विचार सरोकार : समानता के संविधान में असमान कसौटियाँ क्यों?

अतः प्रश्न यह नहीं है कि विशेष प्रावधान अपने आप में असंवैधानिक हैं; प्रश्न यह है कि विशेष प्रावधानों का औचित्य, उनकी सीमा, उनका प्रभाव और उनकी निरंतरता क्या आज भी समानता की संवैधानिक कसौटी पर खरी उतरती है?

विचार सरोकार : समानता के संविधान में असमान कसौटियाँ क्यों?

मुद्दा किसी वर्ग से अधिकार छीनने का नहीं, बल्कि समान नागरिकता की संवैधानिक कसौटी को समान रूप से लागू करने का है

⚫ ब्रजेश कुमार त्रिवेदी

भारत का संविधान केवल शासन की पुस्तक नहीं है; वह उस गणराज्य का नैतिक और विधिक अनुबंध है, जिसमें प्रत्येक नागरिक को समान गरिमा, समान नागरिकता और विधि के समान संरक्षण का आश्वासन दिया गया है। संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समानता और विधियों के समान संरक्षण की बात करता है। अनुच्छेद 15 और 16 भी समानता के व्यापक सिद्धांत को स्थापित करते हैं, यद्यपि संविधान सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सहित कुछ वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों की संवैधानिक अनुमति देता है। अतः प्रश्न यह नहीं है कि विशेष प्रावधान अपने आप में असंवैधानिक हैं; प्रश्न यह है कि विशेष प्रावधानों का औचित्य, उनकी सीमा, उनका प्रभाव और उनकी निरंतरता क्या आज भी समानता की संवैधानिक कसौटी पर खरी उतरती है?

परिणामों की समीक्षा भी सामाजिक न्याय की ही भावना से हो

यही वह प्रश्न है जिसे आज सार्वजनिक विमर्श से हटाकर केवल राजनीतिक नारों के हवाले नहीं किया जा सकता। यदि किसी नागरिक को उसकी जातीय पहचान के आधार पर कोई विशेष सुविधा प्राप्त होती है और दूसरे नागरिक को उसी पहचान के आधार पर उससे वंचित किया जाता है, तो यह स्वाभाविक है कि प्रभावित नागरिक संविधान के अनुच्छेद 14 की ओर देखे और पूछे—इस भिन्नता का संवैधानिक औचित्य क्या है? विशेष प्रावधान का उद्देश्य यदि सामाजिक न्याय है, तो उसकी आवश्यकता और परिणामों की समीक्षा भी सामाजिक न्याय की ही भावना से होनी चाहिए।

दीर्घकालिक प्रभाव भी सार्वजनिक विमर्श का विषय हो

मध्य प्रदेश की विद्युत व्यवस्था इस बहस का एक प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करती है। राज्य शासन की आधिकारिक योजना के अनुसार एक हेक्टेयर तक कृषि भूमि वाले पात्र अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कृषकों को 5 हॉर्सपावर तक के स्थायी कृषि पंप के लिए निःशुल्क विद्युत प्रदान की जाती है और इसका वित्तीय प्रावधान राज्य शासन के अनुदान से जुड़ा है। योजना का अद्यतन 20 मई 2026 को दर्ज है। यहाँ किसी किसान को बिजली की सुविधा मिलने का विरोध करना उद्देश्य नहीं है। किसान चाहे किसी भी जाति का हो, उसकी कृषि, उसकी आजीविका और उसकी आर्थिक कठिनाइयाँ सम्मान की अधिकारी हैं। प्रश्न केवल इतना है कि जब विद्युत का उत्पादन, क्रय, पारेषण और वितरण एक सार्वजनिक व्यवस्था के माध्यम से होता है, तब विभिन्न सामाजिक श्रेणियों के लिए अलग-अलग प्रभावी आर्थिक भार निर्धारित करने का आधार क्या है? राज्य सरकार जिस धन से यह अनुदान देती है, वह अंततः सार्वजनिक कोष से आता है; इसलिए उसकी मात्रा, लागत, लाभार्थियों की संख्या और दीर्घकालिक प्रभाव भी सार्वजनिक विमर्श का विषय होने चाहिए।

वे आँकड़े देश के सामने रखने में संकोच कैसा?

