शख्सियत : केवल शब्दों का संसार नहीं होती कविता 

समकालीन विधाओं में भी स्त्री, दलित, आदिवासी और शोषित वर्गों की अस्मिता और अधिकारों का खुलकर समर्थन किया गया है। इस प्रकार की कविता में आम जनजीवन, उसकी पीड़ा, संघर्ष और दैनिक समस्याओं को प्रमुख स्थान दिया गया है।

शख्सियत : केवल शब्दों का संसार नहीं होती कविता 

कवयित्री मीनाक्षी जोशी का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

 ’कवि सम्मेलनों जैसा सशक्त मंच आज हिंदी की समकालीन कविता से छीना जा चुका है। ऐसी कविताएं पूरी तरह इस मंच से बहिष्कृत हो चुकी हैं। अब इस तरह की कविता और लेखन की अन्य विधाएं भी छपी हुई दुनिया तक सिमटकर रह गई हैं। मंचों पर अब कविता कहीं से कहीं नज़र नहीं आती, इसकी जगह चुटकलों ने ले ली है। यही हाल मुशायरों का भी हो चला है। यह भी सही है कि कविता केवल शब्दों का संसार नहीं होती है।’

यह बात जानीमानी कवयित्री मीनाक्षी जोशी ने कही। इनका कहना था कि समकालीन हिंदी कविता कल्पनालोक और रोमानी सुंदरता से पूरी तरह मुक्त होकर ठोस जमीन पर खड़ी होती है और यही बात आम श्रोताओं-पाठकों को कविता से जोड़ती भी है। आधुनिक कविता में पारंपरिक लय, तुकबंदी और छंद के बंधन नहीं होते हैं। यह मुक्त छंद में अधिक प्रभावी ठंग से रची जा रही है। समकालीन कविता गद्य कविता का पर्याय बन गई है जिसका भावार्थ सीधे पाठकों के दिल में पहुंचता है।

आम जनजीवन मुखर

मीनाक्षी जी का कहना है कि समकालीन नई कविता में बात को घुमा फिराकर कहने के बजाए सीधे और तीखे व्यंग्य के साथ पाठकों के समक्ष रखा जाता है। आजादी के बाद देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति में भारी बदलाव हुए हैं और इन्हीं बदलाव तथा विसंगतियों को समकालीन कविता में शिद्दत के साथ देखा जा सकता है। समकालीन कविता ही नहीं लेखन की दूसरी समकालीन विधाओं में भी स्त्री, दलित, आदिवासी और शोषित वर्गों की अस्मिता और अधिकारों का खुलकर समर्थन किया गया है। इस प्रकार की कविता में आम जनजीवन, उसकी पीड़ा, संघर्ष और दैनिक समस्याओं को प्रमुख स्थान दिया गया है।

जनपक्षधर कविता

 एक सवाल के जवाब में मीनाक्षी जी ने कहा कि समकालीन कविता जनपक्षधर होती है और इसमें यथार्थ का तीखा चित्रण होता है। यह कविता 1960 के दशक के बाद से आज तक के सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय यथार्थ को पूरी सच्चाई के साथ अभिव्यक्त करती है। ऐसी कविता की भाषा सरल और आम बोलचाल की होती है। इसमें कृत्रिम या कठिन शब्दों के बजाय आम बोलचाल की भाषा और सहज शब्दावली का प्रयोग होता है, लेकिन कुछ भी हो आज समकालीन कविता से उसका मंच छीन चुका है और उसकी जगह चुटकलों ने ले ली है। वक्त का एक दौर था जब शिवमंगल सिंह सुमन, हरिवंश राय  बच्चन,  रामधारीसिंह दिनकर जैसे कवि मंचों पर जब कविता सुनाते थे, तब श्रोता मंत्र मुग्ध होकर सुना करते थे। आज ऐसे श्रोता अतीत का हिस्सा हो चुके हैं।

