शख़्सियत : खेती की ज़मीन पर शहरियों का अतिक्रमण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तहस नहस

शहरीकरण के कारण ग्रामीण संस्कृति का विनाश हो रहा है। तीज त्योहारों की विरासत भुलाई जा रही है और आपसी मेल मिलाप में पहले जैसी निश्छलता नहीं रही। इसके बजाए स्वार्थ, छल, छद्म भी ग्रामीणों के व्यवहार में घर कर चुका है।

शख़्सियत : खेती की ज़मीन पर शहरियों का अतिक्रमण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तहस नहस

⚫ कथाकार वैदेही कोठारी का कहना

⚫ नरेंद्र गौड़

‘‘गांव बहुत तेजी से शहरों में तब्दील हो रहे हैं, ऐसे में कृषि भूमि लगातार कम हो रही है। औद्योगिकीकरण संसाधन दे सकता है, लेकिन अनाज की पैदावार का विकल्प खेत के अलावा अन्य कोई नहीं है। हालत नहीं सुधरी तो हर साल टनों अनाज निर्यात करना होगा, जिसके चलते विदेश मुद्रा भंडार खाली होता जाएगा।’’

यह बात स्वतंत्र पत्रकार तथा कथाकार वैदेही कोठारी ने कही। इनका कहना था कि गांवों का शहरीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें ग्रामीण इलाकों में शहरों जैसी सुविधाएं, आर्थिक गतिविधियां और जीवनशैली विकसित होने लगती है।

गाँव बन रहे शहर

एक सवाल के जवाब में वैदेही जी ने बताया कि सड़क और डिजिटल कनेक्टिविटी के कारण गांव अब शहर बन रहे हैं। आप देश के किसी भी हाईवे पर चले जाएं, जहां सड़कों के किनारे देर रात तक खुली रहने वाली हजारों दुकानें दिखाई देंगी, जहां वही सामान बिकता है जो शहरों में मिला करता है। वहां टोकरी, डलिया, छबड़ी, दरांती, फावड़े नहीं मिलते जो कि ठेठ ग्रामीणों के उपयोग में आते हैं। आज का ग्रामीण उन्हीं वस्तुओं का उपयोग करता है जो शहरों में इस्तेमाल होती हैं। गाँव में खेती किसान के बजाए बटाईदार करते हैं और जमीन का मालिक अतिरिक्त आय के संसाधन खोज लेता है।

फाॅर्म हाउस में रहने लगे किसान

एक सवाल के जवाब में वैदेही जी ने बताया कि आज गांवों में किसान झोपड़ियों के बजाए फार्म हाउस में रहते हैं और यह खेतों में बनते हैं जिसके कारण कृषि भूमि में कटौती होती है। फोरलेन सड़कें बन रही हैं जो खेती की जमीन को लीलती है। गांवों में स्कूल, कालेज और अस्पताल खुल रहे हैं, ऐसे में पचास साठ के दशक वाले गांव अर्ध शहर बन चुके हैं। किसानों की संतानें पढ़ रही हैं और नौकरी करने लगी हैं। ऐसे में उनकी पढ़ाई के कारण भी कई बार जमीन बेचना पड़ती और नया मालिक जरूरी नहीं कि अनाज बोएगा, वह उद्योग भी डाल सकता है। जिसके चलते अनाज उत्पादन में कमी स्वभाविक है।

खेत बन रहे सड़क 

शहरों में नए-नए उद्योग खुल रहे हैं जो शहरों के बाहर खुलते हैं, ऐसे में उस शहर के आसपास के खेत खरीदे जाते हैं। सड़कों के किनारे की भूमि करोड़ों में बिकती है और किसान अपनी जमीन राजी खुशी हाईवे निर्माण कम्पनी के हवाले कर देते हैं। ऐसे में गांवों का स्वरूप नष्ट हो रहा है और वह शहर में बदल रहे हैं। टू लेन, फोर लेन सड़क निर्माण, रेल लाइनों के चैड़ीकरण होने से गांवों की शहरों की तरफ मैराथन दौड़ शुरू हो चुकी है। शहरों के आसपास छोटे-छोटे गांव अपना अस्तित्व खो चुके हैं। इसके कारण न सिर्फ खेती की जमीन, वरन जंगलों का भी विलाश हो रहा है। सामान्य पाए जाने वाले वन्य प्राणी दुर्लभ हो गए हैं। जिन्हें सिर्फ अभ्यारण्यों और चिड़ियाघरों में देखा जा सकता है।

