना किसी ठोस सामाजिक उद्देश्य के किया गया।

​श्रम और समय का नुकसान: सरकारी व गैर-सरकारी तंत्र, कार्यकर्ता और आम जनमानस की ऊर्जा को केवल एक क्षणिक दृश्य (Visual) बनाने में झोंक दिया गया।

​आर्थिक औचित्य का अभाव: संसाधनों का यह प्रयोग न तो अर्थव्यवस्था को गति देता है और न ही किसी वंचित वर्ग का जीवन स्तर सुधारता है।

​⚫ जमीनी धरातल और क्रियान्वयन की विफलता

आंकड़ों और सोशल मीडिया के जरिए भले ही 'करोड़ों दीप' जलने का बड़ा दावा किया गया हो, किंतु जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।

​दिखावे की मशक्कत: आयोजन में आए कई लोग शारीरिक रूप से इस प्रकार की व्यवस्था के लिए तैयार नहीं थे। बैठना, दीप जलाना और व्यवस्था संभालना एक औपचारिकता मात्र बनकर रह गया।

​डिजिटल रील्स और फोटो-संस्कृति: इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य जन-सेवा या वास्तविक उत्सव न होकर 'रील बनाना', फोटो खिंचवाना और सोशल मीडिया पर वाहवाही लूटना रह गया।

​पर्यावरण और सफाई की अनदेखी: दीप जलाने के बाद स्थल को व्यवस्थित करने या कचरे को समेटने का कोई नियोजन नहीं था। जलने के बाद बची सामग्री सड़कों और परिसरों में उपेक्षित पड़ी रही। जिस जगह रात को भाजपा के वरिष्ठ नेता वरिष्ठ अधिकारी के लिए बंदोबस्त था, वही सुबह श्वान वहां पर क्रीड़ा करते हुए नजर आ रहे थे।

शास्त्र, परंपरा और प्रतीकों का अनचाहा अपमान

परंपरागत रूप से दीप हमेशा देव-प्रतिमा या मंदिर में जलाए जाते हैं। किसी जीवित राजनीतिक नेता के चित्र के सम्मुख इस प्रकार दीप प्रज्वलन करना मर्यादा के विपरीत प्रतीत होता है। कई जगहों पर जलते दीपों के बीच लगी तस्वीरें जनमानस में एक अजीब और अप्रिय भ्रम पैदा कर रही थीं, जिससे इस आयोजन के विचारशील स्वरूप पर भी सवाल उठे।

​⚫ दिखावा संस्कृति बनाम वास्तविक सामाजिक सरोकार

यदि इसी ऊर्जा और संसाधन का प्रयोग वास्तविक 'सामाजिक सरोकार' के कार्यों में किया जाता, तो यह आयोजन अधिक सार्थक और सम्मानित होता।

प्रबंधन की कमी और चित्रों का अनादर


​आयोजन के बाद की स्थितियों ने भी लोगों को आहत किया है। दीपक जलाने के बाद उन्हें व्यवस्थित तरीके से हटाने का कोई पूर्व-नियोजित खाका नज़र नहीं आया। कई स्थानों पर प्रधानमंत्री के चित्रों के ठीक सामने जलाए गए दीपकों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर आईं, जिस पर लोगों ने कड़ी आपत्ति जताई। कुछ नागरिकों का कहना था कि इस तरह की व्यवस्था अनजाने में ही सही, लेकिन अत्यंत अमर्यादित और अनुचित संदेश देती है।
​राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि सेवा-पखवाड़े के नाम पर इस प्रकार का प्रदर्शन सामाजिक उपयोगिता के बजाय केवल "दिखावा संस्कृति" को बढ़ावा देता है। जनता की अपेक्षा है कि भविष्य में ऐसे आयोजनों में भव्यता के स्थान पर वास्तविक जन-सेवा और सामाजिक सरोकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

दिखावा संस्कृति या सामाजिक सरोकार?

आलोचकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस धन और समय का उपयोग किसी वास्तविक सामाजिक सरोकार के लिए किया जा सकता था। सभी को किसी सृजन के कार्य में लगाते।

​गरीब कल्याण: जिस तरह दीपोत्सव पर गरीब बस्तियों में मिठाई और भोजन का वितरण होता है, वैसा ही सेवा कार्य पीएम के जन्मदिन पर किया जा सकता था।

​उपहार और राहत: गरीब परिवारों को राशन, शिक्षा सामग्री या स्वास्थ्य सुविधाएं बांटना एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता था। 

अंतर समझना बेहद जरूरी

मुद्दे की बात और कहने का तात्पर्य यही है कि लोकतंत्र में नेताओं का सम्मान और उनका जन्मदिन मनाना कोई गलत बात नहीं है, किंतु उत्सव का तरीका संवेदनशीलता और जन-आकांक्षाओं के अनुरूप होना चाहिए। ईश्वर की जयंती और किसी जीवित व्यक्ति के जन्मदिन के अंतर को बनाए रखना बेहद जरूरी है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि करोड़ों रुपये के संसाधन केवल सोशल मीडिया रील्स और क्षणिक रिकॉर्ड बनाने में फूंकने के बजाय यदि गरीबों और वंचितों के जीवन में उजाला लाने में लगाए जाएं, तभी सही अर्थों में सेवा और नेतृत्व का उत्सव मनाया जा सकता है।