यहाँ एक और प्रश्न उठता है—यदि किसी विशेष वर्ग के लिए आर्थिक सहायता आवश्यक है, तो क्या सहायता का आधार केवल जातीय पहचान होनी चाहिए, अथवा उसके साथ वास्तविक आर्थिक स्थिति, भूमि की सीमा, आय, संसाधनों की उपलब्धता और अन्य सामाजिक-आर्थिक संकेतकों को भी अधिक निर्णायक बनाया जाना चाहिए? यदि सरकार के पास आँकड़े हैं कि वर्तमान व्यवस्था वास्तव में सबसे वंचित व्यक्ति तक पहुँच रही है, तो वे आँकड़े देश के सामने रखने में संकोच कैसा? यही प्रश्न शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक संस्थानों की व्यवस्था पर भी लागू होता है। एक ओर संविधान समान अवसर की बात करता है, दूसरी ओर वह विशेष परिस्थितियों में सकारात्मक उपायों की अनुमति देता है। अतः स्वस्थ लोकतंत्र का मार्ग किसी एक व्यवस्था को आँख मूँदकर स्वीकार करना नहीं, बल्कि हर व्यवस्था के औचित्य को प्रमाण, आँकड़ों और संवैधानिक कसौटी पर परखना है।

सशस्त्र सेनाओं का उदाहरण इस बहस को बना देगा और भी रोचक

सशस्त्र सेनाओं का उदाहरण इस बहस को और रोचक बना देता है। भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय ने 8 मई 2015 को लोकसभा में स्पष्ट किया था कि थलसेना, नौसेना और वायुसेना में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए सामान्य भर्ती-आरक्षण लागू करने का कोई प्रस्ताव नहीं था और सशस्त्र सेनाओं में भर्ती मेरिट के आधार पर, वर्ग, जाति, समुदाय, क्षेत्र अथवा धर्म से परे की जाती है। सरकार ने सेना की विशिष्ट परिचालन और प्रशासनिक परिस्थितियों को इसका कारण बताया था।

निश्चय ही सशस्त्र सेनाओं की विशिष्ट प्रकृति को सामान्य सरकारी सेवाओं से यथावत नहीं मिलाया जा सकता। सैनिक के सामने युद्धभूमि में जाति या सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, अनुशासन, निर्णय-क्षमता, शारीरिक दक्षता और पेशेवर योग्यता निर्णायक होती है। इसलिए वहाँ कठोर चयन की आवश्यकता समझी जाती है। लेकिन यहीं से एक लोकतांत्रिक प्रश्न जन्म लेता है—यदि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसी सर्वोच्च संवेदनशील व्यवस्था में योग्यता और प्रशिक्षण की कसौटी को इतना निर्णायक माना जाता है, तो शिक्षा, प्रशासन और अन्य संवेदनशील सार्वजनिक संस्थानों में भी योग्यता तथा सामाजिक न्याय के बीच संतुलन की समय-समय पर कठोर समीक्षा क्यों न हो?

यह प्रश्न किसी समुदाय को अधिकारों से वंचित करने का नहीं है। यह केवल उस सिद्धांत का प्रश्न है कि जहाँ जिस प्रकार की विशेष व्यवस्था आवश्यक हो, वहाँ उसका कारण स्पष्ट, प्रमाणित और पुनरीक्षण योग्य होना चाहिए।

पीड़ित को संरक्षण देने के साथ-साथ निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों की भी करें रक्षा

इसी प्रकार अनुसूचित जाति एवं जनजाति के संरक्षण के लिए बनाए गए विशेष कानूनों को भी उनके ऐतिहासिक उद्देश्य के संदर्भ में समझना होगा। सामाजिक उत्पीड़न और अत्याचार से सुरक्षा देना राज्य का दायित्व है; लेकिन किसी भी कानून का अनुप्रयोग प्राकृतिक न्याय, निष्पक्ष प्रक्रिया और प्रमाण की कसौटी से परे नहीं हो सकता। सामाजिक न्याय तभी पूर्ण न्याय बनता है, जब वह पीड़ित को संरक्षण देने के साथ-साथ निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों की भी रक्षा करे।

दोनों के बीच संतुलन का मार्ग दिखाता है संविधान

कानून का सम्मान तभी स्थायी होता है, जब नागरिक को यह विश्वास हो कि कानून उसके साथ न्याय करेगा। चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग, विचारधारा या राजनीतिक पक्ष से संबंधित क्यों न हो। विशेष संरक्षण का अर्थ विशेषाधिकार का अनंत विस्तार नहीं होना चाहिए; उसी प्रकार समानता का अर्थ यह भी नहीं कि ऐतिहासिक वंचनाओं को देखकर राज्य आँखें बंद कर ले। संविधान दोनों के बीच संतुलन का मार्ग दिखाता है।

संदेह की दृष्टि से देखना लोकतांत्रिक परंपरा के अनुकूल नहीं

आज UGC और उच्च शिक्षा की नीतियों को लेकर भी इसी प्रकार की बहस सामने आ रही है। विद्यार्थी, शिक्षक, अधिवक्ता, लेखक और बुद्धिजीवी वर्ग के अनेक लोग अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रश्न उठा रहे हैं। किसी प्रश्न से सहमत होना अथवा असहमत होना लोकतंत्र का स्वाभाविक अधिकार है; किंतु शांतिपूर्ण प्रश्न पूछने वाले नागरिक को केवल उसकी असहमति के कारण संदेह की दृष्टि से देखना लोकतांत्रिक परंपरा के अनुकूल नहीं हो सकता।

भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि शांतिपूर्ण जनआंदोलनों ने अनेक बार शासन को अपने निर्णयों पर पुनर्विचार के लिए बाध्य किया है। अन्ना हजारे का 2011-12 का आंदोलन हो, विभिन्न किसान आंदोलन हों या अन्य नागरिक आंदोलनों की दीर्घ परंपरा—लोकतंत्र में सड़क और संसद एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि जनमत और शासन के बीच संवाद के दो अलग-अलग मंच हैं। वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों द्वारा सार्वजनिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से संस्थागत चिंताएँ व्यक्त करना भी भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की असाधारण घटनाओं में दर्ज है। इन घटनाओं से किसी वर्तमान आंदोलन की स्वतः वैधता सिद्ध नहीं होती, लेकिन इतना अवश्य सिद्ध होता है कि असहमति को लोकतंत्र का शत्रु मान लेना स्वयं लोकतंत्र की आत्मा को संकुचित करना है।

क्या प्रशासनिक तराजू के दोनों पलड़े हैं एक समान

प्रशासन की निष्पक्षता का प्रश्न भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि कोई संगठन विधिवत और पर्याप्त समय पहले शांतिपूर्ण कार्यक्रम की अनुमति माँगता है, तो निर्णय स्पष्ट, पारदर्शी और समान मानदंडों पर आधारित होना चाहिए। यदि अंतिम समय में कार्यक्रम स्थल बदला जाता है या अनुमति निरस्त होती है, तो प्रशासन को कारण सार्वजनिक करने चाहिए। दूसरी ओर यदि किसी अन्य संगठन को समान परिस्थितियों में भिन्न सुविधा प्राप्त होती है, तो नागरिक का यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या प्रशासनिक तराजू के दोनों पलड़े समान हैं?

कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य का दायित्व है; लेकिन शांतिपूर्ण असहमति को नियंत्रित करना और हिंसक अथवा अवैध गतिविधि को रोकना एक ही बात नहीं है। लोकतांत्रिक शासन की श्रेष्ठता इसी में है कि वह विरोधी स्वर को भी विधि के भीतर स्थान देता है।

और फिर प्रश्न आता है उस सर्वोच्च राजनीतिक प्रतिनिधित्व का, जहाँ से शासन की भाषा पूरे राष्ट्र तक पहुँचती है। प्रधानमंत्री किसी एक जाति के प्रधानमंत्री नहीं होते। गृहमंत्री किसी एक वर्ग के गृहमंत्री नहीं होते। रक्षामंत्री किसी एक समुदाय के रक्षामंत्री नहीं होते। मुख्यमंत्री किसी एक सामाजिक समूह के मुख्यमंत्री नहीं होते। वे संवैधानिक पदों पर आसीन सम्पूर्ण जनता के प्रतिनिधि होते हैं।

मौलिक अधिकार भी उतने ही संवैधानिक

करोड़ों नागरिकों के मत से प्राप्त पद को यदि किसी एक वर्ग की राजनीतिक पहचान तक सीमित करने का आभास भी उत्पन्न होता है, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है। जिस नागरिक ने सत्ता के पक्ष में मतदान किया, वह भी भारत का नागरिक है; जिसने विपक्ष में मतदान किया, वह भी उतना ही भारतीय है; और जिसने किसी को मत नहीं दिया, उसके मौलिक अधिकार भी उतने ही संवैधानिक हैं।

मैंने इसी चिंता को केवल लेख के माध्यम से व्यक्त नहीं किया है। 23 अगस्त 2026 को मैंने राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए X के माध्यम से सार्वजनिक रूप से अपना निवेदन भी प्रस्तुत किया था। उस सार्वजनिक पोस्ट के स्क्रीनशॉट में स्पष्ट रूप से मैंने लिखा कि हमें किसी विशेष वर्ग का प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री अथवा मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधि चाहिए। यह स्क्रीनशॉट इस लेख के साथ इसलिए रखा जा रहा है कि पाठक यह समझ सके कि यह प्रश्न केवल आज लिखे गए शब्दों का परिणाम नहीं, बल्कि पहले ही संवैधानिक पदाधिकारी के समक्ष सार्वजनिक रूप से रखा जा चुका है।