ग्रामीण संस्कृति का विनाश

वैदेही जी ने कहा कि शहरीकरण के कारण ग्रामीण संस्कृति का विनाश हो रहा है। तीज त्योहारों की विरासत भुलाई जा रही है और आपसी मेल मिलाप में पहले जैसी निश्छलता नहीं रही। इसके बजाए स्वार्थ, छल, छद्म भी ग्रामीणों के व्यवहार में घर कर चुका है। ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीय लघु उद्योग की कमर तोड़ दी थी, लेकिन आजादी मिलने के बाद भी इन्हें बढ़ावा नहीं दिया गया। पहले का किसान गेहूं, गन्ना, कपास और विभिन्न प्रकार की दलहनी फसलें बोता था, लेकिन आज गेहूं और सोयबीन के अलावा दूसरी फसलों पर उतना ध्यान नहीं देता। नतीजा यह कि शकर और कपास उद्योग का खात्मा हो रहा है। गन्ने से किसान गुड़ बनाता था, वहीं कपास के जरिए गांव में हथकरघा उद्योग था। ग्रामीणों को पलायन नहीं करना पड़ता था। गांव में रोजगार मिल जाता था। 

उत्तराखंड में हजारों मकानों में ताले

वैदेही जी ने बताया कि उत्तराखंड के हाल तो यह हैं कि वहां हजारों गांवों में बीसियों मकानों पर बरसों से ताले पड़े हैं, यहां तक कि उनमें जंग लग चुकी है। गांवों का खात्मा हो गया और शहर फल फूल रहे हैैं। वजह यह कि वहां सड़कें नहीं हैं और रोजगार के साधनों का अभाव है। पहाड़ों पर सड़क निर्माण बहुत कठिन है और बन भी गई तो भूस्खलन की भेंट चढ़ जाती है। पहाड़ों के युवक अपना घर परिवार छोड़कर मैदानों की तरफ निकल जाते हैं, जहां मेहनती होने की वजह से नौकरी मिल जाती है। पहाड़ों में रह रहे परिवार का गुजारा ऐसे युवकों व्दारा भेजे पैसों से होता है। वहीं पर्यटन उद्योग है ही जो कि तीर्थों और वहां की प्राकृतिक सुंदरता के कारण फल-फूल रहा है।

बाल कल्याण समिति सदस्य

 वैदेही जी रतलाम में रहती हैं। आप सेक्रेटेरियल प्रैक्टिस शाॅटहैंड, बेचलर आॅफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (बी.जे.एम.सी.) समाजशास्त्र में एमए, सोशल वर्कर में मास्टर की डिग्री हासिल कर चुकी है। 23 वर्षों से पत्रकारिता और कहानी, लघुकथा, आलेख, कविता और व्यंग्य लेखन में सक्रिय हैं। विगत 15 वर्षों से आप  वेव पोर्टल में सहायक संपादक हैं, इन दिनों बाल कल्याण समिति सदस्य भी हैं। आपकी रचनाएं नईदुनिया, राज एक्सप्रेस, दैनिक भास्कर, स्वदेश, निर्झर टाॅइम्स, सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं।

अनेक संस्थाओं से सम्मानित

अनेक संस्थाओं ने वैदेही जी सम्मानित किया है। इनकी कहानी विश्व संवाद केंद्र मालवा मंच व्दारा पुरस्कृत हो चुकी है तथा मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के ‘हिंदी पखवाड़ा’ में इनके लेखन को प्रथम सम्मान प्रदान किया गया। हिंदुस्तान टाइम्स व्दारा पत्र लेखन के लिए विशेष पुरस्कार, मानवाधिकार एवं अपराध नियंत्रण संगठन व्दारा वर्ष 2021 के लिए संभाग स्तरीय महिला सम्मान आदि इनकी उपलब्धियों में शामिल हैं। इनका कहानी संकलन ’गुनगुनी धूप सी कहानियां’ तथा व्यंग्य रचना ’शादी को मजाक न बनाएं’ को सुधि पाठकों ने बहुत सराहा है।


