साहित्य रचना : कूड़े का ढेर

सड़क के किनारे कूड़े के ढेर पर बिखरे हैं कुछ दाने अनाज के, जीवन के। साथ ही पड़ी है वहाँ अमीरों की सड़ी हुई सोच, जिसकी बदबू हवा में घुली हुई है।

साहित्य रचना : कूड़े का ढेर

रंजना लता

सड़क के किनारे
कूड़े के ढेर पर
बिखरे हैं कुछ दाने
अनाज के, जीवन के।
साथ ही पड़ी है वहाँ
अमीरों की सड़ी हुई सोच,
जिसकी बदबू
हवा में घुली हुई है।

इन दोनों के बीच
चुपचाप बैठा है एक बचपन,
अधूरी भूख से कांपता,
सूनी आँखों में प्रश्न लिए।
उसे खबर नहीं
इस सड़ांध की, इस गंध की,
वह तो बस टटोलता है
कूड़े के ढेर में
कुछ मुट्ठी भर दाने।

और उन्हीं दानों के साथ
ढूँढ़ता है बार-बार
अपना खोया हुआ बचपन,
जो शायद
किसी कूड़े में ही
फेंक दिया गया है।

रंजना लता, समस्तीपुर, बिहार