विशेष : अनछुए कृष्ण

पूजना हो कृष्ण को, मंदिर में मिलेंगे, समझना हो कृष्ण को, कर्मों में खिलेंगे। प्रेम में स्वार्थ छूटे, श्याम वहीं मुस्काएँ, धर्म कठिन हो जाए, कृष्ण राह दिखाएँ। सत्य जब अकेला हो, निर्भय होकर बोलना, अन्याय के सम्मुख फिर, मौन होकर न डोलना। अपने निर्णयों में जब, धर्म को जगा लोगे, तब जानोगे कृष्ण को, जब कृष्ण स्वयं हो लोगे

विशेष : अनछुए कृष्ण

मंजुला पांडे "मंजुल"

मात्र मुरली की तान में, श्याम को न जानना,
यमुना की लहरों में,जैसे ज्वार को पहचानना।
ग्वालों संग हँसने वाला, नीति का मनीषी था,
बाल-वय में गया जान, शक्ति की अनीति था।
कंस-वध ही लक्ष्य नहीं, राज्य-संयम साधना,
मुकुट से विरक्त रह, राजधर्म आराधना।
 जो प्रेम में कोमल, वही रण में प्रचंड थे,
कृष्ण जहाँ प्रेम थे, वहीं काल के दंड थे।

माखन-चोर हाथ में, चक्र सुदर्शन था,
मधुर अधर के भीतर, गीता का दर्शन था।
राधा के नयनों में,नेह का निःशब्द राग,
पार्थ के संशय में, ज्ञान का दिव्य सुराग।
प्रेम दिया तो मोह से, मुक्त होना सिखाया,
दिया कर्म तो कर्मफल, त्यागना बताया।
अंतर के विराट को, अर्जुन में जगाया,
मानव को स्वयं से ही, कृष्ण ने मिलाया ।

द्रौपदी की पुकार जब, सभा में करुण हुई,
नीति बैठी मौन तब, सत्ता भी मौन हुई।
भीष्म और द्रोण वहाँ, ज्ञान के पहाड़ थे,
फिर भी नारी-लाज पर, क्यों सभी लाचार थे?
कृष्ण सखा बनकर नहीं, चेतना बन आए थे,
मौन पड़े पुरुषार्थ को, दर्पण दिखलाए थे।
चीर बढ़ा कि धर्म का, मान बढ़ गया था,
उस दिन एक नारी में, युग खड़ा हुआ था।

सुदामा के द्वार पर, दौड़े द्वारिकाधीश आए,
 सब राजपाट छोड़कर, मित्र के मन में समाए।
मुट्ठी भर तंदुल में, स्नेह का सारा संसार था,
रिक्त हाथ मित्र का भी, कितना अधिकार था।
धन देना सहज बहुत,पर मान बचाना कठिन,
मित्रता निभाना सरल,  है मान रखना कठिन।
बता दिया कृष्ण ने, मित्रता का मान यही,
हाथ रिक्त हो भले, मन कभी रिक्त नहीं।

रण छोड़ने वाले को, जग ने रणछोड़ कहा,
किसने नीति के उस, गूढ़ अर्थ को पढ़ा?
हर युद्ध जीतना ही, वीरता नहीं होती,
हर शस्त्र उठाना भी, श्रेष्ठता नहीं होती।
कभी एक पग पीछे, जन-जीवन बचाता है,
कभी त्यागा हुआ रण, भविष्य बनाता है।
जो रक्त से अधिक, प्राणों का मोल जाने—
वही रणछोड़ होकर, रण का मर्म पहचाने।

शांति का संदेश लिए, हस्तिनापुर गए,
पाँच ग्राम माँगकर भी, सत्य पर ही अड़े।
अहंकार अड़ा रहा, संधि भी हार गई,
अधर्म की जिद अंततः, रणभूमि तक आ गई।
कृष्ण ने युद्ध नहीं, धर्म को चुना था,
युद्ध तो अधर्म ने, उनके द्वार बुना था।
संधि जहाँ तक हो सके, वहाँ तक निभाई—
फिर धर्म की रक्षा में, रण की राह आई।

द्वारिका बसाई तो, जनहित था सामने,
सत्ता नहीं, सुरक्षा थी, श्याम के हर निर्णय में।
राजमुकुट सिर पर था, मन में न अभिमान,
प्रजा के सुख-दुःख को ही, माना अपना मान।
राजा वह नहीं जो बस, सिंहासन सँभालते,
राजा वही जो जन के, आँसू पहले टालते।
अर्थ राजधर्म का उन्होंने, जग को समझाया
जनहित से बड़ा कोई, राजमुकुट न सजाया।

और एक कृष्ण को, देखो समय के पार,
जब अपने ही कुल में, छिड़ गया संहार।
यादवों का मद बढ़ा, वंश स्वयं मिट गया,
द्वारिका का वैभव भी, काल में सिमट गया।
जिन्होंने जग को धर्म का, पाठ पढ़ाया था,
अपनों का पतन भी, आँखों से पाया था।
देवत्व अगर केवल, सुख का विधान होता,
कृष्ण के जीवन में फिर,कहां इतना विराग होता?

कृष्ण प्रेम भी हैं और, प्रेम का विराग भी,
कृष्ण मौन भी हैं और, गीता का संवाद भी।
कृष्ण नीति भी हैं और, नीति का विवेक भी,
कृष्ण युद्ध भी हैं और, शांति का अभिषेक भी।
राधा में अनुराग, सुदामा में स्नेह हैं,
पार्थ में कर्तव्य, विदुर में सत्य नेह हैं।
जीवन का मधुर राग, मृत्यु का विराम भी
कृष्ण आदि-अंत दोनों, कृष्ण ही परिणाम भी।

पूजना हो कृष्ण को, मंदिर में मिलेंगे,
समझना हो कृष्ण को, कर्मों में खिलेंगे।
प्रेम में स्वार्थ छूटे, श्याम वहीं मुस्काएँ,
धर्म कठिन हो जाए, कृष्ण राह दिखाएँ।
सत्य जब अकेला हो, निर्भय होकर बोलना,
अन्याय के सम्मुख फिर, मौन होकर न डोलना।
अपने निर्णयों में जब, धर्म को जगा लोगे,
तब जानोगे कृष्ण को, जब कृष्ण स्वयं हो लोगे।
 
मंजुला पांडे "मंजुल"