वैदेही जी की लघुकथाएँ

रिश्तों की हरियाली

 ’’चुप हो जा, राजू... कितना रोएगा?’’ पंद्रह वर्षीय कमल ने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
राजू की आँखें आँसुओं से भरी थीं।
’’कमल, तूने देखा न... मेरे दादाजी मुझसे कितना प्यार करते थे...’’ उसकी आवाज़ भर्रा गई। इस पर कमल ने हल्के स्वर में कहा, ‘‘हाँ यार, सब देखा है..., पर अब खुद को संभाल।’’
राजू ने सिसकते हुए कहा, ‘‘चार महीने पहले दादी भी मुझे छोडकर चली गईं...’’
 कुछ पल दोनों चुप रहे। हवा में एक अजीब-सी खामोशी घुल गई थी। फिर कमल ने अचानक कहा-‘‘तू रो मत... चल मेरे साथ। मैं तुझे अपने दादा-दादी और बड़े पापा से मिलवाता हूँ। वे तुझे बहुत प्यार देंगे... और फल भी खिलाएँगे।’’
राजू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा, कुछ बोले बिना साइकिल के पीछे बैठ गया।
‘‘पर तेरा घर तो दूसरी तरफ है?’’ उसने पूछा। कमल मुस्कुराया, ‘‘हाँ... पर वे सब खेत पर हैं।’’
 खेत पर पहुँचते ही चारों ओर फैली हरियाली ने जैसे राजू के मन का बोझ थोड़ा हल्का कर दिया। हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू थी और पेड़़ की सरसराहट जैसे कोई मधुर गीत गा रही थी।
’’तेरे दादा-दादी और बड़े पापा कहाँ हैं?’’ राजू ने चारों ओर नज़र दौड़ाते हुए पूछा।
‘‘चल... थोड़ी दूर पर ही हैं।’’
आगे बढ़ते ही राजू की नज़र एक पेड़ पर पड़ी जो पके आमों से लदा हुआ था।
’’अरे यार! इस पर तो कितने सारे पके आम लगे हैं!’’ वह खुशी से बोला।
फिर ज़मीन पर बिखरे जामुन देखकर वह बच्चे की तरह दौड़ पड़ा और उन्हें उठाने लगा। कुछ ही देर में दोनों नीम के पेड़ की ठंडी छाँव में बैठकर आम और जामुन खाने लगे। नीम की शीतल छाया में बैठे-बैठे राजू के चेहरे पर थोड़ी शांति आई, पर मन का खालीपन अब भी बाकी था।
‘‘यार... अब तो अपने दादा-दादी से मिलवा दे,’’ उसने धीमे स्वर में कहा।
कमल मुस्कुराते हुए बोला, ’’मिलवा तो दिया।’’
राजू चैंका, ‘‘कब? सपने में?’’
 कमल ने नीम की ओर इशारा करते हुए कहा, ’’देख... तू दादी की ठंडी छाँव में बैठकर ही तो आम और जामुन खा रहा है।’’
राजू ने हैरानी से पूछा, ’’क्या मतलब?’’
‘‘चल, उठ... बताता हूँ।’’
कमल उसे आम के पेड़ के पास ले गया और तने पर उकेरे शब्दों की ओर इशारा किया।
राजू ने पढ़ा-
‘‘प्रिय दादाजी’’
उसकी आँखें फैल गईं।
फिर कमल उसे दूसरे पेड़ के पास ले गया।
’’यह पढ़-’’
राजू ने पढ़ा-
‘‘प्रिय बड़े पापा’’
अब उसके चेहरे पर आश्चर्य और भावनाओं का मिश्रण था।
कमल ने धीरे से कहा, ‘‘मेरे दादाजी की मृत्यु आठ साल पहले हो गई थी। तब मैंने और पापा ने उनके नाम का यह आम का पेड़ लगाया। दादी के जाने के बाद यह नीम का पेड़... और बड़े पापा के लिए यह जामुन का पेड़ लगाया।’’
कुछ पल के लिए राजू निशब्द हो गया। अब ठंडी हवा जैसे उसे सहला रही थी। कमल ने उसके कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराकर पूछा-
‘‘बता... मेरे दादा-दादी और बड़े पापा से मिलकर कैसा लगा?’’

