दिमाग़ी-नक्सल के जुमले में...
हर कोई शक़ के दायरे में है। हर किसी पर चाहते, न चाहते हुए भी शक़ चस्पा कर दिया गया है। निठल्लों की चाॅंदी हो रही है और मौज़ूदा सरकार अपने नागरिकों को पानी में चाॅंद देखने के लिए विशेषतः विवश कर रही है।
⚫ राजकुमार कुम्भज
दिमाग़ी-नक्सल के जुमले में सुविधाओं और पूर्वाग्रहों की पहचान का मुद्दा भी खोजा जा सकता है।
इसे बराऐख़ास सत्ता-पक्ष और विपक्ष के वरिष्ठ-बुद्धिमान अपने-अपने नज़रिए से देखने में कुछ दूसरे ही ख़ास आग्रहों-दुराग्रहों का इस्तेमाल कर सकते हैं,बल्कि करेंगे और कर ही रहे हैं।

रोटी-रोज़गार मिले, नहीं मिले, संसद में गर्मागर्म स्वादिष्ट-मसालेदार बहस का तमाशा मिलता रहना चाहिए। तीस पर तुर्रा कहिए कि अख़बार तो हैं ही।
कहीं किसी एक लोकोक्ति में कहा भी गया है कि मनोरंजन से भूख मर जाती है?
किसी भी लोकतांत्रिक-व्यवस्था में तलवार अथवा बंदूक की बजाय संवाद ही कारग़र हथियार साबित होता रहा है और उम्मीद की जा सकती है कि होता रहेगा।
तमाम-तमाम दबावों और संदर्भों के बावजूद स्मरण रखा जा सकता है कि अप्प दीपो भव: ! बुद्ध ने भी असंभव को संभव तक ले आने का यही रवैया तथा रास्ता प्रतिपादित किया है।
मानाकि बुद्ध के देश में इस वक़्त, न तो कहीं बुद्ध का बुद्धत्व है और न कहीं देश-काल। फिर भी नागरिकों की पहली और आख़िरी ख़्वाहिश यही है कि सभी जन सुख-शांति का जीवन पाऍं। क्या ये संभव नहीं?एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों!
कलाओं का जादू,अपने नित-नित बदलते जाते अभिप्रायों के रहते, अपनी स्थापनाऍं एक हद तक ही बरक़रार रख पाता है।
बाद मुद्दत के आज़ादी पाई है। पुरखों ने कोड़े खाए हैं,भूखे रहे हैं,सज़ाऍं काटी हैं.आज फिर से विदेशी पूॅंजीगत-शक्तियों ने देशभर में अनचाहा-मनचाहा अतिक्रमण कर लिया है। विदेशी कर्ज़ की जकड़न कुछ इस हद तक त्रस्तता-आग्रही हो गई है कि चारों ओर प्रतिबंध ही प्रतिबंध उपलब्ध हैं।
स्वतंत्र-विकलताऍं बढ़ रही हैं और स्वतंत्र-मान्यताऍं घट रही हैं।
विश्वास और अविश्वास के परंपरागत पैमानों ने दम तोड़ दिया है।
हर कोई शक़ के दायरे में है। हर किसी पर चाहते, न चाहते हुए भी शक़ चस्पा कर दिया गया है। निठल्लों की चाॅंदी हो रही है और मौज़ूदा सरकार अपने नागरिकों को पानी में चाॅंद देखने के लिए विशेषतः विवश कर रही है।
धर्म-कर्म के स्थानों पर भीड़ बढ़ती जा रही है और उसी अनुपात में भगदड़ तथा गंदगी का महा-सडाॅंधभरा साम्राज्य भी। दिक़्क़त और आपत्ति की बात यही है कि इस भीड़ में वह zen-z और zen-alfa भी तन-मन-धन सहित जोशोख़रोश से शामिल है,जो अभी-अभी अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर आंदोलनरत है?
कहना कठिन नहीं है कि दिल्ली अमी अस्तो,अमी अस्तो,अमी अस्त...?

⚫ राजकुमार कुम्भज, इन्दौर 0731-2543380
18 अगस्त 2026
Hemant Bhatt