खरी-खरी: आस्था का आडंबर, चंदे का धंधा और बेबस नागरिक
दुर्भाग्य से, यह सोच और चिंतन अभी विकसित ही नहीं हो सका है। अपने निहित स्वार्थों और राजनैतिक/सामाजिक प्रभाव की पूर्ति के लिए भगवान को धर्म की आड़ में सड़कों पर लाकर खड़ा कर दिया गया है। भगवान के लिए मंदिर बने हैं, सड़क पर गड़े तंबू नहीं।
⚫ हेमंत भट्ट
उत्सवों का मौसम आते ही शहर की सड़कें, चौराहे और गलियां तंबू-कनात से पटने लगती हैं। भक्ति के नाम पर शुरू होने वाला यह दौर धीरे-धीरे चंदा उद्योग, निजी रसूख और प्रशासनिक सांठगांठ का मंच बन जाता है। आयोजन का मूल आध्यात्मिक उद्देश्य क्या है, यह तो शायद आयोजकों को भी नहीं पता, लेकिन अपने प्रभाव का प्रदर्शन करना और निजी हितों को साधना ही इन आयोजनों की असली वजह बन चुका है।
मंदिरों की उपेक्षा, सड़कों पर अतिक्रमण
रतलाम की बात करें तो शहर में दर्जनों प्राचीन गणेश मंदिर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। गढ़ कैलाश स्थित प्राचीन श्री गणेश मंदिर हो या धानमंडी-तोपखाना के मध्य स्थित गणेश देवरी, इन ऐतिहासिक धरोहरों को आज संरक्षण और जीर्णोद्धार की सख्त जरूरत है। अगर यही भव्यता, साज-सज्जा और ऊर्जा इन प्राचीन मंदिरों को पुनः पहचान दिलाने में लगाई जाती, तो उत्सव भी सहजता से मनते और संस्कृति का वास्तविक संरक्षण भी होता।
दुर्भाग्य से, यह सोच और चिंतन अभी विकसित ही नहीं
दुर्भाग्य से, यह सोच और चिंतन अभी विकसित ही नहीं हो सका है। अपने निहित स्वार्थों और राजनैतिक/सामाजिक प्रभाव की पूर्ति के लिए भगवान को धर्म की आड़ में सड़कों पर लाकर खड़ा कर दिया गया है। भगवान के लिए मंदिर बने हैं, सड़क पर गड़े तंबू नहीं। अस्थाई पंडालों के नाम पर होने वाले इस अतिक्रमण से न सिर्फ आम जनता का आवागमन बाधित होता है, बल्कि पूरा यातायात तंत्र चरमरा जाता है।
डर का चंदा और रसूख का खेल
गणेशोत्सव के नाम पर होने वाली चंदा वसूली की सच्चाई भी किसी से छिपी नहीं है। व्यापारी और आम नागरिक अक्सर श्रद्धा से कम और इस डर से ज्यादा चंदा देते हैं कि मना करने पर कोई नुकसान न उठाना पड़े। आयोजकों ने धर्म को आस्था और आत्मिक शांति से अलग कर इसे मनोरंजन, शक्ति-प्रदर्शन और रसूख का केंद्र बना दिया है।
प्रशासन की चुप्पी: ध्वनि प्रदूषण पर कोई लगाम नहीं
आयोजनों से पहले पुलिस और प्रशासनिक तंत्र बैठकों का औपचारिक नाटक जरूर रचता है। प्रकाश व्यवस्था, सीसीटीवी और सुरक्षा के नाम पर दिशा-निर्देशों की लंबी सूची जारी की जाती है, लेकिन सबसे अहम मुद्दे—ध्वनि प्रदूषण और डीजे पर पाबंदी—पर रहस्यमयी चुप्पी साध ली जाती है।
साफ दर्शाते हैं अपनी मनमानी
तेज आवाज में बजने वाले साउंड सिस्टम और नियमों को ताक पर रखकर बजते डीजे आयोजकों की मनमानी को साफ दर्शाते हैं। बुजुर्गों, बीमारों और विद्यार्थियों की परेशानी से बेखबर प्रशासन की यह अनदेखी सवाल खड़े करती है। धर्म का कार्य समझकर आम जन सब कुछ सहन करने को मजबूर है, लेकिन जिम्मेदार पुलिस और प्रशासनिक महकमें की यह निष्ठुरता दर्शाती है कि उन्हें आम नागरिक की पीड़ा से कोई सरोकार नहीं है।
प्रभाव और स्वभाव को देना होगी तिलांजलि
जब तक समाज और प्रशासन इस दिखावे, अतिक्रमण और चंदा संस्कृति के खिलाफ चिंतन नहीं करेगा, तब तक उत्सव का वास्तविक स्वरूप भक्ति नहीं, बल्कि केवल असुविधा का जरिया बना रहेगा। जब घर-घर पर श्री गणेश जी की स्थापना हो रही है उत्सव मनाया जा रहा है। प्रभाव और स्वभाव को तिलांजलि देकर केवल धर्म और आस्था ही आयोजन का उद्देश्य होना चाहिए। मंदिरों में ऐसे उत्सव होने चाहिए। मुख्य उद्देश्य यही है कि उत्सव धर्मिता को बचाया जाए। धर्म के साथ ही भारतीय संस्कृति, संस्कार और चिंतन आयोजन में परिलक्षित हो। उत्सव ऐसे मनाएं कि उसका अनुकरण हो।
Hemant Bhatt