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खिल उठा कुम्हार का आँगन

 कुम्हार के आँगन में पड़ी मटकी उत्साहित होकर बोली, “लो भई, गर्मी आ गई! अब ठंडे-ठंडे पानी से मैं भी सराबोर हो जाऊँगी। जो भी मेरा शीतल जल पिएगा, उसकी प्यास तृप्त हो जाएगी।”
दूर कोने में पड़ी सुंदर नैन-नक्श वाली, फूलों की डिज़ाइन से सजी सुराही मुस्कुराकर बोली, “अरे मटकी! अब कौन खरीदता है मटके-मटकियाँ? तुम अभी कुछ महीने पहले ही बनाई गई हो, इसलिए इतनी उत्साहित हो।”
उदास होकर मटकी ने पूछा, “ऐसा क्यों कह रही हो, सुराही?”
सुराही ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “हाँ मटकी, मैं सच कह रही हूँ। हमारा भी एक समय हुआ करता था। लोग बसों, ट्रेनों और लंबी यात्राओं में मुझे अपने साथ ले जाया करते थे। जहाँ भी पानी मिलता, मुझे भर लेते और मैं उन्हें शीतल जल पिलाकर उनकी थकान दूर कर देती थी।”
तभी दूसरी ओर से काले रंग की बड़ी नाद बोली, “पहले हमें भी बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन पर पानी से भरकर लाल कपड़े या बोरे से ढँक दिया जाता था, ताकि राहगीर हमारे ठंडे पानी से अपनी प्यास बुझा सकें।”
सभी की बातें सुनकर मटकी आश्चर्य से बोली, “पर अब ऐसा क्या हो गया कि लोग आप सबको अपने साथ नहीं ले जाते?”
सुराही और मटके एक साथ बोले, “अब हमारी जगह बड़े-बड़े रेफ्रिजरेटर ने ले ली है।”
नाद भी दुखी स्वर में बोली, “और हमारी जगह वाटर कूलर ने। अब लोग प्लास्टिक की बोतलें साथ लेकर चलते हैं। जैसे ही बोतल खाली होती है, उसे कहीं भी फेंक देते हैं। क्या तुमने नहीं देखा, धरती माँ को साँस लेने में कितनी तकलीफ़ हो रही है?”
मटकी ने मासूमियत से पूछा, “क्या मनुष्य मिट्टी के बर्तनों के लाभ नहीं जानता?”
नाद बोली, “जब मेरे पास वाटर कूलर लगाया जा रहा था, तब एक राहगीर मुझसे पानी पीते हुए कह रहा था, ‘‘लो, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करने के लिए जगह-जगह वाटर कूलर लगा दिए हैं। लोगों को बस पल भर की ठंडक चाहिए, उसके दुष्प्रभावों की चिंता किसी को नहीं। आखिर कौन समझाए आज के लोगों को!’”
इतना सुनते ही कुम्हार के आँगन में सन्नाटा छा गया।
तभी एक मधुर आवाज सुनाई दी! “दादी, मुझे तो वह कोने में पड़ी सुंदर सुराही ही चाहिए!” 
दस वर्ष की वानी चहकते हुए बोली। दादी मुस्कुराकर बोलीं, “हाँ बेटा, जो पसंद हो ले लो।”
वानी फिर उत्साह से बोली, “दादी, वह छोटी-सी मटकी कितनी प्यारी लग रही है। क्या इसे भी ले लूँ?”
“हाँ बेटा, उसे भी ले लो।”
वानी की खुशी देखकर कुम्हार के आँगन में रखे मिट्टी के सभी पात्र मानो फिर से खिल उठे।

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कविता

सिर्फ अपने लिए जिऊंगी

बहुत सुंदर सीधी-साधी  सरल हूं मैं
और अच्छी बहू हूं 
अच्छी भाभी हूं!
अच्छी पत्नी भी हूं!
अच्छी देवरानी और जेठानी भी हूं!
सर्व गुण सुधर्ण नारी हूं मैं!
लेकिन तब तक ही 
जब तक मैं सबकी सुनती रहूं
गूंगी बहरी बन सबके इशारों पर नाचती रहूं!
जिस दिन मैंने एक बार भी 
किसी गलत बात के 
विरोध में आवाज़ उठाई
उसी दिन, तेज तर्रार बैगेरत
और चरित्रहीन भी बना दी जाती हूं!
मैं क्या हूं, क्यों हूं, कोई नहीं समझ सका!
जिसकी जैसी जरूरत
वैसी बना दी गई हूं
लेकिन अब नहीं..!
जैसी हूं , अच्छी हूं, मुझे नहीं और सहना
झूठे खोखले आदर्श और परंपराओं को!
जो मेरे लिए कुछ और ...!
तुम्हारे लिए कुछ और...!
अब जिऊंगी सिर्फ मैं ! और मैं!
अपने लिए!