ग्रैंडपेरेंट्स डे विशेष: बिखरते परिवार, आधुनिकता की दौड़ और बुजुर्गों की अनदेखी, क्या यही है हमारी प्रगति?
बच्चों को बचपन से ही बुजुर्गों का आदर करना और उनकी देखभाल करना सिखाएं। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते देखते हैं। ग्रैंडपेरेंट्स डे का असली अर्थ तब सार्थक होगा जब हमारे घरों में बुजुर्गों की उपस्थिति को बोझ नहीं, बल्कि सौभाग्य माना जाएगा। यदि हम समय रहते इस दिशा में संभल गए, तो न केवल हमारे दादा-दादी और नाना-नानी का शेष जीवन खुशहाल होगा, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ी भी एक संवेदी और सुदृढ़ समाज का हिस्सा बन सकेगी।
⚫ हेमन्त भट्ट
आज जब हम ग्रैंडपेरेंट्स डे मना रहे हैं, तो केवल औपचारिकता और सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करने से काम नहीं चलेगा। खरी खरी बात तो यही है कि आज का दिन उस कड़वी सच्चाई का सामना करने का है, जिससे हम लगातार आंखें चुराते आ रहे हैं। आधुनिकता, व्यक्तिगत प्राइवेसी और "हम दो, हमारे दो" की सिमटती सोच ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। इस भागदौड़ और अपनी सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ में हमने सबसे ज्यादा किसे खोया है? जवाब स्पष्ट है—घर के दादा-दादी और नाना-नानी को।

कड़वा सच: विघटन और एकाकीपन का दौर
संयुक्त परिवारों का पतन: कभी संयुक्त परिवार भारतीय संस्कृति और शक्ति का प्रतीक हुआ करते थे। आज वे इतिहास के पन्नों में सिमटते जा रहे हैं। अपनी आजादी और सीमित दायित्वों की चाह में दंपत्ति अलग रहने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
व्यक्तिगत सुख-सुविधा की वेदी पर रिश्ते: आज की पीढ़ी के लिए लग्जरी गाड़ियां, बड़े मकान और वीकेंड पार्टी प्राथमिकता बन चुकी हैं। लेकिन उस घर में बुजुर्गों के लिए जगह और समय लगातार कम होता जा रहा है।
संस्कारों से कटती नई पीढ़ी: माता-पिता दोनों नौकरीपेशा हैं और बच्चे स्क्रीन या डे-केयर के हवाले हैं। जिन बच्चों को दादा-दादी और नाना-नानी की लोरियों, कहानियों और नैतिक शिक्षाओं की छत्रछाया मिलनी चाहिए थी, वे आज अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं।
संस्कारों की चलती फिरती पाठशाला है दादा दादी नाना नानी
दादा-दादी और नाना-नानी केवल उम्रदराज सदस्य नहीं हैं; वे अनुभवों का समुद्र, संकट के समय धैर्य की मिसाल और संस्कारों की चलती-फिरती पाठशाला हैं। उन्हें अलग-थलग कर देना दरअसल हमारी अपनी भावी पीढ़ी को उसकी जड़ों से काट देना है।
समाधान: कैसे बचाएं इस बिखराव को?
केवल समस्याओं पर चर्चा करने से स्थिति नहीं बदलेगी। यदि हम सचमुच अपने परिवारों को टूटने से बचाना चाहते हैं और बुजुर्गों को उनका खोया हुआ सम्मान लौटाना चाहते हैं, तो हमें व्यावहारिक कदम उठाने होंगे।
सोच और प्राथमिकताओं में बदलाव: अपनी स्वतंत्रता और प्राइवेसी की परिभाषा पर पुनर्विचार करें। यह समझें कि घर के बुजुर्ग कोई जिम्मेदारी या बोझ नहीं, बल्कि परिवार का सुरक्षा कवच हैं।
समय का निवेश: व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय निकालकर रोज बुजुर्गों के साथ बैठें, उनकी बातें सुनें और बच्चों को उनके पास समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करें। तकनीक से परे जाकर यह मानवीय जुड़ाव बेहद जरूरी है।
निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी: घर के छोटे-बड़े फैसलों में बुजुर्गों की सलाह लें। इससे उन्हें यह अहसास होता है कि वे आज भी परिवार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनका अनुभव मूल्यवान है।
सहानुभूति और धैर्य का दृष्टिकोण: उम्र के इस पड़ाव पर शारीरिक और मानसिक चिड़चिड़ापन स्वाभाविक है। युवा पीढ़ी को अधिकार जताने के बजाय धैर्य, सेवा और सहानुभूति का व्यवहार अपनाना होगा।
बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण : बच्चों को बचपन से ही बुजुर्गों का आदर करना और उनकी देखभाल करना सिखाएं। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते देखते हैं।
उनकी उपस्थिति को माना जाए सौभाग्य
ग्रैंडपेरेंट्स डे का असली अर्थ तब सार्थक होगा, जब हमारे घरों में बुजुर्गों की उपस्थिति को बोझ नहीं, बल्कि सौभाग्य माना जाएगा। यदि हम समय रहते इस दिशा में संभल गए, तो न केवल हमारे दादा-दादी और नाना-नानी का शेष जीवन खुशहाल होगा, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ी भी एक संवेदी और सुदृढ़ समाज का हिस्सा बन सकेगी। वृद्ध आश्रम की अनचाही प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। उन्हें एकाकी जीवन भी व्यथित नहीं करना पड़ेगा। मुद्दे की बात यही है कि सच्ची प्रगति वह नहीं है जो हमें अपनों से दूर कर दे। हमें यह समझना होगा कि बुजुर्ग हमारे अतीत की धरोहर और वर्तमान के मार्गदर्शक हैं। ग्रैंडपेरेंट्स डे पर केवल सोशल मीडिया पर तस्वीरें पोस्ट करने के बजाय, हमें उन्हें अपना समय, सम्मान और प्यार देना होगा। यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी संवेदनशील और संस्कारी बने, तो हमें अपने बुजुर्गों को वह स्थान देना होगा जिसके वे हकदार हैं।
Hemant Bhatt