सत्रह देशों की साहित्यिक यात्रा

भण्डारा महाराष्ट्र में रह रही मीनाक्षी जी अभी तक सत्रह देशों की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक यात्राएं कर चुकी हैं। दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से इनकी परिचर्चा, कविता एवं  वार्ता प्रसारित होती रही है। आप भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली की गुजराती भाषा सलाहकार समिति एवं महाराष्ट्र राज्य गुजराती साहित्य अकादमी, मुम्बई की सदस्य रही हैं। 

विश्व हिंदी सम्मेलन में सहभागिता

मीनाक्षी जी भारत सरकार व्दारा दक्षिण अफ्रिका में आयोजित 9 वें तथा माॅरीशस में 11 वें विश्व हिंदी सम्मेलन में शोध आलेख प्रस्तुत कर चुकी हैं। इनकी प्रकाशित पुस्तकें-’नदिया गहरी नाव पुरानी,’ ’आटे का सूरज’, ’गुजराती की समकालीन कहानियां’, ’गुजराती की समकालीन कविताएं’, ’कापालिकों की दुनिया’ तथा ’धर्मयुध्द’ अनुदित पुस्तकें हैं। ’धूमकेतु धूमिल और साठोत्तरी कविता’, ’समक्ष,’ ’साहित्य और समाज’, ’मन-मंथन’, ’उजाले तेरी यादों के’, ’ये सूरत बदलनी चाहिए’, ’समक्ष दरकते किनारों की दास्ता’ँ सहित आपकी 14 पुस्तकें प्रकाशित एवं चर्चित हैं। आपको  उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ तथा महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी सहित अन्य अनेक पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।

मीनाक्षी की कविताएं

मनुष्य इक्कीसवीं सदी का

निगाहें थम गईं
एक अजीब सी तस्वीर पर
एक शरीर पांच सिरों वाला
यानि पांच चेहरे
एक हंसता, एक रोता
एक गंभीर, एक परेशान
बीच का चेहरा
निर्विकार....तटस्थ
यह क्या?
हाथ तो ग़ायब!!
नहीं, ग़ायब नहीं, कटे हुए
पैरों की जगह
विशालकाय पहिए
पहियों में फंसी 
कुछ गर्दनें कटी हुई
कुछ सीधी कुछ उलटी
पूरी आकृति 
किसी दरिया में डूबती हुई
मैंने लिख दिया
तस्वीर के ठीक नीचे
मनुष्य इक्कीसवीं सदी का।

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नया महाभारत

सरकारी दफ़्तर में लगी एक
तख्ती़ पर गया मेरा ध्यान 
लिखा था ’ मेरा भारत महान’
आँखों में ख्ंिाच गई देश की तस्वीर
एक दूसरे की टांगें खींचती
लतियाति, बतियाति, धकियाति
हीं हीं....खीं खीं.....करती भीड़
झुकी पीठ पर लादे देश को 
फिर रखेगी महाभारत की नींव।

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देवत्व

बाहरी संसार के समानांतर
एक भीतरी संसार होता है
जहां निर्दोष मन 
अव्यक्त सपनों को संजोता है
कुछ इस तरह जैसे 
टूटी मूर्तियों के पत्थर में 
छुपा देवत्व कहीं रोता है।

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आज के दौर में 

आज के दौर में
पत्थर उन्हीं पर बरसते हैं
जो दिमाग नहीं
बस शीशे-सा दिल रखते हैं
गर टकराना है जमाने से 
तो पत्थर बन जाइये
संवेदना और भावना को 
गंगा में बहा आइये
हवा का रुख देखकर 
राह बदलते जाइये
येन-केन प्रकारेण 
मंजिल अपनी पाइये
खुश रखना है दुनिया को 
तो मुखौटे कुछ लगाइये
वरना ठोकरें खाते-खाते
कहीं घुल मिल जाइये

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अर्थ की आरसी

मैं तब बिल्कुल अकेली होती हूं
जब मेरे चारों ओर भीड़ होती है
इस भीड़ का कोई रूप 
कोई आकार कोई भाषा 
मैं समझ नहीं पाती
भीड़ के अनगढ़ शोर से 
चुन लेती हूं कुछ शब्द 
तराशती हूं उन्हें
अर्थों की आरसी में 
इस उम्मीद से 
कि भीड़ शायद...
काई आकृति पा सके।