किसी वर्ग के विरुद्ध नहीं मेरा आग्रह

मेरा आग्रह किसी विशेष वर्ग के विरुद्ध नहीं है। मेरा आग्रह केवल इतना है कि समानता की संवैधानिक कसौटी को सभी नागरिकों और सभी व्यवस्थाओं पर ईमानदारी से लागू किया जाए। यदि किसी विशेष प्रावधान की आवश्यकता है तो उसके समर्थन में प्रमाण और आँकड़े प्रस्तुत किए जाएँ। यदि किसी व्यवस्था का उद्देश्य पूरा हो चुका है तो उसकी समीक्षा की जाए। यदि कोई कानून आवश्यक है तो उसका अनुप्रयोग न्यायपूर्ण हो। और यदि कोई नागरिक प्रश्न पूछता है तो उसे उत्तर मिले—लेबल नहीं।

तो सुरक्षा भी हो इसी प्रकार से

व्यंग्य की दृष्टि से देखें तो स्थिति कभी-कभी इतनी विचित्र प्रतीत होती है कि मन में प्रश्न उठता है—यदि किसी व्यवस्था में योग्यता के अंक जातीय गणित से घटाए-बढ़ाए जा सकते हैं, तो फिर क्यों न अगली बार प्रधानमंत्री और मंत्रियों की सुरक्षा का दायित्व भी उसी “अंकगणित” को सौंप दिया जाए? मसलन, जिसे परीक्षा में कथित रूप से “-40 अंक” मिलें, उसी से राष्ट्र के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा कराई जाए! निश्चय ही यह मेरा व्यक्तिगत व्यंग्यात्मक विचार है, कोई नीति-सुझाव नहीं; परंतु व्यंग्य का उद्देश्य ही यही होता है कि वह किसी व्यवस्था के भीतर छिपे विरोधाभास को आईने की तरह सामने रख दे।

राष्ट्रपति की सुरक्षा हो, प्रधानमंत्री की सुरक्षा हो, सेना हो, न्यायपालिका हो, शिक्षा हो या प्रशासन—जहाँ दायित्व जितना संवेदनशील है, वहाँ क्षमता, प्रशिक्षण, उत्तरदायित्व और निष्पक्षता की कसौटी उतनी ही कठोर होनी चाहिए। सामाजिक न्याय और योग्यता को परस्पर शत्रु बना देना भी उतना ही अनुचित है जितना सामाजिक विषमता की वास्तविकता से आँखें मूँद लेना। हमें ऐसा रास्ता चाहिए जिसमें न्याय भी रहे, अवसर भी रहे और नागरिक की गरिमा भी अक्षुण्ण रहे।

तो क्या भारत अपने प्रत्येक नागरिक को सामान गरिमा से देखा है यही है प्रश्न

अंततः प्रश्न आरक्षण बनाम गैर-आरक्षण का संकीर्ण प्रश्न नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या भारत अपने प्रत्येक नागरिक को समान गरिमा से देखता है? क्या राज्य की प्रत्येक विशेष व्यवस्था अपने औचित्य को आँकड़ों और संविधान के सामने सिद्ध करने के लिए तैयार है? क्या प्रशासन विरोध और समर्थन के बीच समान दूरी रखता है? क्या राजनीतिक नेतृत्व स्वयं को किसी वर्ग का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधि मानता है?

तो दिखना चाहिए व्यवहार में भी

यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक है, तो उसे शासन के व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। और यदि कहीं नागरिक को दोहरी कसौटी का अनुभव होता है, तो उसके प्रश्न को दबाने के बजाय उसका उत्तर देना ही लोकतंत्र की मर्यादा है।

भारत को किसी विशेष वर्ग का प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री या मुख्यमंत्री नहीं चाहिए। भारत को ऐसा नेतृत्व चाहिए जो सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधि हो; ऐसा प्रशासन चाहिए जो प्रत्येक नागरिक के साथ समान संवैधानिक गरिमा से व्यवहार करे; और ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें सामाजिक न्याय के नाम पर अन्याय न हो तथा समानता के नाम पर वास्तविक वंचना की उपेक्षा भी न हो।

23 अगस्त को राष्ट्रपति के समक्ष अपना निवेदन रखने के बाद आज इस लेख के माध्यम से मेरी अंतिम प्रार्थना भी यही है—

माननीय राष्ट्रपति महोदया से विनम्र प्रार्थना है कि संविधान की सर्वोच्चता, नागरिकों की समान गरिमा और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की इस मूल भावना पर गंभीरतापूर्वक ध्यान दिया जाए। किसी वर्ग के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि उस भारत के पक्ष में विचार हो जिसमें प्रत्येक नागरिक स्वयं को समान अधिकारों वाला भारतीय अनुभव कर सके।

क्योंकि संविधान केवल सत्ता को अधिकार देने वाला दस्तावेज नहीं

क्योंकि अंततः संविधान केवल सत्ता को अधिकार देने वाला दस्तावेज नहीं है; वह नागरिक को सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस और अधिकार देने वाला जीवंत संकल्प है।

 ✍️ ब्रजेश कुमार त्रिवेदी