गरबा: भक्ति की पावन लोक-संस्कृति से विज्ञापनों के चकाचौंध तक—कहाँ खो गई हमारी मर्यादा?
अब समय आ गया है कि समाज, युवा वर्ग और संस्कृति के पैरोकार इस दिखावे की संस्कृति से बाहर निकलें। यदि हमने अब आत्मनियंत्रण, संयम और अपनी मर्यादाओं को पुनः स्थापित नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियों को हम संस्कारों के नाम पर केवल एक खोखला बाजारी उत्पाद सौंपेंगे। अराधना को उपभोग की वस्तु बनने से रोकना होगा, तभी हमारी संस्कृति सुरक्षित रह पाएगी।
⚫ हेमंत भट्ट
भारतीय जनजीवन में नवरात्रि का पर्व केवल नौ दिनों का अनुष्ठान नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि, संयम और मातृशक्ति की अराधना का महाकुंभ है। गुजरात की माटी से उपजा गरबा रास कभी इसी संयम, आस्था और उल्लास का जीवंत प्रतीक हुआ करता था। जहाँ माता के चरणों में श्रद्धा अर्पित होती थी, समाज एकजुट होता था और लोक-संस्कृति अपनी सहज गरिमा के साथ झूमती थी। लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस पवित्र लोक-कला का जो व्यावसायिक और विकृत स्वरूप पूरे देश में परोसा जा रहा है, वह न केवल चिंताजनक है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान पर एक गंभीर आघात भी है।

कॉरपोरेट चकाचौंध और बाज़ारीकरण की भेंट चढ़ी आस्था
आज गरबा पंडाल सांस्कृतिक मेलों से अधिक कमर्शियल इवेंट्स (व्यासायिक आयोजनों) और ब्रांड प्रमोशन के अखाड़े बन चुके हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर देसी कॉरपोरेट घरानों तक, हर कोई इस धार्मिक अनुष्ठान को अपनी मार्केटिंग का सबसे बड़ा जरिया बनाने में जुटा है।

दिखावा और अंधाधुंध पैसा: डीजे की कर्णप्रिय और तेज धुनें, फूहड़ रीमिक्स, और लाखों-करोड़ों के प्रायोजक (Sponsorship) ने इस आयोजन को भक्ति से ज्यादा 'फैशन शो' और 'डेटिंग मार्केट' में बदल दिया है।
संस्कृति का दोहन
कॉरपोरेट जगत ने मुनाफे की अंधी दौड़ में यह भी नहीं देखा कि वे जिस पावन पर्व को भुना रहे हैं, उसकी मूल आत्मा क्या है। पश्चिमी देशों की तर्ज पर भारतीय संस्कृति और मर्यादा को नेस्तनाबूद करने का यह खेल विदेशी ताकतों के साथ-साथ स्वदेशी कॉरपोरेट घरानों की मौन सहमति से खेला जा रहा है।
आंकड़ों की सच्चाई और नैतिक पतन का संकट
जब लोक-कला अपनी मूल मर्यादा को छोड़कर केवल कामुकता और दिखावे का माध्यम बन जाए, तो समाज का नैतिक पतन स्वाभाविक है।
गर्भपात और कंडोम के आंकड़े
करीब तीन दशक पहले गुजरात से यह चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई थी कि नवरात्रि के ठीक दो महीने बाद गर्भपात के मामलों में सर्वाधिक उछाल आता है। इसके अलावा, इन नौ दिनों के दौरान बाजारों में गर्भनिरोधक साधनों की बिक्री में कई गुना बढ़ोतरी दर्ज की जाती है।
विभिन्न अनुमान : विगत वर्षों में दवा कारोबारियों के संघ ने गुजरात में लगभग 35% से 40% की वृद्धि का अनुमान जताया था। कुछ पुरानी इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट्स के अनुसार कई ब्रांड्स की बिक्री में 10% से 20% की बढ़त देखी गई है।
डॉक्टरों और मेडिकल स्टोर संघों की रिपोर्ट के अनुसार, उत्सव के सीजन के दौरान कंडोम और इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स (जैसे i-Pill) की बिक्री में 25% से 50% तक की वृद्धि देखी जाती है। इसका मतलब है कि युवा अनचाहे गर्भ से बचने के लिए पहले से ही अत्यधिक सतर्क रहते हैं।
क्षेत्रीय अंतर: कुछ स्थानीय मेडिकल स्टोर या खास इलाकों (जैसे अहमदाबाद, वडोदरा आदि) में यह उछाल 30% से 60% तक भी आंका गया है।
वजह: देर रात तक चलने वाले गरबा और डांडिया आयोजनों, युवाओं के मेल-जोल और सुरक्षित यौन संबंधों को लेकर बढ़ती जागरूकता को इसका संभावित कारण माना जाता है।
अपराधों का ग्राफ
पिछले डेढ़ दो दशक से पंडालों में जिस अंग प्रदर्शन और पश्चिमी शैली के अंधानुकरण का चलन शुरू हुआ है, उसके दुष्परिणाम आज महिला सुरक्षा और अपराध के बढ़ते ग्राफ के रूप में हमारे सामने हैं। जब पहनावे और आचरण का उद्देश्य शालीनता के बजाय आकर्षण और फूहड़ता बन जाए, तो सामाजिक ताना-बाना बिखरना तय है।
उपवास और संयम: बुजुर्गों की नसीहतों तक सीमित होती परंपरा
शास्त्रों और हमारी परंपराओं के अनुसार, नवरात्रि में उपवास, फलाहार और जागरण का उद्देश्य केवल शारीरिक शुद्धि नहीं है, बल्कि मन पर नियंत्रण रखना है। इसका अर्थ कामवासना, मोह, माया, लोभ और अहंकार से दूर रहकर अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देना था। विडंबना यह है कि आज यह अमूल्य दर्शन केवल बुजुर्गों की नसीहतों या किताबों के पन्नों तक सिमट कर रह गया है। युवा पीढ़ी को यह समझाने वाला कोई नहीं बचा कि गरबा 'प्रदर्शन' की वस्तु नहीं, बल्कि भीतर की ऊर्जा को अनुशासित करने का एक माध्यम है।
आत्ममंथन की जरूरत
गरबा रास गुजरात की वह अनमोल थाती है, जिस पर पूरे देश को गर्व होना चाहिए था। लेकिन इसे फूहड़ता के रंग में रंगकर देश भर में प्रस्तुत करना हमारी सांस्कृतिक धरोहर के साथ बहुत बड़ा अन्याय है। अब समय आ गया है कि समाज, युवा वर्ग और संस्कृति के पैरोकार इस दिखावे की संस्कृति से बाहर निकलें। यदि हमने अब आत्मनियंत्रण, संयम और अपनी मर्यादाओं को पुनः स्थापित नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियों को हम संस्कारों के नाम पर केवल एक खोखला बाजारी उत्पाद सौंपेंगे। अराधना को उपभोग की वस्तु बनने से रोकना होगा, तभी हमारी संस्कृति सुरक्षित रह पाएगी।
आप पाठकों की राय
इस गंभीर सामाजिक मुद्दे पर आपकी क्या चिंतन है? क्या आप मानते हैं कि स्थानीय स्तर पर या धार्मिक संगठनों को इन व्यावसायिक आयोजनों पर रोक लगाने के लिए आगे आना चाहिए?
Hemant Bhatt